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ब्रिटेन: नए विधेयक से, मानवाधिकार व शरणार्थी संरक्षण को 'गहरा धक्का'

लन्दन में, ब्रिटेन का संसद भवन.
© Unsplash/Heidi Fin
लन्दन में, ब्रिटेन का संसद भवन.

ब्रिटेन: नए विधेयक से, मानवाधिकार व शरणार्थी संरक्षण को 'गहरा धक्का'

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख और संगठन की शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के प्रमुख ने, मंगलवार को आगाह करते हुए कहा है कि ब्रिटेन की संसद ने एक ऐसा विधेयक पारित किया है जो अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानूनों व शरणार्थी क़ानून के तहत देश की ज़िम्मेदारियों से मेल नहीं खाता है.

यूएन एजेंसियों के इन प्रमुखों ने कहा है कि इस नए क़ानून से, उन लोगों के लिए गम्भीर परिणाम हो सकते हैं, जो अन्तरराष्ट्रीय संरक्षण की चाह रखते हैं.

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विधेयक पर चिन्ता

 यूएन एजेंसियों ने कहा है कि ‘अवैध आप्रवासन विधेयक’ ऐसे व्यक्तियों के लिए, देश में शरण या पनाह चाहने की सम्भावना को ख़त्म करता है, जो ब्रिटेन में, “अनियमित रूप से” दाख़िल हुए हों. मतलब कि वो किसी ऐसे देश से गुज़रकर ब्रिटेन पहुँचे हों - चाहे कितनी ही छोटी अवधि के लिए - जहाँ उन्हें उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ा हो.

ये विधेयक, उनकी परिस्थितियों की परवाह किए बिना, प्रवासियों को शरणार्थी संरक्षण या मानवाधिकार दावे पेश करने से भी रोकता है. 

ये विधेयक ब्रिटेन की संसद के निचले सदन (House of Commons) में पारित हो गया है, मगर अभी ऊपरी सदन (House of Lords) से पारित होना है.

यह नया क़ानून, सरकार को प्रवासियों को इस बात की परवाह किए बिना, किसी अन्य देश को जबरन भेजे जाने की अनुमति देता है कि वहाँ उन्हें संरक्षण हासिल होगा या नहीं. 

इस क़ानून में, सरकार को नई व्यापक बन्दीकरण शक्तियाँ भी मिलती हैं, जिन पर सीमित न्यायिक समीक्षा लागू होगी.

यूएन शरणार्थी एजेंसी – UNHCR ने हालाँकि ये भी कहा है कि वो इंगलिश चैनल को पार करने की ख़तरनाक यात्राएँ करके, देश में शरण लेने वाले लोगों की बढ़ती संख्या सम्बन्धी चिन्ताओं को समझती है.

यूएन शरणार्थी उच्चायुक्त फ़िलिपो ग्रैंडी ने कहा है, “हम मौजूदा शरण व्यवस्थाओं को, अधिक तेज़, न्यायसंगत और कुशल प्रकिया के ज़रिए, ज़्यादा कारगर बनाने के मौजूदा प्रयासों का स्वागत करते हैं, जिनसे अन्तरराष्ट्रीय संरक्षण के ज़रूरतमन्दों के एकीकरण का रास्ता खुले और जिन लोगों के पास ठहरने का कोई क़ानूनी अधिकार नहीं है, उन्हें तेज़ी से स्वदेश लौटाया जा सके.”

“दुख की बात ये है कि यह प्रगति, इस नए क़ानून से बहुत कमज़ोर होगी. शरणार्थियों और प्रवासियों के मार्गों के बारे में योरोपीय और अन्य एजेंसियों के साथ सहयोग किया जाना भी बहुत अहम है.”

मानवाधिकारों के उलट

यह विधेयक, उन सभी व्यक्तियों को शरणार्थी संरक्षण मुहैया कराने से भी वंचित करता है, जो इसके दायरे में नहीं आते हैं. उनमें वो बच्चे भी हैं जिनके साथ कोई नहीं हो और जो अपने माता-पिता या अभिभावकों से बिछड़ गए हों, जिनके मानवाधिकारों का हनन हुआ हो, या फिर वो मानव तस्करी या आधुनिक दासता के पीड़ित हों’ और मार्गों में उनके उत्पीड़न के जोखिम को भी नज़रअन्दाज़ किया गया है.

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने कहा है, “इन परिस्थितियों में किन्हीं व्यक्तियों को जबरन देश से बाहर भेजना, किसी को उत्पीड़न की आशंका वाले देशों में जबरन भेजे जाने और सामूहिक बेदख़ली की निषिद्धता, निर्धारित क़ानूनी प्रक्रिया के अधिकार, परिवार और निजी जीवन के अधिकार, और सम्बन्धित बच्चों के सर्वश्रेष्ठ हितों के सिद्धान्तों के विरुद्ध है.”

1951 के शरणार्थी कन्वेन्शन में स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि शरणार्थियों को, किसी देश में शरण या पनाह लेने के लिए, अनियमित रूप से दाख़िल होने के लिए विवश होना पड़ता है. ब्रिटेन ने भी इस कन्वेन्शन पर हस्ताक्षर किए हुए हैं.

युद्ध या उत्पीड़न से बचने के लिए भागने वाले बहुत से लोग, पासपोर्ट या वीज़ा जैसे औपचारिक यात्रा-दस्तावेज़ प्राप्त करने में समर्थ नहीं होते हैं. इसलिए अक्सर, उनके लिए प्रवासन के, सुरक्षित और “वैध” मार्ग उपलब्ध नहीं होते हैं.

यूएन शरणार्थी उच्चायुक्त फ़िलिपो ग्रैंडी ने कहा कि ब्रिटेन ने, अपनी अन्तरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए, दशकों से ज़रूरतमन्द शरणार्थियों को पनाह दी है. ये एक ऐसी परम्परा है जिस पर देश को गर्व महसूस होता रहा है.

ये नया विधेयक, उस क़ानूनी ढाँचे को समाप्त करता है जिसने, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करने वाले गम्भीर ख़तरों का सामना करने वाले, बहुत से शरणार्थियों को संरक्षण मुहैया कराया है.

यूएन शरणार्थी और मानवाधिकर विशेषज्ञों का कहना है कि ये विधेयक, ब्रिटेन में पहले ही निर्बल हालात में रहने वाले शरणार्थियों की परिस्थितियों को और भी बदतर बनाएगा, उनके मानवाधिकार प्रयोग को गम्भीर रूप से सीमित करेगा और बहुत से शरणार्थियों को बन्दीकरण और अनेक तरह की कठिनाइयों के जोखिम में धकेल देगा.

शरणार्थियों के स्वास्थ्य, बेहतर जीवन-यापन और रोज़गार के अधिकारों पर जोखिम है, जिससे उनके शोषण व दुर्व्यवहार की चपेट में घिर जाने का भी ख़तरा है.