भारत: जीविकोपार्जन के साथ-साथ, विरासत संरक्षण भी
उत्तरी कर्नाटक के यादगीर शहर से कुछ किलोमीटर दूर, थानागुंडी टांडा में रहने वाली यशोदी पवार के माता-पिता, कामकाज के लिए बेंगलुरू पलायन कर गए. लेकिन यशोदा पवार ने उनके साथ न जाकर, अपने घर में ही रहकर लम्बानी कढ़ाई सीखने का फ़ैसला किया. लम्बानी कढ़ाई की कला उनके समुदाय की विशेषता है, जो पीढ़ियों से महिलाएँ आगे बढ़ाती आ रही हैं.
20 वर्षीया यशोदी, यादगीर ज़िला प्रशासन द्वारा समर्थित टाटा ट्रस्ट की पहल, 'कलिके' द्वारा संचालित एक छोटे से केन्द्र में सिले गए उत्कृष्ट एवं रंगीन डिज़ाइनों को दिखाते हुए कहती है, "मुझे इस कला के सुन्दर डिज़ाइन बहुत पसन्द हैं. मैं इस पारम्परिक कला से आजीविका कमाना चाहती हूँ और यह ख़ूबसूरत कला दूसरों को सिखाकर, इसे जीवित एवं समृद्ध बनाए रखने में भी मदद करना चाहती हूँ."
लम्बानी कढ़ाई 34 अलग-अलग उत्कृष्ट सिलाई तरीक़ों पर निर्भर करती है जो कीड़ों की चाल समान लगते हैं. उदाहरण के लिए, कोसो टेको एक ज़िग-ज़ैग पैटर्न है, जो समानान्तर पंक्तियों में चलती चींटियों जैसा दिखता है, जिसमें एक पंक्ति ऊपर जाती है, तो दूसरी नीचे आती है; या फिर जाली - यह मकड़ी के जाले जैसा दिखता है; वेले - जिसका अर्थ है लता. वहीं इंगली एक कीट की नक़ल करता पैटर्न है, जो पीछे की ओर चलता है.
यशोदा, लम्बानी महिलाओं के 40-सदस्यीय महिला समूह का हिस्सा हैं, जो लम्बानी कढ़ाई कला का अपना कौशल निखारने में लगे हैं.
ये महिलाएँ, बटुए, मोबाइल फ़ोन बैग, महिलाओं के कपड़े, पायदान जैसे उत्पादों की एक पूरी श्रृंखला बनाती हैं. डाइनिंग टेबल मैट, दीवारों पर टांगी जाने वाली चीज़े और यहाँ तक कि दोस्ती वाले बैंड भी.
यह पूर्णत: महिला सहकारी समिति, भारत की शायद एकमात्र ऐसी संस्था है, जो सक्रिय रूप से लम्बानी कढ़ाई को संरक्षित और पुनर्जीवित करने की कोशिशों में तो लगी ही है, साथ ही महिलाओं को रोज़गार के अवसर भी प्रदान कर रही है.
कलिके पहल में, कच्चे माल से लेकर प्रशिक्षण से लेकर बाज़ार सम्पर्क तक - पूरी मूल्य श्रृंखला पर काम किया जाता है. इसके उत्पादों की कई दुकानें, यादगीर और अन्य शहरों में मौजूद हैं.
यादगीर स्थित कलिके की वरिष्ठ कार्यक्रम प्रबन्धक प्रमिला के कहती हैं, ''हम उन्हें इसमें शामिल करके, प्रशिक्षित करते हैं और यहीं रोज़गार प्रदान करते हैं.''
तीन महीने के प्रशिक्षण के दौरान, प्रतिभागियों को भत्ता और यात्रा भत्ता मिलता है.
ज़िला अधिकारी स्नेहल आर बताते हैं, "यह ज़िला, प्रमुखत: वर्षा पर निर्भर कृषि इलाक़ा है, जहाँ कोई उद्योग या सेवाएँ उपलब्ध नहीं हैं."
"यहाँ से लोगों का भारी मौसमी पलायन होता है. इसलिए, हम यहाँ की महिलाओं को कौशल प्रदान करने पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं."
मास्टर ट्रेनर, प्रमिला कहती हैं, ''मैं बाज़ार पर नज़र रखते हुए पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी तक कौशल पहुँचा रही हूँ”.
उन्होंने, यादगीर शहर से लगभग 30 किमी दूर मुन्दरगी नामक गाँव में रहने वाली, समुदाय की दो सबसे पुराने कारीगरों, देवीबाई और शान्तिबाई से सिलाई सीखी थी.
लम्बानी महिलाओं के लिए एक प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित करने के अलावा, कालिके पहल ने लम्बानी महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ भी नैटवर्क बनाया है.
मसलन, अल्लीपुर टांडा में दस सदस्यीय समूह इंदिरा गांधी स्वयं सहायता समूह के साथ – जो ख़रीदारों के लिए विभिन्न कलाकृतियाँ और कढ़ाई वाले परिधान बनाता है.
अल्लीपुर स्वयं सहायता समूह की चन्दाबाई कहती हैं, "हम अपने समुदाय की सैकड़ों महिलाओं को अपने साथ जोड़ सकते हैं. ज़रूरत है तो केवल बाज़ार सम्बन्धी मदद की - बाक़ी सब हम पर छोड़ दें."