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बग़दाद आपबीती: 2003 के हमले के बाद भी, संयुक्त राष्ट्र ने इराक़ियों को 'त्यागा नहीं'

इराक़ की राजधानी बग़दाद में, 19 अगस्त 2003 को, एक ट्रक बम ने, वहाँ स्थित यूएन मुख्यालय को ध्वस्त कर दिया था.
UN Photo/Timothy Sopp
इराक़ की राजधानी बग़दाद में, 19 अगस्त 2003 को, एक ट्रक बम ने, वहाँ स्थित यूएन मुख्यालय को ध्वस्त कर दिया था.

बग़दाद आपबीती: 2003 के हमले के बाद भी, संयुक्त राष्ट्र ने इराक़ियों को 'त्यागा नहीं'

शान्ति और सुरक्षा

संयुक्त राष्ट्र में वरिष्ठ राजनैतिक मामलों की एक अधिकारी ने बताया है कि वर्ष 2003 में, इराक़ में बग़दाद शहर के कैनाल होटल में, यूएन कार्यालय पर हुए हमले में मारे गए सहकर्मियों के बलिदान को, किस तरह स्वीकार किया गया है, जोकि देश में संयुक्त राष्ट्र की निरन्तर उपस्थिति से स्पष्ट है. उस दौरान न्यूयॉर्क में रहने वाली, एल्पिडा रोउका, इराक़ कार्यक्रम के कार्यालय के कार्यकारी निदेशक के साथ एक मिशन पर बग़दाद गई थीं. वो उस घातक विस्फोट में बच गईं, जिसमें उनके 22 यूएन सहयोगियों की मौत हो गई थी. 19 अगस्त पर हुए उस हमले की याद में, हर वर्ष, इसी दिन विश्व मानवतावादी दिवस मनाया जाता है. एल्पिडा रोउका की आपबीती...

“उस समय मेरी उम्र केवल 25 साल थी और संयुक्त राष्ट्र में काम करते हुए मुझे केवल दो साल ही हुए थे. मैंने, युवावस्था की चकाचौंध भरी आँखों से उत्साहपूर्वक इराक़ कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक को, बग़दाद के उस अगस्त मिशन पर मुझे अपने साथ ले जाने के लिए मानो ख़ुद ही मनाया था. मैं दुनिया के रिवाज़ों से पूरी तरह अनजान थी, नहीं जानती थी कि दुनिया हमेशा सुन्दरता का पर्याय नहीं होती और उस संगठन के बारे में भी मुझे कोई ख़ास जानकारी नहीं थी.

मुझे, उस दर्दनाक घटना में व्यक्तिगत क़ीमत चुकाने के अलावा, अव्यक्त PTSD का सामना करना पड़ा जो वर्षों बाद निकलकर सामने आया. संगठन पर इसके प्रभाव का मुझे अहसास तक नहीं था. बग़दाद हमले ने संयुक्त राष्ट्र के लिए सब कुछ बदल दिया. हमारे कामकाज के तरीक़े, हमारी पहचान, हमारे बारे में दुनिया की राय या फिर हमारे अपने बारे में हमारी राय.

मैं समझ नहीं पाई कि दिवंगत महासचिव कोफ़ी अन्नान ने संयुक्त राष्ट्र को इराक़ से बाहर आने का आदेश क्यों नहीं दिया; वर्षों बाद, जब मैंने उनके साथ काम किया, तब ही हम यह समझ पाए. और फिर भी चार साल बाद मैं दोबारा इराक़ गई, लेकिन इस बार एक सहायता कर्मी के रूप में नहीं, बल्कि एक राजनैतिक मिशन के हिस्से के रूप में, जो बम हमले में मारे गए - इराक़ में संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि, सर्गियो विएरा डी मेलो व उनकी टीम द्वारा शुरू किए गए काम को ही आगे बढ़ाने का कार्य था. मैंने पूरी तरह "सोच-समझकर" संयुक्त राष्ट्र के नीले रंग को अपना लिया.

