भारत: यूनीसेफ़ के सहयोग से, मासिक धर्म सम्बन्धित वर्जनाएँ तोड़ने की मुहिम
भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश के आदिवासी इलाक़ों में यूनीसेफ़ के समर्थन से एक स्वयंसेवक आधारित कार्यक्रम ‘युवोदय’ चलाया जा रहा है, जिसके ज़रिए क्षेत्र के ही स्वयंसेवकों को साथ लेकर, महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े पूर्वाग्रहों को दूर करने जैसी अनेक रूढ़िवादी प्रथाओं के विरूद्ध अभियान चलाया जा रहा है. ऐसी ही एक साहसिक युवोदय स्वयंसेवक हैं - सन्तोषी, जिनके साहस ने इलाक़े में माहवारी पर जागरूकता बढ़ाकर, लड़कियों को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार दिया.
पहली बार उसे मासिक धर्म रात के अन्धेरे में आया. छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले के दरभा ब्लॉक के दूर-दराज़ आदिवासी गाँव छिन्दवाड़ा की रहने वाली सन्तोषी, नीन्द खुलने पर हैरान रह गईं. वो मासिक धर्म से अनजान थीं इसलिए घबराईं हुई थीं. फिर सन्तोषी की माँ ने उन्हें प्यार से गले लगाकर समझाया कि यह उनकी उम्र की लड़कियों के लिए एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है.
अब 18 साल की हो चुकी सन्तोषी ने, माहवारी शुरू होने के बाद, अपने आप को उन सदियों पुरानी पारम्परिक मान्यताओं और मासिक धर्म सम्बन्धित कठोर प्रतिबन्धों के जाल में फँसा हुआ पाया, जो उनके गाँव में व्याप्त थीं.
वो हर महीने, बिना सवाल किए उन प्रथाओं का पालन करने लगीं, जो उनकी माँ ने उन्हें सिखाई थीं. ख़ामोश रहकर इन परम्पराओं का भार उठाती सन्तोषी जानती थीं कि इन प्रथाओं को बदलने की ज़रूरत है.
उसने महसूस किया कि प्रचलित मानसिकता को रातों-रात नहीं बदला जा सकता. उनके गाँव में व्याप्त मासिक धर्म से जुड़ी पारम्परिक मान्यताओं और वर्जनाओं की पैठ बहुत गहरी थी और उनमें बदलाव के लिए भारी विरोध करना लाज़मी था. लेकिन सन्तोषी ने, उम्मीद की एक किरण थामकर लोगों की धारणाओं को बदलने का संकल्प लिया, एक बार में एक व्यक्ति की धारणा में बदलाव लाकर.
जैसे ही उन्होंने कक्षा 12 की परीक्षा पूरी की, सन्तोषी ने बदलाव का कारक बनने का निश्चय किया. वह समझ गईं कि परिवर्तन के लिए धैर्य और दृढ़ता की आवश्यकता होती है.
धैर्य की ज़रूरत
सन्तोषी बताती हैं. "रातों-रात सब-कुछ बदलना सम्भव नहीं है, लेकिन जब भी मुझे मौक़ा मिलता है, मैं लोगों को शिक्षित करती हूँ. मैंने अपने परिवार को भी शिक्षित किया है, और मैं उनमें कुछ बदलाव देख रही हूँ."
गाँव में मासिक धर्म के दौरान लड़कियों पर गम्भीर प्रतिबन्ध लगाए जाते थे. उन्हें घर के कामों में हिस्सा लेने, रसोई में प्रवेश करने और यहाँ तक कि पूजाघर जाने की भी मनाही थी. सन्तोषी ने इन प्रथाओं को ख़ुद जिया था, जिससे उन्हें चुनौती देने का उनका दृढ़ संकल्प और बढ़ गया.
