पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद शहबाज़ शरीफ़ ने यूएन महासभा के 77वें वार्षिक सत्र को सम्बोधित किया.

पाकिस्तान: विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आए देश के लिये, वैश्विक समर्थन की पुकार

UN Photo/Cia Pak
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद शहबाज़ शरीफ़ ने यूएन महासभा के 77वें वार्षिक सत्र को सम्बोधित किया.

पाकिस्तान: विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आए देश के लिये, वैश्विक समर्थन की पुकार

शांति और सुरक्षा

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद शहबाज़ शरीफ़ ने यूएन महासभा के 77वें वार्षिक सत्र के दौरान उच्चस्तरीय जनरल डिबेट को सम्बोधित करते हुए कहा है कि हाल के दिनों में आई विनाशकारी बाढ़ के कारण, देश का विशाल हिस्सा अब भी जलमग्न है. इसके मद्देनज़र, उन्होंने अभूतपूर्व जलवायु तबाही के नतीजों का सामना करने के लिये वैश्विक समर्थन की पुकार लगाई है.

प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने कहा, “जिस तरह से हम इस झटके से गुज़रे हैं, या जिस तरह इसने देश को पूरी तरह बदल कर रख दिया है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.”

उन्होंने कहा कि 40 दिनों और 40 रातों तक बाढ़ का क़हर बरपा, जिससे सदियों के मौसम के रिकॉर्ड टूट गए, और आपदा से निपटने के वो उपाय भी, जिनकी हमें जानकारी थी.

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार इस आपदा के कारण लगभग 80 लाख लोग विस्थापित हुए हैं. संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान सरकार और स्थानीय एजेंसियों के साथ मिलकर बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में ज़रूरतमन्दों तक राहत पहुँचाने का कार्य जारी रखा है.

अब तक, डेढ़ हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 552 बच्चे हैं.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि तीन करोड़ 30 लाख से अधिक लोगों पर स्वास्थ्य जोखिम मंडरा रहे हैं.

13 हज़ार किलोमीटर लम्बी सड़कें क्षतिग्रस्त हुए हैं, 10 लाख घर ध्वस्त हुए हैं, जबकि 10 लाख क्षतिग्रस्त हुए हैं, और 40 लाख एकड़ के इलाक़े में फ़सल बह गई है.  

तापमान वृद्धि का ज्वलन्त उदाहरण

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने वैश्विक तापमान में वृद्धि के असर का इससे विनाशकारी और ज्वलन्त उदाहरण अभी नहीं देखा है. “पाकिस्तान में जीवन हमेशा के लिये बदल गया है.”

यूएन महासचिव ने सितम्बर महीने में अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान कहा था कि उन्होंने इस स्तर पर जलवायु तबाही नहीं देखी है.

उन्होंने इसके मद्देनज़र पाकिस्तान के लिये तत्काल वित्तीय समर्थन मुहैया कराए जाने की पुकार लगाई है, और ध्यान दिलाया कि यह एकजुटता का सवाल नहीं, बल्कि न्याय से जुड़ा सवाल है.

प्रधानमंत्री शरीफ़ ने जनरल ऐसेम्बली में कहा, “प्रकृति ने पाकिस्तान पर अपना क़हर बरपाया है, बिना हमारे कार्बन पदचिन्ह को देखे, जोकि लगभग शून्य के बराबर हैं.”

“हमारा इसमें कोई योगदान नहीं है.”

उन्होंने कहा कि इस समय प्राथमिकता - त्वरित आर्थिक विकास सुनिश्चित करने और लाखों लोगों को बदहाली (अभाव) से बाहर निकालने की है, जिसके लिये स्थिर विदेशी (बाहरी) वातावरण की आवश्यकता है.

पाकिस्तान के नेता ने कहा कि दक्षिण एशिया में सतत शान्ति व स्थिरता, अलबत्ता, जम्मू और कश्मीर विवाद के न्यायोचित व स्थाई समाधान पर ही निर्भर करेगी.

दक्षिण एशिया में टिकाऊ शान्ति

“लम्बे समय से चले आ रहे इस विवाद के मूल में, कश्मीरी जनता के आत्म-निर्णय के अपरिहार्य (inalienable) अधिकार को नकारा जाना है.”

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की मंशा - मुस्लिम-बहुल जम्मू और कश्मीर को, “ग़ैरक़ानूनी जनसांख्यिकी बदलावों” के ज़रिये, एक हिन्दू बहुल क्षेत्र में तब्दील करने की है, जोकि एक “औपनिवेशिक परियोजना की सटीक मिसाल” है.

प्रधानमंत्री शरीफ़ ने कहा कि ग़ैर-कश्मीरी लोगों को लाखों नक़ली निवास प्रमाणपत्र जारी किये गए हैं; कश्मीरी भूमि व सम्पत्ति को ज़ब्त किया जा रहा है; निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं में बदलाव किया जा रहा है और 25 लाख से अधिक ग़ैर-कश्मीरी अवैध मतदाताओं का जालसाजी से पंजीकरण किया गया है.

उन्होंने कहा कि यह सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का खुला उल्लंघन है, विशेष रूप से चौथी जिनीवा सन्धि का.

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और यूएन महासचिव से अपील की है कि वे भारत से, इस मुद्दे पर मौजूदा यूएन प्रस्तावों को लागू करने के लिये आग्रह में, अपनी उचित भूमिका निभाएँ.

इस क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र का रुख़, यूएन चार्टर और सुरक्षा परिषद के प्रासंगिक प्रस्तावों द्वारा निर्धारित होता है.

यूएन महासचिव का मानना है कि जम्मू और कश्मीर मुद्दे का निपटारा, शान्तिपूर्ण उपायों से, यूएन चार्टर और द्विपक्षीय समझौते के अनुरूप किया जाना होगा.