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WHO: पारम्परिक चिकित्सा सम्मेलन भारत में: कुछ अहम तथ्य

घाना की एक प्रयोगशाला में एक शोधकर्ता, पौधों से प्राप्त अर्क की जाँच कर रहा है.
WHO/Ernest Ankomah
घाना की एक प्रयोगशाला में एक शोधकर्ता, पौधों से प्राप्त अर्क की जाँच कर रहा है.

WHO: पारम्परिक चिकित्सा सम्मेलन भारत में: कुछ अहम तथ्य

स्वास्थ्य

भारत में 17 और 18 अगस्त को हो रहे विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रथम पारम्परिक चिकित्सा वैश्विक शिखर सम्मेलन का मक़सद, पारम्परिक चिकित्सा पर राजनैतिक प्रतिबद्धता और साक्ष्य-आधारित कार्रवाई को बढ़ावा देना है. WHO की दक्षिण-पूर्वी एशिया के लिए क्षेत्रीय निदेशक, डॉक्टर पूनम खेत्रपाल ने सम्मेलन के अवसर पर, इससे सम्बन्धित कुछ अहम जानकारियाँ साझा की हैं...

यह सम्मेलन, पारम्परिक चिकित्सकों, उपयोगकर्ताओं व समुदायों, राष्ट्रीय नीति निर्माताओं, अन्तरराष्ट्रीय संगठनों, शिक्षाविदों, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज संगठनों समेत सभी हितधारकों को, पारम्परिक औषधि पर उत्कृष्ट प्रथाओं और साक्ष्य, आँकड़ें व नवाचार साझा करने का एक मंच प्रदान करेगा.

एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में 80 फ़ीसदी आबादी, पारम्परिक औषधि व चिकित्सा पद्धति का इस्तेमाल करती है. 

पारम्परिक औषधि व चिकित्सा से तात्पर्य आदिवासी समुदायों व अन्य संस्कृतियों द्वारा सहेजे गए ज्ञान, कौशल व प्रथाओं के उस भंडार से है, जिसका उपयोग स्वास्थ्य बनाए रखने और शारीरिक व मानसिक बीमारी की रोकथाम, निदान व उपचार में किया जाता है.  

पारम्परिक औषधि के अन्तर्गत एक्यूपंचर, आयुर्वेदिक औषधि व जड़ी-बूटी के मिश्रण और आधुनिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है.

मगर, फ़िलहाल राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों और रणनीतियों में पारम्परिक औषधि के लाखों स्वास्थ्यकर्मियों, मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रमों, स्वास्थ्य केन्द्रों और स्वास्थ्य व्यय को एकीकृत नहीं किया गया है. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के मुताबिक़ आधुनिक विज्ञान जगत में पारम्परिक औषधि की अहमियत बढ़ रही है.

WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के सदस्य देशों ने लगातार पारम्परिक चिकित्सा पर साक्ष्य-आधारित कार्रवाई और सहयोग की वकालत की है. 

पारम्परिक चिकित्सा उत्पादों से हानि पहुँच सकती है, ख़ासतौर पर जब जब वो अन्य दवाओं के साथ या उच्च मात्रा में ली जाएँ. ख़राब तरीक़े से कृषि करना, फ़सल का संग्रह, विनिर्माण या भंडारण से भी प्रदूषण एवं प्रतिकूल प्रतिक्रिया हो सकती है. 

 डॉक्टर पूनम खेत्रपाल सिंह, विश्व स्वास्थ्य संगठन में दक्षिण-पूर्व एशिया की क्षेत्रीय निदेशक.
WHO South-East Asia
डॉक्टर पूनम खेत्रपाल सिंह, विश्व स्वास्थ्य संगठन में दक्षिण-पूर्व एशिया की क्षेत्रीय निदेशक.

WHO दक्षिण-पूर्वी एशिया की क्षेत्रीय निदेशक डॉक्टर पूनम खेत्रपाल ने कहा कि पारम्परिक, पूरक एवं स्वदेशी चिकित्सा उत्पादों और उपचारों को फ़ार्मास्यूटिकल्स के समान ही जाँच (विनियमन, सुरक्षा और गुणवत्ता नियंत्रण) के अधीन किया जाना चाहिए. 

उन्होंने बताया कि लगभग 124 WHO सदस्य देशों में हर्बल दवाओं के लिए क़ानून या नियम पारित किए जा चुके हैं.

