भारत: गंगा नदी को फिर से जीवन्त करने की पहल को संयुक्त राष्ट्र सम्मान

नाममि गंगे परियोजना, भारत की पावन मानी जाने वाली गंगा नदी को स्वच्छ करने की भारत सरकार की एक महत्वाकाँक्षी योजना है.
Vis M/Wikimedia Commons
नाममि गंगे परियोजना, भारत की पावन मानी जाने वाली गंगा नदी को स्वच्छ करने की भारत सरकार की एक महत्वाकाँक्षी योजना है.

भारत: गंगा नदी को फिर से जीवन्त करने की पहल को संयुक्त राष्ट्र सम्मान

जलवायु और पर्यावरण

संयुक्त राष्ट्र ने भारत की पवित्र गंगा नदी को फिर से जीवन्त करने की एक पहल, नमामि गंगे की सराहना करते हुए, उसे प्राकृतिक जगत को पुनर्जीवित करने पर केन्द्रित 10 अग्रणी प्रयासों में स्थान दिया है.

सभी चयनित पहल, संयुक्त राष्ट्र से समर्थन, वित्त पोषण या तकनीकी विशेषज्ञता प्राप्त करने की पात्र हैं,

ये उपाय दर्शाते हैं कि पर्यावरण पैरोकार किस तरह, पृथ्वी पर क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्रों पर मरहम लगाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र ने पुनर्बहाली पर लक्षित अपनी आरम्भिक 'World Restoration Flagships' में इस पहल को शामिल किया है, जिसके ज़रिये, अब तक गंगा नदी की लम्बाई के लगभग 15 प्रतिशत हिस्से को फिर से बहाल किया जा चुका है.

यूएन पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक, इन्गेर ऐंडर्सन ने कहा, “नमामि गंगे, भारत में लाखों-करोड़ों लोगों की जीवन रेखा, गंगा नदी को फिर से जीवन्त करने का एक महत्वाकाँक्षी प्रयास है."

"ऐसे समय में, जब यह अहम हो गया है कि प्रकृति के साथ हमारे शोषक सम्बन्धों में बदलाव लाना ज़रूरी है, इस पुनर्बहाली के सकारात्मक प्रभावों को कम करके नहीं आँका जा सकता.”

कैनेडा के माँट्रियाल शहर में संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन के दौरान यह घोषणा की गई, जहाँ विश्व भर से देशों की सरकारें, अगले दशक में प्रकृति संरक्षण के लक्ष्यों पर सहमत के लिये चर्चा में जुटे हैं.

सम्मेलन में विचार-विमर्श के दौरान, पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्बहाली के लिये, एक सम्भावित वैश्विक लक्ष्य भी तय होने की आशा है.

विशेषज्ञों के अनुसार, मानव गतिविधियों के कारण, पृथ्वी पर तीन-चौथाई भूमि व दो-तिहाई समुद्री पर्यावरण में बड़ा बदलाव आया है, जिससे 10 लाख प्रजातियों पर विलुप्ति का ख़तरा मंडरा रहा है.

नमामि गंगे परियोजना

गंगा का विशाल बेसिन, 52 करोड़ लोगों के साथ-साथ, पौधों और जानवरों की 25 हज़ार से अधिक प्रजातियों का घर है.

भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इस क्षेत्र का योगदान 40 प्रतिशत है, और यहाँ स्थित वन, कार्बन के महत्वपूर्ण भण्डार हैं, जोकि जलवायु संकट से निपटने की दृष्टि से अहम है. 

मगर, प्रदूषण, भूमि क्षरण और जन जागरूकता की कमी ने, गंगा के पारिस्थितिकी तंत्र पर अभूतपूर्व दबाव डाला है. प्राकृतिक स्थलों को संरक्षित और पुनर्स्थापित करने के लिये, भारत सरकार ने ‘नमामि गंगे’ नामक एक महत्वाकाँक्षी प्रयास शुरू किया.

इसका उद्देश्य, प्रदूषण को कम करने और वनों की कटाई पर रोक लगाते हुए, पवित्र मानी जाने वाली गंगा नदी से लोगों के जुड़ाव को फिर से बहाल करना है.

दो हज़ार 525 किलोमीटर लम्बी नदी में से डेढ़ हज़ार किलोमीटर हिस्से का कायाकल्प किया जा चुका है और 30 हज़ार हैक्टेयर जंगलों को बहाल किया गया है.

इस उपाय से, वर्ष 2030 तक 1 करोड़ 50 लाख टन कार्बन अलग करने में मदद मिलने की उम्मीद है.

पारिस्थितिकी तंत्रों की पुनर्बहाली

इस प्रयास और अन्य अग्रणी पहल को पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्बहाली के लिये संयुक्त राष्ट्र दशक के तहत चयनित किया गया है, जोकि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) और संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन (एफ़एओ) द्वारा समन्वित एक वैश्विक मुहिम है.

इसका लक्ष्य है, सम्पूर्ण ग्रह में प्राकृतिक स्थलों के क्षरण की रोकथाम करना और उसकी दिशा पलटना.

पेरिस जलवायु समझौते, जैव विविधता के लिये आइची लक्ष्य, भूमि क्षरण तटस्थता लक्ष्य और बॉन चुनौती के अंतर्गत लिये गए संकल्पों में, देशों ने 1 अरब हैक्टेयर क्षेत्र को फिर से बहाल करने का वादा किया है, जिसका आकार चीन से भी बड़ा है. 

हालाँकि, इस बहाली की प्रगति या गुणवत्ता के बारे में जानकारी अभी कम है.

विश्व पुनर्बहाली फ़्लैगशिप में चयनित सभी 10 पहल की प्रगति पर पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्बहाली निगरानी फ़्रेमवर्क के ज़रिये पारदर्शिता सुनिश्चित करते हुए निगरानी की जाएगी.