मौजूदा दौर की एक विशाल चुनौती से निपटने में जलवायु पत्रकारिता की एक अहम भूमिका है.

जलवायु परिवर्तन और भ्रामक जानकारी की भरमार, मीडिया के लिये पाँच अहम सुझाव

UN News/Laura Quinones
मौजूदा दौर की एक विशाल चुनौती से निपटने में जलवायु पत्रकारिता की एक अहम भूमिका है.

जलवायु परिवर्तन और भ्रामक जानकारी की भरमार, मीडिया के लिये पाँच अहम सुझाव

जलवायु और पर्यावरण

यह एक तथ्य है: जलवायु परिवर्तन पर सार्वजनिक चर्चा और उससे निपटने के उपायों को आकार देने में मीडिया की अहम भूमिका है. जलवायु परिवर्तन पर विशेषज्ञों के अन्तरसरकारी आयोग (IPCC) ने भी अपनी नवीनतम रिपोर्ट में पहली बार इस तथ्य को रेखांकित किया है. जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा देने और भ्रामक सूचनाओं की भरमार पर पार पाने में मीडिया की भूमिका पर पाँच अहम बातें...

जलवायु परिवर्तन पर अन्तर-सरकारी पैनल (IPCC) के अनुसार, मीडिया में जनमानस बदल देने की इस क्षमता का उपयोग, वैश्विक तापमान में वृद्धि के लिये ज़िम्मेदार ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती करने और आम लोगों की लामबन्दी के लिये किया जा सकता है.

मगर, इस शक्ति का इस्तेमाल इसके विपरीत भी किया जा सकता है, और ये दर्शाता है कि मीडिया कम्पनियों और पत्रकारों के कन्धों पर कितना बड़ा दायित्व है.

आईपीसीसी के अनुसार, 59 देशों में कराया गया एक अध्ययन बताता है कि जलवायु-सम्बन्धी विषयों पर वैश्विक मीडिया कवरेज निरन्तर बढ़ रही है. वर्ष 2016-17 में 47 हज़ार लेखों की तुलना में, 2020-21 में 87 हज़ार लेख प्रकाशित हुए हैं.

आमतौर पर, मीडिया में जलवायु विज्ञान का प्रतिनिधित्व पहले से कहीं अधिक हुआ है, और कवरेज में समय के साथ सटीकता भी आई है.

इसके बावजूद, कुछ अवसरों पर, जलवायु परिवर्तन को सन्देह की नज़र से देखने वाले विरोधी पक्ष द्वारा संगठित ढंग से वैज्ञानिक तथ्य सम्बन्धी भ्रामक जानकारी भी फैलाई जाती है.

इससे ध्रुवीकरण बढ़ता है और जलवायु नीतियों के लिये इसके नकारात्मक नतीजे सामने आते हैं.

इसके अलावा, मीडियाकर्मियों ने इस विवाद में भी, किसी भी समस्या के दोनों पहलुओं को प्रस्तुत करने का सिद्धान्त अपनाया है.

इसमें ये जोखिम भी निहित है कि वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुके तथ्यों पर सन्देह को भी प्रमुखता से जगह दी जाए. जैसे कि यह तथ्य कि जलवायु परिवर्तन के लिये मानव गतिविधियाँ ज़िम्मेदार हैं.

इन हालात व चुनौतियों में पत्रकार किस तरह से सार्वजनिक भलाई के लिये अपना काम कर सकते हैं.

यूएन न्यूज़ ने इस विषय में पर्यावरण मामलों पर अमेरिका के एक बेहद सम्मानित व अनुभवी पत्रकार ऐंड्रयू रेवकिन से बात की, जोकि कोलम्बिया विश्वविद्यालय के अर्थ इंस्टीट्यूट में संचार व सततता पहल के संस्थापक निदेशक भी हैं.  

