वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां

भारत: घरेलू कामगारों को मान्यता देने के लिए, ILO का नया मेट्रो अभियान

दिल्ली मेट्रो में 'घरेलू काम ही देखभाल का काम है' अभियान की शुरुआत के दौरान अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अधिकारी उपस्थित थे।
ILO/Akriti Paracer आईएलओ ने घरेलू श्रमिको के अधिकारों के लिए एक नया जागरूकता अभियान शुरू किया.

भारत: घरेलू कामगारों को मान्यता देने के लिए, ILO का नया मेट्रो अभियान

मानवाधिकार

भारत में अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने, मेट्रो रेल के ज़रिए, घरेलू कामगारों के अधिकारों पर जागरूकता फैलाने के लिए, मंगलवार को एक नया अभियान शुरू किया है.

Tweet URL

भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर, शॉम्बी शार्प ने "घरेलू कामकाज, देखभाल का कार्य है" नामक इस अभियान को, मंगलवार को भारत में कैनेडा के उप उच्चायुक्त सहित कई गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में, दिल्ली के सुल्तानपुर मेट्रो स्टेशन पर हरी झंडी दिखाई.

मेट्रो सेवा की यैलो (पीली) लाइन से लगभग 45-50 लोगों का प्रतिनिधिमंडल रवाना हुआ, जो आगे जाकर ज़ोर बाग मैट्रो स्टेशन पर उतरा.

यह अभियान, भारत स्थित अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) कार्यालय ने, व्यापार संघों, नियोक्ताओं, व्यावसायिक संगठनों एवं नागरिक समाज संगठनों के अपने सामाजिक भागीदारों के साथ मिलकर शुरू किया है. 

इसका उद्देश्य - दिल्ली मेट्रो में सफ़र करने वाले विविध यात्रियों, ख़ासतौर पर महिलाओं व लड़कियों, और पुरुषों एवं लड़कों तक, घरेलू कामगारों को देखभाल श्रमिक मानते हुए, उनके अधिकारों एवं आईएलओ कन्वेंशन 189 के बारे में सन्देश प्रसार करना है. 

घरेलू कामकाज को उचित मान्यता नहीं

भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर, शॉम्बी शार्प ने इस अवसर पर कहा, “सभी मनुष्य, प्राप्तकर्ता और प्रदाता के रूप में देखभाल सेवाओं पर निर्भर हैं. देखभाल का अधिकांश कार्य, घरों में महिलाएँ करती हैं, जिन्हें अक्सर इसके लिए उचित मान्यता या पारिश्रमिक नहीं मिलता."

"आईएलओ का मैट्रो अभियान, घरों और अर्थव्यवस्था दोनों में, घरेलू कामगारों के योगदान को पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम है.”

घरेलू कामगार, श्रमिकों के सबसे कमज़ोर समूहों में आते हैं. निजी घरों में काम करने वाले ये कामगार, अक्सर रोज़गार की स्पष्ट शर्तों के बिना काम करते हैं, उन्हें पर्याप्त अहमियत नहीं मिलती और ज़्यादातर कामगार, बिना मान्यता काम करने के लिए मजबूर होते हैं. 

इनमें श्रमिकों की वो बड़ी और बढ़ती हुई श्रेणी भी शामिल है, जो अक्सर प्रवासी या वंचित समुदायों के सदस्य होते हैं. 

लम्बे समय से, घरेलू और देखभाल का काम, बिना वेतन या मान्यता के महिलाएँ करती आ रही हैं. 

पितृसत्तात्मक और पदानुक्रमित मानसिकता के कारण, घरेलू कामगारों के अधिकारों में सुधार में बाधाएँ आती र

घरेलू कामगारों के अधिकारों के बारे में जागरूकता अभियान के लिए ILO की प्रतिनिधि शोम्बी शार्प और घरेलू कामगारों और समुदाय के सदस्यों का एक समूह दिल्ली मेट्रो ट्रेन में सवार है।
ILO/Akriti Paracer

ही हैं, जिसके तहत महिलाओं के काम को कम करके आँका जाता है, और घरों को निजी स्थान मानकर, कार्यक्षेत्र की तरह विनियमित नहीं किया जाता. 

इन बाधाओं को तोड़ना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, और, इस सन्दर्भ में, ILO नए मानदंड बनाने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए कन्वेंशन 189 के अनुसमर्थन को बढ़ावा देता है. 

समुचित पारिश्रमिक मिले

देखभाल और घरेलू कामकाज पर नियमों से, ऐसा माहौल बनता है, जिसमें श्रमिकों का सम्मान हो, उन्हें महत्व दिया जाए और वे कार्यस्थल पर सुरक्षित रहें.

इस अवसर पर, भारत में आईएलओ के उप निदेशक सातोशी सासाकी ने उम्मीद व्यक्त करते हुए कहा, “दिल्ली मेट्रो में घरेलू कामगारों के लिए सभ्य कामकाज को बढ़ावा देने से, घरेलू कामगारों के अधिकारों को लेकर जागरूकता फैलाने में मदद मिलेगी, जिससे दिल्ली और उसके बाहर के इलाक़ों में, घरेलू कामगारों के जीवन में सुधार होगा.”

अभियान में भाग लेने वालों का दृढ़ विश्वास है कि घरेलू कामगारों को देखभाल कर्मियों के रूप में मान्यता देने से एक अधिक न्यायसंगत और टिकाऊ समाज का निर्माण होगा, जिसमें किसी को भी पीछे नहीं छोड़ा जाएगा.