वैश्विक स्वास्थ्य: बढ़ती विषमताओं की बड़ी क़ीमत चुका रहे हैं महिलाएँ व बच्चे

लेक चाड क्षेत्र में निर्बल महिलाएँ व बच्चे अब विस्थापितों के लिये बनाये गए एक राहत शिविर में रह रहे हैं.
© UNICEF/Frank Dejongh
लेक चाड क्षेत्र में निर्बल महिलाएँ व बच्चे अब विस्थापितों के लिये बनाये गए एक राहत शिविर में रह रहे हैं.

वैश्विक स्वास्थ्य: बढ़ती विषमताओं की बड़ी क़ीमत चुका रहे हैं महिलाएँ व बच्चे

स्वास्थ्य

संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट दर्शाती है कि दुनिया भर में कोविड-19 महामारी, हिंसक टकराव और जलवायु परिवर्तन के कारण महिलाओं व बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा है. रिपोर्ट में इन वैश्विक संकटों से बच्चों, युवजन और महिलाओं पर विनाशकारी नतीजे होने की आंशका व्यक्त की गई है.

जर्मनी की राजधानी में विश्व स्वास्थ्य शिखर बैठक के दौरान जारी की गई यह रिपोर्ट दर्शाती है कि टिकाऊ विकास लक्ष्यों के अहम संकेतकों और बाल कल्याण की लगभग हर कसौटी पर स्पष्ट रूप से गम्भीर गिरावट देखी गई है.

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बताया गया है कि पिछले दो वर्षों में खाद्य असुरक्षा, भूख, बाल विवाह, अंतरंग साथी द्वारा हिंसा का जोखिम, किशोर उम्र में मानसिक अवसाद व बेचैनी, इन सभी मामलों में वृद्धि हुई है.

Protect the Promiseशीर्षक वाली इस रिपोर्ट को विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष, यौन व प्रजनन स्वास्थ्य के लिये यूएन एजेंसी, और अन्य साझेदार संगठनों ने प्रकाशित किया है.

यूएन महासचिव द्वारा महिलाओं, बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य के लिये पेश की गई रणनीति के तहत, प्रगति का आकलन करने के लिये यह द्वि-वार्षिक अध्ययन जारी किया गया है.

एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2021 में क़रीब ढाई करोड़ बच्चों का या तो आंशिक टीकाकरण हुआ या फिर वे टीकाकरण से पूरी तरह वंचित रहे, जिससे अनेक जानलेवा बीमारियों से पीड़ित होने का जोखिम बढ़ता है.

वर्ष 2019 की संख्या की तुलना में यह आँकड़ा 60 लाख अधिक है. वैश्विक महामारी के दौरान लाखों बच्चे स्कूलों के दायरे से बाहर रहे, और अनेक बच्चों के लिये तो यह अवधि एक साल से भी अधिक थी.

बताया गया है कि 104 देशों व क्षेत्रों में 80 प्रतिशत बच्चों ने स्कूलों में तालाबन्दी के कारण पढ़ाई-लिखाई में नुक़सान का अनुभव किया.

कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से अब तक, एक करोड़ पाँच लाख बच्चे अपने एक अभिभावक या देखभाल करने वाले व्यक्ति को खो चुके हैं.

चिन्ताजनक गिरावट

विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने बताया कि कोविड-19 महामारी की वजह से महिलाओं, बच्चों और किशोरों के दीर्घकालीन स्वास्थ्य व कल्याण पर असर स्पष्ट होता जा रहा है.

इन हालात में उनके स्वस्थ व उत्पादक जीवन जीने के अवसरों में तेज़ गिरावट आई है.

“वैश्विक महामारी से उबरते समय, महिलाओं, बच्चों व युवजन के स्वास्थ्य की रक्षा करना और उसे बढ़ावा देना, वैश्विक पुनर्बहाली को समर्थन देने व उसे बरक़रार रखने के लिये अहम है.”