ऐंड्रयू रेवकिन पिछले अनेक दशकों से न्यूयॉर्क टाइम्स, डिस्कवर पत्रिका समेत अन्य पत्रिकाओं के लिये जलवायु परिवर्तन सम्बन्धित मुद्दों पर लिखते रहे हैं. साथ ही उन्होंने यूएन पर्यावरण कार्यक्रम, आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर यूएन कार्यालय, व अन्य यूएन एजेंसियों के कार्यक्रमों में शिरकत की है.

वर्ष 1989 में ऐमेज़ोन के जुरुआ नदी में पत्रकार ऐण्ड्रयू रेवकिन.
© Fernando Allegretti
पत्रकार ऐंड्रयू रेवकिन

उनका कहना है कि पत्रकार निम्न पाँच बातों को ध्यान में रखकर जलवायु कार्रवाई को समर्थन दे सकते हैं और इससे भ्रामक सूचनाओं की बाढ़ से भी निपटा जा सकता है.

1) अत्यधिक नाटकीयता से बचें

जलवायु में हो रहे बदलावों के कारण, अब लोग मौजूदा परिस्थितियों के बारे में जानकारी चाहते हैं, और वे ये भी समझना चाहते हैं कि इस चुनौती से निपटने के लिये वो और सरकारें क्या क़दम उठा सकती है.

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में मीडिया की तीन पारम्परिक भूमिकाएँ विशेष रूप से प्रासंगिक हैं:

  • दर्शकों व श्रोताओं को सूचित करना
  • एक प्रहरी के रूप में काम करना
  • सामाजिक मुद्दों पर मुहिम चलाना

ऐंड्रयू रेवकिन ने बताया कि पत्रकार, ज़्यादा सुनाई दे रही आवाज़ों की ओर आकर्षित हैं, और इस बात के आधीन हैं कि ये कहानियाँ किस तरह से आकार लेती हैं. फिर चाहे वो यूएन महासचिव का वक्तव्य हो, या फिर न्यूयॉर्क और लन्दन में कार्यकर्ताओं द्वारा सड़कों पर जाम लगाया जाना.

उन्होंने बताया कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आम जनता को समस्या सम्बन्धी कहानी ही ज़्यादा बताई जाती है.

आधुनिक मीडिया, प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं के बीच लोगों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करता है, और नाटकीय पहलुओं की ओर देखना एक आम चलन है.

“मैंने एक कार्यक्रम आयोजित किया, जहाँ मैं अन्य बातों के अलावा, लोगों से थोड़ा ठहरने और उनके इस्तेमाल वाले शब्दों के बारे में विचार करने के लिये कहता हूँ.”

“जब आप एक हिमनद के बारे में बात करने के लिये ‘ध्वस्त’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो क्या आप वैज्ञानिकों की तरह अनेक सदियों के कालक्रम में सोच रहे हैं, या फिर वैसे सोच रहे हैं जब विश्व व्यापार केन्द्र की इमारत ध्वस्त हुई थी?”

“हम जिस तरह शब्दों का चयन करते हैं, और वे किस तरह एक झूठा आभास दे सकते हैं, इस मामले में स्पष्टता बहुत अहम है.” 

यूनेस्को के अनुसार, और थॉमसन रॉयटर्स संस्थान के अध्ययन बताते हैं कि ‘क़यामत व निराशा’ के वृतान्त, कुछ लोगों का ध्यान भटका सकते हैं और फिर उनकी दिलचस्पी ख़त्म हो सकती है. 

ऐंड्रयू रेवकिन का मानना है कि “अति नाटकीयता से क्लिक मिल सकते हैं. मगर, यदि पर्यावरणीय पत्रकारिता की सफलता का पैमाना क्लिक हैं, तो हमारे लिये यह बड़े संकट की बात है.”

उनके अनुसार असल में पत्रकारों को पाठकों व विशेषज्ञों के साथ रिश्ता क़ायम करते हुए, एक भरोसेमन्द दिग्दर्शक की भूमिका संभालने का प्रयास करना चाहिये.

