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रोगाणुरोधी प्रतिरोध से निपटने के लिए प्रदूषण में कमी लाने पर बल

मायकोबैक्टीरियम टीबी बैक्टीरिया का एक कल्पना चित्र. इस बैक्टीरिया पर एंटीबॉयोटिक दवाओं का असर नहीं होता.
CDC/Alissa Eckert, James Archer मायकोबैक्टीरियम टीबी बैक्टीरिया का एक कल्पना चित्र. इस बैक्टीरिया पर एंटीबॉयोटिक दवाओं का असर नहीं होता.

रोगाणुरोधी प्रतिरोध से निपटने के लिए प्रदूषण में कमी लाने पर बल

स्वास्थ्य

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने मंगलवार को अपनी एक नई रिपोर्ट में चेतावनी जारी की है कि वर्ष 2050 तक, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटी माइक्रोबियल प्रतिरोध) के कारण हर साल लगभग एक करोड़ लोगों तक की मौत हो सकती है.

बारबेडॉस के ब्रिजटाउन में जारी की गई इस रिपोर्ट में औषधि निर्माता कम्पनियों, कृषि व स्वास्थ्य देखभाल सैक्टर से उपजने वाले प्रदूषण पर रोक लगाने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है.

इस अध्ययन में एंटी माइक्रोबियल प्रतिरोध के पर्यावरणीय आयामों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है.

विषाणु, जीवाणु, फफून्दी और अन्य परजीवों में समय बीतने के साथ होने वाले बदलावों के कारण रोगाणुरोधी प्रतिरोध विकसित हो जाता है और एंटीबायोटिक व अन्य जीवनरक्षक दवाएँ अनेक प्रकार के संक्रमणों पर असर नहीं कर पाती. 

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रिपोर्ट में ‘सुपरबग’ - हर प्रकार के बायोटिक के लिए प्रतिरोधी हो चुके बैक्टीरिया के प्रकार – को उभरने व फैलने से रोकने में कमी लाने के लिए भी मज़बूत कार्रवाई का आग्रह किया गया है.

साथ ही, एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध के अन्य मामलों की भी रोकथाम की जानी होगी, जिसका मानव, पशु व पौधों के स्वास्थ्य पर गम्भीर असर हो रहा है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध को स्वास्थ्य के लिए 10 शीर्ष वैश्विक ख़तरों में चिन्हित किया है.

वर्ष 2019 में, दुनिया भर में लगभग 12 लाख 70 हज़ार लोगों की मौत की वजह, सीधे तौर पर दवाओं के लिए प्रतिरोधी संक्रमण को बताया गया था.

कुल मिलाकर, विश्व में लगभग 50 लाख मौतों को जीवाणु सम्बन्धी मौतों से जोड़ कर देखा गया है.

भोजन व स्वास्थ्य पर जोखिम

एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक, सीधे तौर पर रोगाणुरोधी प्रतिरोध के कारण हर साल एक करोड़ अतिरिक्त मौतें होने की आशंका है, जोकि 2020 में कैंसर की वजह से वैश्विक मृतक संख्या के बराबर है.

एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध के कारण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इस दशक के अन्त तक, वार्षिक तीन हज़ार 400 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की जा सकती है.

इससे लगभग ढाई करोड़ लोगों के निर्धनता के गर्त में धँसने की आशंका है.

बताया गया है कि औषधि निर्माण, कृषि व स्वास्थ्य देखभाल सैक्टर, रोगाणुरोधी प्रतिरोध के विकसित होने और पर्यावरण में फैलने के मुख्य कारक हैं.

इसके अलावा, यह साफ़-सफ़ाई की ख़राब व्यवस्था, सीवर और नगर पालिका की जल प्रणालियों से आने वाले प्रदूषकों से भी फैलता है.  

तिहरा पर्यावरणीय संकट

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की कार्यकारी निदेशक इन्गेर ऐंडर्सन ने बताया कि पृथ्वी तिहरे संकटों – जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैवविविधता हानि – से जूझ रही है, जिनके कारण यह स्थिति उपजी है.

“वायु, मृदा और जलमार्गों में प्रदूषण से एक स्वच्छ व स्वस्थ पर्यावरण का मानवाधिकार कमज़ोर होता है.”

“जो कारक पर्यावरण क्षरण के लिए ज़िम्मेदार हैं, उनके कारण ही एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की स्थिति बद से बदतर हो रही है.”

उन्होंने सचेत किया कि एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध के प्रभाव से हमारे स्वास्थ्य व खाद्य प्रणालियाँ तबाह हो सकती हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध को स्वास्थ्य के लिए 10 शीर्ष वैश्विक ख़तरों में चिन्हित किया है.
© Unsplash/Volodymyr Hryshchenko

कारगर जवाबी उपाय

रिपोर्ट बताती है कि रोगाणुरोधी प्रतिरोधी की चुनौती पर पार पाने के लिए विविध क्षेत्रों में जवाबी कार्रवाई की आवश्यकता होगी, और ऐसा करते समय आमजन, पशुओं, पौधों व पर्यावरण के स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाना होगा.

इन सभी का स्वास्थ्य आपस में नज़दीकी से जुड़ा है और एक दूसरे पर निर्भर है.

यह संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूएन खाद्य एवं कृषि संगठन और पशु स्वास्थ्य के लिए विश्व संगठन द्वारा विकसित किए गए ‘One Health’ फ़्रेमवर्क के अनुरूप है.

यह रिपोर्ट को एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध पर वैश्विक नेताओं के समूह की छठी बैठक के दौरान जारी की गई, जिसकी अध्यक्षता बारबेडॉस की प्रधानमंत्री मिया मोटले ने की.

रिपोर्ट में प्राकृतिक पर्यावरण के क्षरण और रोगाणुरोधी प्रतिरोध में उभार की रोकथाम करने के उपाय प्रस्तुत किए गए हैं, जिसके लिए ख़राब साफ़-सफ़ाई व्यवस्था, सीवर, समुदाय और नगर पालिका में कचरे में प्रदूषण के मुख्य कारकों से कारगर ढंग से निपटा जाना होगा.

इसके लिए, राष्ट्रीय स्तर पर स्फूर्तिवान शासन व्यवस्था सुनिश्चित करने, योजनाएँ बनाने, नियामन व क़ानूनी फ़्रेमवर्क पर बल दिया गया है. साथ ही, एकीकृत जल प्रबन्धन में बेहतरी के लिए वैश्विक प्रयासों को बढ़ावा देना होगा.