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मृत्युदंड के पूर्ण उन्मूलन को ही 'केवल मात्र व्यावहारिक रास्ता' मानने की पुकार

वाशिंगटन, डीसी में यूएस सुप्रीम कोर्ट की इमारत के बाहर एक कार्यकर्ता मौत की सज़ा के संकेत रखती है.
Unsplash/Maria Oswalt
वाशिंगटन, डीसी में यूएस सुप्रीम कोर्ट की इमारत के बाहर एक कार्यकर्ता मौत की सज़ा के संकेत रखती है.

मृत्युदंड के पूर्ण उन्मूलन को ही 'केवल मात्र व्यावहारिक रास्ता' मानने की पुकार

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के दो स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने मृत्युदंड के विरुद्ध 20वें विश्व दिवस के अवसर पर सोमवार को कहा है कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत, मृत्युदंड की अनुमति, केवल “बहुत सीमित परिस्थितियों में ही” दी जानी चाहिये.

इन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने एक वक्तव्य जारी करके कहा है कि वास्तविकता ये है कि देशों के लिये, मृत्युदंड के दोषियों के मानवाधिकारों का सम्मान करने की ज़िम्मेदारियों को पूरा करते हुए, उन्हें मृत्युदंड देने पर अमल करना असम्भव है.

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इन दो मानवाधिकार विशेषज्ञों के नाम हैं – उत्पीड़न पर विशेष रैपोर्टेयर ऐलिस ऐडवर्ड्स और न्यायेतर व मनमाने तरीक़े से मृत्युदंड की जाँच करने वाले विशेष रैपोर्टेयर मॉरिस टिडबॉल-बिन्ज़.

इन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने मृत्युदंड व यातना और अन्य क्रूर, अमानवीय, या अपमानजनक बर्ताव के बीच में सम्बन्ध पर अपने विचार प्रकट करते हुए ये बात कही है.

एक मात्र व्यावहारिक रास्ता

इन  विशेषज्ञों का मानना है कि मृत्युदंड को समाप्त करना सभी देशों के लिये "एकमात्र व्यावहारिक रास्ता" है.

“मृत्युदंड का इन्तज़ार कर रहे लोग जिस तकलीफ़ और यातना का सामना करते हैं, उसे लम्बे समय से अमानवीय व्यवहार के रूप में वर्णित किया गया है.

साथ ही, मृत्युदंड के दायरे वाले अपराधों के दोषी ठहराए गए लोगों को लगभग पूर्ण अलगाव में रखा जाना भी अमानवीय व्यवहार कहा गया है, जिन्हें फिर ग़ैर-क़ानूनी एकान्त वाले कारावास के हालात में रखा जाता है.

फिर भी, अनेक देश ईशनिन्दा, व्याभिचार और नशीली पदार्थों से सम्बन्धित जैसे अहिंसक अपराधों के लिये मृत्युदंड देना जारी रखे हुए हैं.

अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार, ये सभी अपराध, "सबसे संगीन अपराध" मापदंड के तहत नहीं आते हैं.

चिन्ताजनक प्रचलन

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने शान्तिपूर्ण राजनैतिक विरोध के अपने अधिकार का प्रयोग करने वालों पर मृत्युदंड लागू करने के इस बढ़ते प्रचलन को “बहुत चिन्ताजनक” क़रार दिया.

और मृत्युदंड देने के ज़्यादातर तरीक़े, दोषियों को प्रताड़ित करने या दुर्व्यवहार या गम्भीर दर्द व पीड़ा पहुँचाने से बचने के मानकों से बेमेल बताए गए हैं.

170 से अधिक देशों ने या तो मृत्युदंड का प्रावधान ख़त्म कर दिया है या फिर उन पर स्वतः पाबन्दी लगा दी है, इसके बावजूद वर्ष 2021 के दौरान, देशों की सरकारों द्वारा स्वीकृत मृत्युदंड दिये जाने के मामलों में 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

अपवाद

इन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा कि मृत्युदंड को बरक़रार रखने वाले देशों से मानसिक निर्बलता वाले व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिये "अपवादों को निष्ठापूर्वक लागू करने" का आग्रह किया गया है, जैसा कि नागरिक और राजनैतिक अधिकारों पर अन्तरराष्ट्रीय सन्धि (ICCPR) के अनुच्छेद - छह सहित विभिन्न दस्तावेज़ों के अनुसार अनिवार्य है.

उन्होंने कहा कि सभी देशों से, इस सन्धि के दूसरे स्वैच्छिक प्रोटोकॉल को स्वीकृत करने पर विचार करने का आग्रह किया गया है, जिसका लक्ष्य मृत्युदंड को समाप्त करना है.

उन्होंने ध्यान दिलाया कि अभी तक 40 देश इस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर कर चुके हैं और 90 देश इसके हितधारक हैं.  

संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों की नियुक्ति, जिनीवा स्थित मानवाधिकार परिषद, किसी विशेष मानवाधिकार स्थिति या देश की स्थिति की जाँच करने और रिपोर्ट सौंपने के लिये करती है. ये पद मानद होते हैं और उन्हें उनके काम के लिये, संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन नहीं मिलता है.