ऐण्ड्रयू रेवकिन ग्रीनलैण्ड में जमे हुए पानी की चादर से रिपोर्टिंग कर रहे हैं.
© Edge McConnell
ऐंड्रयू रेवकिन, ग्रीनलैंड में जमे हुए पानी का माहौल में रिपोर्टिंग करते हुए.

2) जलवायु परिवर्तन की कहानी, जलवायु से परे जाती है

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विनाश व अनर्थ की आशंका की कवरेज से दूर हटकर, पाठकों व वैज्ञानिकों के साथ समझ व सम्पर्क स्थापित करने के लिये यह मानना होगा कि जलवायु परिवर्तन केवल एक “कहानी” भर नहीं है.

यह एक ऐसा सन्दर्भ है, जिसमें अनेक अन्य कहानियाँ उभरती हुई भी दिखाई देंगी.

ऐंड्रयू रेवकिन का तर्क है कि अगर आप अपने दिन की शुरुआत ऐसे सवालों को सोचते हुए करते हैं कि “मैं जलवायु व ऊर्जा जोखिम को किस तरह कम करूँ? मैं इसे किस तरह निर्धारित करूँ और उससे जूझ रहे समुदायों की किस तरह से मदद करूँ? तो इससे हर बात बदल जाती है."

"मैं ऐसी कहानियाँ लिखना जारी रख सकता हूँ कि किस तरह वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है, या फिर यह किस तरह इतिहास में चौथा सर्वाधिक गर्म साल होने जा रहा है, और यह भी पत्रकारिता का ही एक हिस्सा है, मगर इससे हम जोखिम को कम करने की दिशा में नहीं जाते हैं.”

रेवकिन का मानना है कि सन्दर्भ आधारित रास्ते पर आगे बढ़ने से उन कहानियों के लिये भी ज़मीन तैयार की जा सकती है, जिन पर वैसे अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता है.

उन्होंने उदाहरण के तौर पर एक अमेरिकी ग़ैर-सरकारी संगठन Rewiring America द्वारा तैयार एक ऑनलाइन कैलकुलेटर का ज़िक्र किया.

इसमें कुछ निजी जानकारी प्रदान करके ये जानना सम्भव है कि मुद्रास्फीति में कमी लाने सम्बन्धी क़ानून के अन्तर्गत वे कितनी धनराशि के पात्र हो सकते हैं.

ये एक ऐसा क़ानून है जिसके तहत अमेरिकी इतिहास में जलवायु परिवर्तन से लड़ाई के लिये स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों में विशालतम निवेश किये जाने की बात कही गई है.

रेवकिन ने कहा, “क्या आपको पता है कि ओहायो के एक निवासी के तौर पर, इस नए जलवायु क़ानून में आपके लिये क्या लाभ होंगे? आप कितनी सरलता से अपने घरेलू इस्तेमाल के लिये सौर ऊर्जा की दिशा में बढ़ सकते हैं, या फिर एक विद्युतचालित वाहन पाने के बारे में सोच सकते हैं.”

कुछ ऐसी ही जानकारी मुहैया कराने वाले इस कैलकुलेटर की वैबसाइट पर जलवायु परिवर्तन की कोई जानकारी नहीं दी गई है. मगर यह उपभोक्ताओं को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने के लिये प्रोत्साहित करता है चूँकि इसमें उनके लिये लाभ निहित हैं.  

“विकासशील देशों के मामले में, जोखिम, पर्यावरणीय जोखिम, बाढ़ जोखिम और ऊर्जा अवसरों के बारे में जानकारी मुहैया कराना सबसे अहम है.”

और, मेरी युवावस्था में पत्रकारिकता जिस तरह से की जाती थी, उससे यह बेहद अलग है.