युवोदय स्वयंसेवक सन्तोषी कहती हैं, “युवोदय में शामिल होने से पहले, मेरा परिवार, इन सभी अजीब प्रथाओं का पालन करता था. लेकिन मैं अब अपने माता, पिता और भाई में बदलाव देख रही हूँ. अब मुझे रसोईघर में जाने और कुएँ से पानी लाने से नहीं रोका जाता. हालाँकि, मासिक धर्म के दौरान अब भी, खाना पकाना और पूजाघर में जाना वर्जित है.”
सन्तोषी को अपने घर में भी विरोध का सामना करना पड़ा. फिर भी, वो अपने मिशन के प्रति दृढ़ रही, और उन्होंने लड़कियों को अपनी आवाज़ उठाने और ज़ोर-ज़बरदस्ती का विरोध करने के लिए प्रोत्साहित किया.
सन्तोषी ने, समाज में गहरी जड़े जमा चुकीं, शर्म से ढकी हुई उन वर्जनाओं को धता बताते हुए, निडर होकर मासिक धर्म के बारे में बात करनी शुरू की.
उन्होंने कहा, "इन प्रथाओं को समाप्त होना चाहिए. मासिक धर्म को एक प्राकृतिक प्रक्रिया माना जाना चाहिए, इसमें कुछ गन्दा नहीं है."
वो अपना ख़ाली समय, गाँव की 18 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं और लड़कियों को शिक्षित करने, मासिक धर्म से जुड़े हानिकारक निषेधों और ग़लत धारणाओं के ख़िलाफ़ जागरूकता फैलाने में व्यतीत करने लगीं.
कड़ी प्रथाएँ
उनके आदिवासी गाँव में यह मान्यता प्रचलित थी कि माहवारी के दौरान लड़की के हाथ से पानी पीने से, घर के पुरुष सदस्य अशुद्ध हो जाते हैं. कुछ परिवारों में रजस्वला लड़कियों को फ़र्श पर सोने के लिए भी मजबूर किया जाता था. लेकिन, सन्तोषी के परिवार के सदस्य इन प्रथाओं से दूर थे. उन्होंने, परिवार के लिए पानी लाने जैसे रोज़मर्रा के कार्यों में उनकी भागेदारी का विरोध नहीं किया.
सन्तोषी के लिए युवोदय, बदलाव का एक उत्प्रेरक बन गया. बस्तर ज़िला प्रशासन के नेतृत्व में, यूनीसेफ़ द्वारा समर्थित इस स्वयंसेवक-आधारित कार्यक्रम ने, उनके और अन्य लोगों के लिए जीवन रेखा का काम किया. इस अभियान ने, उन्हें ज्ञान और कार्रवाई के बीच की खाई पाटने हेतु सशक्त बनाया, उन्हें पुरातन-पंथी धारणाओं को चुनौती देने के उपकरण व उपाय उपलब्ध कराए.
सन्तोषी, एक स्वयंसेवक के रूप में प्रेरणा की किरण बनीं, प्रश्नों का जवाब देतीं और अपने नए ज्ञान को उन लोगों के साथ बाँटतीं, जो इसे पाने के लिए उत्सुक थे.
मासिक धर्म के आस-पास अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को त्यागने के अनिच्छुक सामाजिक ताने-बाने से जूझती सन्तोषी, इस काम में आने वाली चुनौतियों से पूरी तरह वाक़िफ़ थीं.
इतनी कठिन लड़ाई के बावजूद, सन्तोषी का हौसला कम नहीं हुआ. वह एक उज्ज्वल भविष्य का आरम्भ करने के लिए तरस रही थीं, जहाँ मासिक धर्म को कलंकित करने के बजाय, उसका उत्सव मनाया जाए - एक ऐसा भविष्य, जहाँ लड़कियाँ अपने मासिक धर्म को गर्व के साथ और निडरता से स्वीकार कर सकें.
उनके शब्दों में भावनात्मकता की गूंज साफ़ झलक रही थी, जब उन्होंने कहा "माहवारी से जुड़ी पाबन्दियाँ और सदियों पुरानी वर्जनाओं की बेड़ियाँ, अब हमें तोड़नी होंगी."