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भारत: माहवारी से जुड़े मिथकों से निपटने और स्वच्छता प्रबन्धन की मुहिम

प्रतिमा सिंह, स्कूली छात्राओं को माहवारी स्वच्छता के बारे में जानकारी दे रही हैं.
UNICEF/Prashanth Vishwanathan
प्रतिमा सिंह, स्कूली छात्राओं को माहवारी स्वच्छता के बारे में जानकारी दे रही हैं.

भारत: माहवारी से जुड़े मिथकों से निपटने और स्वच्छता प्रबन्धन की मुहिम

महिलाएँ

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) ने भारत के झारखंड राज्य में माहवारी स्वच्छता प्रबन्धन प्रयोगशालाओं की स्थापना करने और सैनिट्री पैड के निपटान के लिए उपकरण (incinerators) तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इस कार्यक्रम के तहत, अब तक 500 शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जो अब दूर-दराज़ के इलाक़ों में जागरूकता फैलाकर, समुदायों में बदलाव लाने की मुहिम का हिस्सा हैं.

प्रिया कुमारी, झारखंड राज्य के गिरिडीह ज़िले के यूएमएस अरखांगो स्कूल में 8वीं कक्षा की छात्रा हैं. प्रिया दुनिया भर की उन करोड़ों लड़कियों में से हैं जिन्हें हर महीने माहवारी होती है. 

जब उन्हें माहवारी शुरू हुई तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि यह क्या हुआ. तब उन्होंने अपने शिक्षक के पास गई, जिन्होंने उन्हें इस बारे में जानकारी देते हुए, एक सैनिट्री पैड थमा दिया.

उन्होंने घर लौटने पर जब अपनी माँ को इस बारे में बताया, तो वह हैरान रह गईं. 

"मैंने अपनी माँ को बताया कि मैंने एक सैनिट्री नैपकिन का इस्तेमाल किया है, तो उन्होंने मुझसे पैड का इस्तेमाल करने के लिए साफ़ मना कर दिया. उनका मानना ​​था कि पैड को सार्वजनिक स्थान पर फेंकने से मैं जीवन भर के लिए बाँझ हो जाऊँगी." 

"उनके दिमाग में ऐसे और कई मिथक भरे पड़े थे, जैसेकि माहवारी के दौरान पेड़ों को ना छूना, माहवारी के प्रवाह को प्रबन्धित करने के लिए कपड़े का ही उपयोग करना, और अपने कपड़े अलग से धोकर सुखाना इत्यादि." 

"इन पाँच दिनों में मुझे अलग-थलग रहना पड़ता था और इस दौरान मुझे स्कूल जाने की भी अनुमति नहीं थी."

शिक्षक सरोजिनी टिप्पो, छात्राओं को माहवारी स्वच्छता के बारे में जागरूक करते हुए.
UNICEF/Prashanth Vishwanathan
शिक्षक सरोजिनी टिप्पो, छात्राओं को माहवारी स्वच्छता के बारे में जागरूक करते हुए.

माहवारी के 5 दिन ख़त्म होने के बाद जब प्रिया स्कूल लौटी, तो उसने तुरन्त अपने स्कूल की शिक्षिका, प्रतिमा सिंह के साथ अपनी कहानी साझा की. 

प्रतिमा ने प्रिया की माँ को बुलाया और उनकी मिथ्या भ्रान्तियों को दूर किया. इसके अलावा, प्रिया ने अपनी माँ से पैड का इस्तेमाल करने की अनुमति तो ली ही, साथ ही अपनी माँ को भी इसका इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया.

उसने अपनी माँ को कपड़े से संक्रमण की सम्भावना, पर्यावरण के नुक़सान और अन्य ख़तरों के बारे में जानकारी दी. इसके बाद, वो अपने घर की महिलाओं के साथ यह ज़रूरी ज्ञान साझा करने के लिए उत्सुक थी.

सामाजिक मानदंड

माहवारी एक लड़की के जीवन का एक नया चरण की शुरूआत का प्रतीक होता है. यह अपने साथ नई सम्वेदनशीलता लेकर आता है. लेकिन, मासिक धर्म के दौरान, कई किशोर लड़कियों को कलंक, उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है.

भेदभावपूर्ण सामाजिक मानदंड, सांस्कृतिक वर्जनाएँ और शौचालय एवं साफ़-सफ़ाई के उत्पादों जैसी बुनियादी सेवाओं की कमी, मासिक धर्म स्वास्थ्य और उचित स्वच्छता प्रबंधन में बाधा डालती हैं.