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने पत्रकारों के लिये एक पुस्तिका तैयार की है, जिसके अनुसार आम धारणा ये है कि जलवाय एक ऐसा मुद्दा है, जिससे उपजी चिन्ताओं से अख़बार बेचे जा सकते हैं और नए पाठकों को ऑनलाइन व रेडियो पर आकर्षित किया जा सकता है.

मगर, इसके विपरीत पत्रकारों को जलवायु बदलाव की अच्छी कहानियाँ कहने के लिये अपने शीर्षकों में जलवायु लिखने की ज़रूरत नहीं है.

कॉप26 सम्मेलन के दौरान ग्लासगो में प्रदर्शन कर रहे जलवायु कार्यकर्ता.
UN News/Laura Quinones
कॉप26 सम्मेलन के दौरान ग्लासगो में प्रदर्शन कर रहे जलवायु कार्यकर्ता.

3) स्थानीय ज़रूरतों को समझें और जलवायु न्याय के बारे में सोचें

IPCC वैज्ञानिकों ने माना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये निष्पक्ष व कारगर क़ानून तैयार करने व सामाजिक स्वीकार्यता के लिये यह ज़रूरी है कि समता व न्याय पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया जाए.

स्थानीय सन्दर्भों व सामाजिक कारकों के विश्लेषण के ज़रिये, पत्रकार जलवायु न्याय से सम्बन्धित लेख लिख सकते हैं.

“यदि आप एक ऐसे विकासशील देश में हैं जिसने ग्रीनहाउस उत्सर्जन में बिलकुल भी योगदान नहीं दिया है, यदि आप रवांडा के ग्रामीण इलाक़े में प्रति वर्ष 0.1 टन CO2 [उत्सर्जन] का जीवन गुज़ार रहे हैं, तो ऊर्जा जोखिम केवल जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को रोकने के बारे में नहीं है.”

“…इसलिये, ऐसा कोई भी व्यक्ति जो जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल पर सरल सी कहानियाँ लिख रहा है, तो इस पहलू को नज़रअन्दाज़ कर रहा है कि ऊर्जा संवेदनशीलता भी मायने रखती है.”

ऐंड्रयू रेवकिन ने इस वर्ष दक्षिण अफ़्रीका के डरबन में बाढ़ और देश में भूस्खलन का उदाहरण दिया, जिसमें 450 लोगों की मौत हो गई और लगभग 40 हज़ार लोग विस्थापित हुए.

एक स्थानीय भूगोलवेत्ता कैथरीन सदरलैंड ने उन इलाक़ों का अध्ययन किया था, जोकि सर्वाधिक प्रभावित थे और जहाँ लोगों की मौत, डूबने की वजह से हो गई थी.

रेवकिन के अनुसार यह समस्या जलवायु से कहीं अधिक बड़ी थी. “यह नस्लीय व निर्धनता कारकों से उपजने वाली निर्बलता के बारे में थी. जब आपके पास धन व ताक़त ना हो तो आप कहाँ रहते हैं. आप उन स्थानों पर रहते हैं जहाँ कोई और लोग नहीं रहेंगे, चूँकि वे जानते हैं कि वहाँ पानी जमा होगा.”

“इसलिये कहानी ये है. जलवायु न्याय का पूरा विचार यहीं से आता है. यह कह देना बहुत सरल है कि यह केवल जीवाश्म ईंधन के बारे में है.”

पत्रकार रेवकिन ने ज़ोर देकर कहा कि ऊर्जा सम्बन्धी निर्णय और जलवायु नज़रिये से संवेदनशीलता, मुख्यत: स्थानीय परिस्थितियों का ही एक पहलू हैं, यानि वे कहानी का अहम हिस्सा हैं.

“उदाहरणस्वरूप, World Weather Attribution Project इस बात का त्वरित विश्लेषण कर रहा है कि पाकिस्तान में हाल में हुई आपदा में वैश्विक तापमान वृद्धि का कितना योगदान रहा है.”