यौन व प्रजनन स्वास्थ्य के लिये यूएन एजेंसी की कार्यकारी निदेशक डॉक्टर नतालिया कानेम ने कहा कि अनेक देशों में यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य व अधिकारों के लिये राजनैतिक विरोध का सामना करना पड़ा है.

इन परिस्थितियों में महिलाओं, बच्चों और किशोरों के पास वे संरक्षण उपाय नहीं हैं, जोकि उन्हें एक दशक पहले उपलब्ध थे, और अनेक अन्य ने वो प्रगति नहीं देखी है जिसकी उन्हें ज़रूरत है.

रिपोर्ट में उन विस्तृत तथ्यों को भी प्रस्तुत किया गया है, जो दर्शाते हैं कि महिलाओं व किशोरों के लिये एक स्वस्थ जीवन गुज़ारने की सम्भावना उनके जन्म स्थान, उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति व क्षेत्र में हिंसक टकराव जैसे कारकों पर निर्भर करती हैं.

बांग्लादेश में, संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित, सामुदायिक कार्यकर्ता, लोगों को, कोरोनावायरस महामारी का मुक़ाबला करने के ऐहतियाती उपायों के रूप में, हाथ स्वच्छता के तरीक़ों के बारे में जागरूकता फैलाते हुए.
UNDP Bangladesh/Fahad Kaize
बांग्लादेश में, संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित, सामुदायिक कार्यकर्ता, लोगों को, कोरोनावायरस महामारी का मुक़ाबला करने के ऐहतियाती उपायों के रूप में, हाथ स्वच्छता के तरीक़ों के बारे में जागरूकता फैलाते हुए.

महत्वपूर्ण तथ्यों पर एक नज़र

- निम्न-आय वाले देश में जन्मे एक बच्चे की औसत जीवन प्रत्याशा (life expectancy) लगभग 63 साल है, जबिक उच्च-आय वाले देशों के लिये यह 80 वर्ष है. 2020 में अपना पाँचवा जन्मदिन मनाने से पहले ही 50 लाख बच्चों की मौत उन कारणों से हुई, जिनकी रोकथाम व उपचार सम्भव था.

- अधिकाँश मातृत्व, बाल व किशोर मौतें और मृत बच्चों के जन्म के सर्वाधिक मामले केवल दो क्षेत्रों, सब-सहारा अफ़्रीका और दक्षिण एशिया में सामने आते हैं.

- वर्ष 2020 में साढ़े चार करोड़ बच्चे गम्भीर कुपोषण का शिकार थे, जोकि एक ऐसी ख़तरनाक अवस्था है, जिसमें उनकी मौत होने, शारीरिक विकास प्रभावित होने और बीमार होने का जोखिम है. इनमें से क़रीब तीन-चौथाई बच्चे निम्नतर-मध्य-आय वाले देशों में रहते हैं.

- वर्ष 2020 में 14 करोड़ 90 लाख बच्चे नाटेपन का शिकार थे. अफ़्रीका एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ नाटेपन से प्रभावित बच्चों की संख्या पिछले 20 वर्षों में बढ़ी है.

- घरेलू विस्थापितों की संख्या के मामले में अग्रणी छह देशों – अफ़ग़ानिस्तान, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य, इथियोपिया, सूडान, सीरिया और यमन – सबसे अधिक खाद्य असुरक्षा का शिकार देशों में भी हैं.

- योरोप या उत्तर अमेरिका में महिलाओं की तुलना में सब-सहारा अफ़्रीका में एक महिला के गर्भावस्था या प्रसव सम्बन्धी कारणों से मौत होने की सम्भावना 130 गुना अधिक है.

रिपोर्ट में देशों की सरकारों से स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश करने, खाद्य असुरक्षा समेत सभी संकटों से निपटने और महिलाओं व युवजन का सशक्तिकरण सुनिश्चित करने की पैरवी की गई है.