सालसूद गाँव की लीलमणि देवी एक माँ हैं और आजीविका के लिए धान के खेतों में काम करती हैं. उनकी बेटी, नमिता, राँची के सोनाहातु में स्थित आवासीय कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय में पढ़ती है. 

नमिता कुमारी बताती हैं, "यह पहली बार था जब मैंने और मेरी माँ ने सैनेटरी पेड देखा."
UNICEF/Prashanth Vishwanathan
नमिता कुमारी बताती हैं, "यह पहली बार था जब मैंने और मेरी माँ ने सैनेटरी पेड देखा."

14 साल की नमिता कुमारी ने बताया कि, "जब मुझे पहली बार माहवारी आई तो मेरी माँ ने अपनी पुरानी सूती साड़ी फाड़कर उसका इस्तेमाल करने को कहा."

"माहवारी के समय मुझे गोपनीयता में रहने के लिए कहा गया. मेरी माँ ने मुझे चुपचाप रहने, कपड़े धोने और सुखाने, और पास के तालाब में फेंकने की सलाह दी. मुझे लगा कि इससे तो पूरा तालाब ही दूषित हो जाएगा. "

"जब मैंने एक दोस्त से इस बारे में बात की, तो उसने सुझाव दिया कि हमें सैनिट्री नैपकिन का इस्तेमाल करना चाहिए."

जब नमिता स्कूल पहुँची, तो उसे माहवारी स्वच्छता प्रबन्धन केन्द्र लैब ले जाया गया, जहाँ की वार्डन ने उन्हें उचित स्वच्छता प्रक्रियाओं पर सलाह दी. नमिता बताती हैं, "सरोजिनी मैम ने मेरी माँ से भी इस बारे में बात दी और उन्हें गाँव के आंगनवाड़ी केन्द्र से पैड लाने की सलाह दी."

नमिता ने चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान के साथ उनकी बात आगे बढ़ाई, "यह पहली बार था जब हम दोनों में से किसी ने पैड देखा था."

यूनीसेफ़ की मुहिम

यूनीसेफ़ ने, भारत में अपने साझेदार संगठनों के साथ मिलकर, माहवारी स्वच्छता प्रबंधन (Menstrual Health and Hygiene Management.) प्रयोगशालाओं की स्थापना करने और पूरे राज्य में सैनिट्री नैपकिन के निपटान के लिए यंत्र (incinerators) निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. 

यूनीसेफ़, भारत में लड़कियों व महिलाओं के लिए, माहवारी सम्बन्धी स्वास्थ्य व स्वच्छता जागरूकता के लिए प्रयासरत है.
@UNICEF/Vishwanathan
यूनीसेफ़, भारत में लड़कियों व महिलाओं के लिए, माहवारी सम्बन्धी स्वास्थ्य व स्वच्छता जागरूकता के लिए प्रयासरत है.

MHM में अब तक 500 शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जो अब दूर-दराज़ के इलाक़ों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रयासरत हैं.

माहवारी के दौरान, स्कूल में पैड/कपड़े बदलने की चिन्ता, कमज़ोरी, भावनात्मक उतार-चढ़ाव और इसे दुनिया से छुपाने की कोशिश, इन सबसे लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

इसके मद्दनज़र, भारत में यूनीसेफ़ कार्यालय, माहवारी सम्बन्धी जागरूकता फैलाने के प्रयासरत है.MHM प्रयोगशालाओं, अपशिष्ट जलाने के लिए यंत्र, पैड बैन्क, साबुन बैन्क, और स्कूल-आधारित WASH (जल, स्वच्छता एवं साफ़-सफ़ाई) में सुधार किए जा रहे हैं, जिसमें सरकारी संसाधनों का उपयोग करके स्कूलों में नई WASH सुविधाएँ प्रदान करना और संचालन व रखरखाव पर प्रशिक्षण शामिल है.

कार्यक्रम के अन्तर्गत, टिकाऊ विकास एजेंडा के छठे लक्ष्य (SDG6) के मुताबिक़, शहरी, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों की किशोरियों को प्रशिक्षित किया जाता है और लड़कियों के जीवन के प्रमुख क्षेत्रों, जैसे स्कूल, घर, समुदाय और सार्वजनिक स्थानों में MHM के महत्व के बारे में जागरूक किया जाता है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.