“पत्रकारों ने जलवायु परिवर्तन पर ध्यान केन्द्रित किया, चूँकि यह महत्वपूर्ण है, मगर उस हर एक रिपोर्ट में, अलग से नुक़सान के अन्य कारकों पर भी जानकारी है, जैसेकि लोग कहाँ और किस तरह बसाए गए थे, जल बांध सम्बन्धी सरकारी नीतियों की किस तरह देखरेख हुई, और बाढ़ सम्बन्धी बुनियादी तंत्र जोकि बहुत कमज़ोर था.”

कोलम्बिया युनिवर्सिटी के विशेषज्ञ ने स्पष्ट किया कि यह बहुत अहम है कि स्थानीय पत्रकारों का एक समुदाय तैयार किया जाए, जो अपनी रिपोर्टिंग में जलवायु जोखिम के लेंस का उपयोग कर सके.

फ़ेक न्यूज़ और ग़लत सूचनाओं को जानबूझकर फैलाये जाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे वास्तविकता के प्रति लोगों की सोच को बदलने की कोशिश की जाती है.
Unsplash/Nijwam Swargiary
फ़ेक न्यूज़ और ग़लत सूचनाएँ जानबूझकर फैलाए जाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे वास्तविकता के प्रति लोगों की सोच को बदलने की कोशिश की जाती है.

4) भ्रामक व ग़लत जानकारी की रोकथाम के लिये भरोसा क़ायम करें

वैश्विक महामारी कोविड-19 के शुरुआती दिनों में ‘The Atlantic’ पत्रिका के पत्रकारों ने महसूस किया है कि ऑनलाइन माध्यमों पर ऐसी जानकारी की भरमार है, जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता था.

इसलिये, उन्होंने महामारी विज्ञान के कुछ विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक कोविड-19 ट्रैकर तैयार किया, जोकि लोगों के लिये बेहद उपयोगी साबित हुआ.

“The Atlantic को सबसे अधिक अच्छे वृतान्त लेखों के लिये जाना जाता है...लेकिन मेरे लिये, कोविड-19 ट्रैकर अन्य सम्भावनाओं का भी उदाहरण पेश करता है, और यही बात जलवायु के लिये कही जा सकती है.”

उन्होंने समाधान आधारित पत्रकारिता का उदाहरण दिया, जिसमें पड़ताल के बाद लोगों को बताया जाता है कि किस तरह साझा समस्याओं के समाधान ढूंढने के लिये प्रयास किये जा रहे हैं.

“मेरे विचार से बहुत से पारम्परिक रिपोर्टर सोचते हैं कि समाधान पत्रकारिता, ओह, यह केवल अच्छी-अच्छी बात या काम को बेचने जैसा है.”

लेकिन नहीं. “हम समुदायों को उन तौर-तरीक़ों के बारे में सूचित कर सकते हैं, जिससे सहनक्षमता को बढ़ावा मिलता हो, उन इलाक़ों में जोकि सर्वाधिक सम्वेदनशील हैं.”

“और इनसे निपटना समाज का ही दायित्व है, मगर उनके लिये ये समझना आसान हो जाता है कि कौन से उपाय अपनाने होंगे.”

ऐंड्रयू रेवकिन के मुताबिक़ जलवायु परिवर्तन एक जटिल और बहुआयामी मुद्दा है. उन्होंने बताया कि जब वह न्यूयॉर्क टाइम्स में काम करते थे, तो उन्हें कभी-कभी महसूस हुआ कि पहले पन्ने पर छपी ख़बर से, एक ब्लॉग पोस्ट कहीं अधिक प्रभावी हो सकती है.

इसी भावना के साथ उन्होंने Dot Earth शुरू किया, जोकि 2007 से 2016 तक चला.