आतंकवादियों का लक्ष्य, संयुक्त राष्ट्र

दुखद ही सही, लेकिन कैनाल होटल हमला हमेशा याद दिलाता रहेगा कि पहली बार किसी आतंकवादी हमले का प्रत्यक्ष लक्ष्य बनने वाला, संयुक्त राष्ट्र का नीला झंडा, किसका प्रतीक है या किसका प्रतीक होना चाहिए.

आज मैं उम्र के उस पड़ाव के क़रीब पहुँच चुकी हूँ, जिसपर वो लोग थे, जिन्हें हमने उस दिन खो दिया था. वे संयुक्त राष्ट्र ध्वज की भावना के प्रतीक थे - जोखिम को चुनौती देना, राजनीति से ऊपर उठकर, कमज़ोर लोगों के लिए आवाज़ बुलन्द करना, सत्ता के सामने सच बोलना, अधिक शक्तिशाली समूहों की ग़लतियों पर उनको चुनौती देना, सभी बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ना और वापस जाना.

हमने उन्हें और बाक़ी बहुत से लोगों को खोया है और आज भी खो रहे हैं, क्योंकि कई संघर्षों में हम शान्ति लाने में विफल हो रहे हैं, और वे हमें सही दिशा दिखाते रहेंगे. ऐसा न हो कि हम भूल जाएँ कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर की प्रस्तावना में शामिल पद की शपथ है: "हम, लोग..."

इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, फ़लस्तीन, सीरिया में अनेक मिशनों में हिस्सा लेने - और अनेक शारीरिक व भावनात्मक घावों के सालों बाद, मैं उस अगस्त 2003 में झुलसे संयुक्त राष्ट्र laissez-passer दस्तावेज़ को आज भी हमेशा साथ रखती हूँ.

संघर्षों की बदलती प्रकृति

यह बताना मुश्किल है कि कैनाल होटल हमले की 20वीं बरसी का, जीवित बचे लोगों के अलावा, बाहरी दुनिया या फिर अन्तरराष्ट्रीय सिविल सेवकों की युवा पीढ़ी के लिए कोई मतलब है या नहीं. कई मायनों में संघर्षों की प्रकृति और उसमें संयुक्त राष्ट्र की भागेदारी, दो दशकों में काफ़ी बदल गई है. 

आधुनिक शान्ति अभियान जटिल हो गए हैं, ग़ैर-सरकारी पक्षों और हिंसक चरमपंथियों की भागेदारी के साथ लगातार बदलती, उच्च जोखिम वाली बहुध्रुवीय कार्रवाई, बल इस्तेमाल करने पर विविध दृष्टिकोण, सीमाओं से परे संघर्ष का फैलना, महान शक्तियों का पतन और इसके परिणामस्वरूप वैश्विक अविश्वास गहराना.

टी-दीवारों के पीछे काम करना (टकराव प्रभावित देशों में संयुक्त राष्ट्र परिसरों को घेरते सुरक्षात्मक कंक्रीट अवरोधक), रेत से भरे गड्ढों के परिसरों से बाहर, बख़्तरबन्द वाहनों में, पीपीई [व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण] पहने हुए और स्थानीय लोगों के सम्पर्क में आने से सावधान रहना, सामान्य माना जाने लगा है.

साथ ही, संगठन को अपने और उन लोगों के प्रति जवाबदेह भी होना होता है, जिनकी वे सेवा करते हैं. हमें अब भी कैनाल से बहुत से सबक़ सीखने बाक़ी हैं, जिससे हमारे मिशन विकटतम स्थितियों के लिए पूरी तरह तैयार रह सकें, हमारे कर्मचारी उन स्थानों की जटिलताओं के प्रति सचेत हों और हमारा नेतृत्व स्पष्ट रूप से यह बता सके कि वहाँ के हलात कैसे हैं.

यही बात सदस्य देशों पर भी लागू होती है जो कभी-कभी हमें असम्भव जनादेश देते हैं. फिर भी कैनाल होटल हमले पर संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया, एक प्रमुख पहलू में एक़दम उचित रही: उस दिन संयुक्त राष्ट्र, इराक़ियों को छोड़कर गया नहीं. इससे उन लोगों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, जिन्होंने सत्य के लिए अपनी जान क़ुरबान कर दी; जो आज भी हमारे नैतिक मार्गदर्शक बने हुए हैं.”