सीमाओं से परे: अन्तरराष्ट्रीय जल-क्षेत्र सन्धि की अहमियत पर एक नज़र
संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों ने दो दशकों से जारी गहन वार्ता के बाद, सोमवार को एक ऐतिहासिक, क़ानूनी रूप से बाध्यकारी समुद्री जैवविविधता संरक्षण समझौते को पारित कर दिया. इस सन्धि का उद्देश्य राष्ट्रीय सीमाओं से परे जल क्षेत्र में संरक्षण और सतत प्रबन्धन को सुनिश्चित करना है. राष्ट्रीय न्यायिक-अधिकार क्षेत्र से परे यह जल क्षेत्र, महासागरों के लगभग दो-तिहाई हिस्से तक फैला हुआ है. एक नज़र पाँच अहम बातों पर...
1. सीमाओं के पार संरक्षण
राष्ट्रीय न्यायिक अधिकार-क्षेत्र से परे समुद्री जैवविविधता पर अन्तर-सरकारी सम्मेलन (BBNJ) द्वारा पारित की गई ‘high seas’ सन्धि, वर्तमान और भावी पीढ़ियों की ओर से महासागर प्रबन्धन की अगुवाई करने पर लक्षित है.
इस नए समझौते में 75 अनुच्छेद हैं जोकि समुद्री पर्यावरण के संरक्षण, देखभाल और ज़िम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देने पर केन्द्रित हैं. इसके प्राथमिक उद्देश्यों में समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों की अखंडता को बरक़रार रखना, समुद्री जैव विविधता के आन्तरिक महत्व का संरक्षण करना और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग को सुनिश्चित करना शामिल है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने सोमवार को प्रतिनिधियों को बताया, “महासागर हमारे ग्रह के जीवन का आधार है और आज, आपने उन्हें एक नई स्फूर्ति और उम्मीद प्रदान की है जिससे महासागर को अपनी लड़ाई लड़ने का मौक़ा मिलेगा.”
2. स्वच्छ महासागर
तटीय पारिस्थितिकी तंत्र, ज़हरीले रसायनों और लाखों टन प्लास्टिक अपशिष्ट से प्रदूषित हो रहे हैं, जिससे मछलियाँ, समुद्री कछुए, समुद्री पक्षी और स्तनधारियों जीवों की या तो मौत हो रही है या वे घायल हो रहे हैं. अन्तत: वे खाद्य श्रृंखला के ज़रिए मनुष्यों तक पहुँच रहे हैं जो उनका सेवन करते हैं.
टिकाऊ विकास लक्ष्यों पर केन्द्रित नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में एक करोड़ 70 लाख मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक महासागरो तक पहुँची, जोकि 85 प्रतिशत समुद्री कचरा है. वर्ष 2040 तक इस आँकड़े के दोगुना या तिगुना होने की आंशका है.
संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, कारगर कार्रवाई के अभाव में वर्ष 2050 तक समुद्र में मछलियों से अधिक मात्रा प्लास्टिक की हो सकती है.
इस सन्धि का उद्देश्य समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ता प्रदान करना है, और इसमें प्रदूषण के ज़िम्मेदारों द्वारा ही भुगतान किए जाने और विवाद सुलझाने के लिए व्यवस्था समेत अन्य प्रावधान हैं.
इस सन्धि के प्रावधानों के तहत, देशों को अपने राष्ट्रीय न्यायिक-अधिकार सीमाओं से परे, अन्तरराष्ट्रीय जल-क्षेत्र में किसी भी प्रकार की गतिविधि के सम्भावित पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करना होगा.
3. मछली भंडारों का सतत प्रबन्धन
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विश्व भर में एक-तिहाई से अधिक मछली भंडारों का अत्यधिक दोहन किया जाता है.
नई सन्धि, क्षमता निर्माण और समुद्री प्रौद्योगिकी के हस्तान्तरण के महत्व को रेखांकित करती है, जिसके तहत संस्थागत क्षमता और राष्ट्रीय नियामन ढाँचे को विकसित किया जाना और उसे मज़बूती प्रदान किया जाना अहम होगा.
इसमें क्षेत्रीय समुद्री संगठनों और क्षेत्रीय मत्स्य पालन प्रबन्धन संगठनों के बीच रचनात्मक सहयोग को बढ़ाना भी है.
4. तापमान में कमी लाना
वैश्विक तापमान में वृद्धि, महासागरों के तापमान को बढ़ा रही है, जिससे अधिक संख्या में गहन तूफानों का सामना करना पड़ रहा है, समुद्री जल स्तर बढ़ रहा है और तटीय भूमि का खारापन भी बढ़ रहा है.
इन गम्भीर चिन्ताओं की पृष्ठभूमि में, यह सन्धि दिशानिर्देश प्रदान करती है, जिनमें महासागर प्रबन्धन के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की सिफ़ारिश भी है.
इससे जलवायु परिवर्तन और महासागर अम्लीकरण के नकारात्मक प्रभावों से निपटने के लिए पारिस्थितिकी तंत्रों की सहनसक्षमता का निर्माण और उनकी अखंडता को बहाल व बरक़रार रखा जा सकेगा.
सन्धि के प्रावधानों में आदिवासियों और स्थानीय समुदायों के अधिकारों व उनके पारम्परिक ज्ञान, वैज्ञानिक अनुसंधान की स्वतंत्रता की अहमियत को पहचाना गया है और लाभों को निष्पक्ष व न्यायसंगत ढंग से साझा किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है.
5. 2030 एजेंडा के लिए महत्वपूर्ण
यूएन प्रमुख ने सोमवार को कहा कि यह नया समझौता समुद्र के समक्ष मौजूद जोखिमों से निपटने और महासागरों से सम्बन्धित लक्ष्यों व उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अति-महत्वपूर्ण है.
इनमें टिकाऊ विकास पर आधारित 14वाँ लक्ष्य भी है, जोकि 2025 तक सभी प्रकार के समुद्री प्रदूषण को रोकने और उनमें उल्लेखनीय कमी लाने पर लक्षित है. साथ ही, विज्ञान आधारित प्रबन्धन योजनाओं से अत्यधिक मछली पकड़े जाने के रुझानों को रोकना होगा ताकि कम से कम समय में मछली भंडारों को बहाल किया जा सके.
नए समझौते के ज़रिये क्षेत्र-आधारित प्रबन्धन उपायों को स्थापित करना सम्भव होगा, ताकि ‘high seas’ और अन्तरराष्ट्रीय समुद्री तल में महत्वपूर्ण पर्यावासों व प्रजातियों का संरक्षण व सतत प्रबन्धन किया जा सके.
इस सन्धि में, लघु द्वीपीय देशों और भूमिबद्ध विकासशील देशों के समक्ष मौजूद विशिष्ट परिस्थितियों पर भी विचार किया गया है.
संयुक्त राष्ट्र महासभा के पूर्व अध्यक्ष कसाबा कोरोसी ने सोमवार को अन्तरसरकारी सम्मेलन के प्रतिनिधियों को बताया, “हमारे पास एक नया साधन है."
उन्होंने कहा कि ये ऐतिहासिक उपलब्धि राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर के क्षेत्रों में समुद्री जैविक विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग के लिए आपकी सामूहिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है. आप सभी ने एकजुट होकर, हमारे समुद्रों के बेहतर संचालन की नींव रखी है ताकि उन्हें भावी पीढ़ियों के लिए सुनिश्चित किया जा सके.