उनका मानना है कि पत्रकारिता में उसी पत्रकार के अधिक सफल होने की सम्भावना होती है, जोकि एक तरह से हिमस्खलन के बाद, एक पारम्परिक टाइपिस्ट के बजाय एक पर्वत गाइड के रूप में काम करें.

यानि, आप इस टकराव के बीच, परस्पर विरोधी तर्कों के बीच लोगों के साथ एक भरोसा, समझ विकसित करें और स्वयं की पहचान ईमानदारी के साथ जानकारी प्रदान करने वाले के रूप में बनाएँ.

उन्होंने इसे “engagement journalism” बताया जिसमें मुख्य शीर्षक से कहीं आगे बढ़ कर रिपोर्टिंग की जाती है, और जोकि समुदाय के साथ बातचीत व रिश्ता क़ायम करने से ही उभर सकती है.

इस क्रम में, उन्होंने विज्ञापन आधारित व्यवसाय मॉडल से अलग हटने का आग्रह किया और कहा कि सदस्यता (subscription) आधारित मॉडल की ओर बढ़ना होगा.

वॉशिंगटन डीसी में बारिश के बावजूद हज़ारों लोग वैज्ञानिक विश्लेषण व विज्ञान के लिये वित्त पोषण की मांग के लिये प्रदर्शन कर रहे हैं.
Unsplash/Vlad Tchompalov
वॉशिंगटन डीसी में बारिश के बावजूद हज़ारों लोग वैज्ञानिक विश्लेषण व विज्ञान के लिये वित्त पोषण की मांग के लिये प्रदर्शन कर रहे हैं.

5) विज्ञान को मानें और जानकारीप्रद रिपोर्टिंग को अपनाएँ

ऐंड्रयू रेवकिन का कहना है कि पत्रकारिता और वैज्ञानिकों के बीच रिश्ते में बदलाव आ रहा है और यह सकारात्मक है.

उन्होंने बताया कि अतीत में वो एक माइक्रोफ़ोन के साथ हिमनद विशेषज्ञ के साथ इंटरव्यू किया करते थे. अब आप वैज्ञानिकों को न्यूज़रूम में आते हुए देखते हैं, जोकि कोविड या जलवायु पर मॉडल तैयार कर रहे हैं.

“मुझे मालूम है कि दुनिया भर में अनेक संस्थानों ने यह करना शुरू किया है, और इसलिये सीखने-सिखाने की दिशा में नए सिरे से बढ़ने की ज़रूरत है.”

उन्होंने बताया कि पिछले 30 वर्षों का अनुभव दर्शाता है कि पर्यावरणवाद पर कहानियाँ ‘रुकिये’ (stop) शब्द से निर्धारित होती रही हैं.

जैसेकि प्रदूषण रोको. मगर अब यह सक्रियता की एक पुकार में तब्दील हुई है और इसे ‘शुरुआत’ (start) के रूप में निर्धारित किया जाता है.

यूनेस्को ने हमें बताया है कि जलवायु परिवर्तन की कवरेज के कई अर्थ हो सकते हैं.

स्थानीय स्तर पर इससे ज़िन्दगियों की रक्षा की जा सकती है, योजनाएँ तैयार की जा सकती हैं, नीतियाँ बदली जा सकती हैं और लोगों को सूचनाप्रद विकल्पों को चुनने के लिये सशक्त बनाया जा सकता है.

जानकारी प्रदान करने वाली रिपोर्टिंग के ज़रिये, पत्रकार उन सभी गतिविधियों को रेखांकित कर सकते हैं, जिनके ज़रिये लोग जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी कर रहे हैं.

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर, पत्रकारिता के ज़रिये क्षेत्रीय कहानियों को वैश्विक पाठकों तक लाया जा सकता है.

धनी व शक्तिशाली देशों और उनके नागरिकों व कम्पनियों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है कि वे जलवायु दृष्टि से संवेदनशील समुदायों की सहायता के लिये एकजुटता दर्शाएँ.