2013 में पारम्परिक चिकित्सा पर दिल्ली घोषणा और WHO पारम्परिक चिकित्सा रणनीति 2014-2023 के समर्थन के बाद, WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र ने, पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली की निगरानी के लिए अक्टूबर 2015 में पारम्परिक चिकित्सा पर एक कार्य योजना शुरू की.

इसमें पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली संगठन और प्रबन्धन पर अनुसन्धान उत्प्रेरित करना; पारम्परिक चिकित्सा चिकित्सकों/कार्यबल की क्षमता निर्माण; प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग प्रणाली स्थापित करना; और प्रभावी संचार (सूचना, शिक्षा और पैरोकारी) शामिल है.

वर्तमान में, डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के लगभग सभी देशों में पारम्परिक चिकित्सा पर राष्ट्रीय नीतियाँ मौजूद हैं. इनमें बांग्लादेश, भूटान, डीपीआर कोरिया, भारत, इंडोनेशिया, मालदीव, म्याँमार, नेपाल, श्रीलंका और थाईलैंड शामिल हैं. 11 में से नौ देशों में पारम्परिक चिकित्सकों के औपचारिक प्रशिक्षण हेतु शिक्षा प्रणालियाँ भी मौजूद हैं.

WHO पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों पर क्यों काम कर रहा है?

पारम्परिक, स्वदेशी और पैतृक ज्ञान, दुनिया भर के समुदायों में स्वास्थ्य संवर्धन और देखभाल के लिए सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य शक्तिशाली संसाधन है. दूरदराज़ और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए, यह सुलभ और किफ़ायती स्वास्थ्य देखभाल का एकमात्र स्रोत है. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के 194 में से 170 सदस्य देशों ने पारम्परिक चिकित्सा का इस्तेमाल करने के सम्बन्ध में जानकारी दी है, जिसमें हर्बल और पौधों पर आधारित दवाएँ, योग, स्वदेशी उपचार आदि शामिल हैं.

इन देशों की सरकारों ने, विश्व स्वास्थ्य संगठन से समर्थन प्रदान करने का आग्रह किया है ताकि पारम्परिक चिकित्सा, तौर-तरीक़ों और उत्पादों के सम्बन्ध में विश्वसनीय तथ्य व आँकड़े जुटाए जा सकें.  

डॉक्टर पूनम खेत्रपाल ने कहा कि डब्ल्यूएचओ ने, सदस्य देशों के अनुरोध पर ही, पारम्परिक चिकित्सा पर सुरक्षा, गुणवत्ता और न्यायसंगत पहुँच सुनिश्चित करने के लिए नीतियों एवं अभ्यास, वैश्विक मानकों व नियमों को सूचित करने के लिए साक्ष्य तथा डेटा के लिए, पारम्परिक चिकित्सा पर काम शुरू किया गया है. 

भारत सहित डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के अधिकांश देश, पहले से ही पारम्परिक प्रथाओं, उत्पादों और चिकित्सकों को अपने राष्ट्रीय स्वास्थ्य देखभाल वितरण प्रणालियों में एकीकृत करने की दिशा में काम करते रहे हैं.

पारम्परिक पद्धतियों को आधुनिक चिकित्सा उपचार के साथ कैसे एकीकृत किया जाएगा?

आधुनिक युग में इस्तेमाल होने वाली 40 फ़ीसदी दवाएँ व उपचार उत्पाद, प्राकृतिक स्रोतों से आते हैं. कई विलक्षण दवाएँ भी पारम्परिक दवाओं से ली गई हैं. उदाहरण के लिए, आम इस्तेमाल की दवा एस्पिरिन, विलो वृक्ष की छाल से बनी पारम्परिक दवा से प्रेरित है, वही बाल्यावस्था के कैंसर के उपचार के लिए सदाबहार (rosy periwinkle) पौधे के तत्व से इलाज निकाले गए हैं. चेचक का पूर्ण उन्मूलन सम्भव कर देने वाली वैक्सीन का उदभव, अफ़्रीका व एशिया (भारत समेत) की प्रतिरक्षा प्रथाओं से हुआ था. डॉक्टर खेत्रपाल का कहना है कि ऐसे में पारम्परिक प्रथाओं से मिलते-जुलते सुराग़ों से, एथनोफार्माकोलॉजी और रिवर्स फार्माकोलॉजी और अब, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे अनुसन्धान तरीक़ों का उपयोग करके नई नैदानिक ​दवाओं की पहचान व विकास में मदद मिल सकती है.

उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने पारम्परिक उपचार प्रणालियों के अध्ययन और अभ्यास में क्रान्ति ला दी है. AI के उन्नत एल्गोरिदम और सीखने की मशीनी क्षमताएँ, शोधकर्ताओं को पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियों का पता लगाने, साक्ष्यों का मानचित्रण करने और रुझानों की पहचान करने में मदद दे रहे हैं. 

पारम्परिक चिकित्सा उपचारों के साथ संयोजन में उपयोग किए जाने पर, पारम्परिक चिकित्सा से अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं, जैसे कि पारम्परिक उपचारों के दुष्प्रभावों को प्रबन्धित करने के लिए प्रशामक देखभाल, मानसिक और भावनात्मक कल्याण में सुधार व रोगी की सन्तुष्टि में वृद्धि. हालाँकि, उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि पारम्परिक उत्पाद और पद्धतियाँ, आधुनिक स्वास्थ्य चिकित्सा का स्थान न लेकर, केवल उन्हें पूरक सेवाओं के रूप में ही उपयोग करें. 

भारत में वैश्विक पारम्परिक चिकित्सा केन्द्र (WHO GTMC) स्थापित करने का उद्देश्य?

डॉक्टर पूनम खेत्रपाल का कहना है कि डब्ल्यूएचओ लगातार, स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में, ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण की हिमायत करता रहा है, जो पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों और उत्पादों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकृत करते हुए, गुणवत्ता, सुरक्षा एवं प्रभावकारिता के मानकों पर खरे उतरते हों. सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए ऐसी एकीकृत साक्ष्य-आधारित जन-केन्द्रित स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं को बढ़ावा देना, सर्वजन के लिए स्वास्थ्य की दिशा में प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कहा कि हमारे लिए स्वास्थ्य प्रणालियों को मज़बूत करने के लिए, पास में उपलब्ध, किफ़ायती और स्वीकार्य विकल्पों की पहचान करके, पारम्परिक एवं आधुनिक चिकित्सा पर अनुसन्धान व डेटा को बढ़ावा देना ज़रूरी है.

इसी मक़सद से गुजरात के जामनगर में, WHO GTMC स्थापित किया गया, जो दुनियाभर की पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों पर साक्ष्य आधारित आँकड़े एकत्रित करने का एक वैश्विक केन्द्र है. 

डॉक्टर खेत्रपाल ने बताया कि इस केन्द्र का कार्य, सभी छह डब्ल्यूएचओ क्षेत्रों के देशों की पारम्परिक दवाओं व पद्धतियों को उनके स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकृत करने और उनकी गुणवत्ता व सुरक्षा विनियमित करने में मदद करने के लिए सबूत प्रदान करना है.

भारत ने WHO-GCTM की स्थापना, बुनियादी ढाँचे और संचालन के लिए 25 करोड़ अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता जताई है. 

डॉक्टर पूनम खेत्रपाल ने बताया कि WHO-GCTM, पारम्परिक चिकित्सा में WHO की मौजूदा वैश्विक क्षमता को बढ़ाता है और सभी सदस्य देशों को उच्च गुणवत्ता, सुरक्षित और प्रभावकारी पारम्परिक चिकित्सा व उपचार प्रदान करने के लिए मानदंड व नियम निर्धारित करने हेतु कार्य करता है.

1976 में शुरू होने वाला WHO पारम्परिक चिकित्सा कार्यक्रम आज, विभिन्न प्रणालियों में प्रशिक्षण व अभ्यास के लिए मानक विकसित करने और उनके साक्ष्य-आधारित एकीकरण के लिए, देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है. साथ ही डब्ल्यूएचओ, पारम्परिक चिकित्सा अध्याय का अगला मॉड्यूल विकसित कर रहा है, जिसमें आयुर्वेद, यूनानी और सिद्ध चिकित्सा प्रणालियों के नैदानिक ​​शब्द शामिल होंगे.

वर्तमान में, डब्ल्यूएचओ अपनी तीसरी पारम्परिक चिकित्सा वैश्विक रणनीति 2025:2034 विकसित कर रहा है, जो सदस्य देशों को सुरक्षित, योग्य व प्रभावी पारम्परिक चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करने और स्वास्थ्य प्रणालियों में उनके उचित एकीकरण का समर्थन करने के लिए विश्वसनीय जानकारी और डेटा के आधार पर मानदंडों, मानकों और तकनीकी दस्तावेज़ों को विकसित करने पर केन्द्रित होगी.