भारत: स्वच्छ हवा और नीले आकाश के लिये नवीन प्रौद्योगिकी

भारत में, 12 प्रदेशों में 47 हज़ार से भी ज़्यादा ईंट भट्टे, वायु प्रदूषण के प्रमुख केन्द्र हैं, क्योंकि वो ईंधन के लिये, कोयले का प्रयोग करते हैं.
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भारत में, 12 प्रदेशों में 47 हज़ार से भी ज़्यादा ईंट भट्टे, वायु प्रदूषण के प्रमुख केन्द्र हैं, क्योंकि वो ईंधन के लिये, कोयले का प्रयोग करते हैं.

भारत: स्वच्छ हवा और नीले आकाश के लिये नवीन प्रौद्योगिकी

जलवायु और पर्यावरण

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने ब्रिटेन के नॉटिंघम विश्वविद्यालय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड्स के साथ मिलकर, वायु प्रदूषण की चुनौतियों का हल निकालने के लिये, अपनी तरह का पहला प्रौद्योगिकी मंच शुरू किया है. 

भारत के पंजाब प्रदेश के एक ईंट-भट्ठा कर्मचारी मुकेश कुमार बताते हैं, “एक ईंट भट्ठा कामगार के रूप में, मेरा काम सुबह 4 बजे शुरू हो जाता है और कम से कम 12 घण्टे तक चलता है. ये काम बहुत थकाने वाला है, मुझे सबसे ज़्यादा चिन्ता अपने स्वास्थ्य की होती है. मैं लगातार धूल और अन्य प्रदूषकों के सम्पर्क में रहता हूँ, जिससे अक्सर अस्थमा और तपेदिक जैसी साँस की बीमारियाँ हो जाती हैं.”

भारत में ईंट भट्टों में काम करने वाले, मुकेश जैसे कामगारों को वायु प्रदूषण व स्वास्थ्य के लिये, जोखिम वाले हालात का सामना करना पड़ता है.
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भारत में ईंट भट्टों में काम करने वाले, मुकेश जैसे कामगारों को वायु प्रदूषण व स्वास्थ्य के लिये, जोखिम वाले हालात का सामना करना पड़ता है.

मुकेश भारत में ईंट भट्टों में काम करने वाले, उन एक करोड़ 20 लाख कमगारों में से एक हैं, जो आमतौर पर अस्वस्थ और अस्वच्छ परिस्थितियों में काम करते हैं.

ईंट निर्माण क्षेत्र न केवल श्रमिकों को जोखिम में डालता है बल्कि देश में लगभग 15 प्रतिशत वायु प्रदूषण के लिये ज़िम्मेदार है, यानि औद्योगिक उत्सर्जन से होने वाले कुल प्रदूषण का लगभग एक चौथाई भाग.

नवीनतम वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक की वार्षिक नवीनतम जानकारी के अनुसार, भारत के उत्तरी क्षेत्र में रहने वाले 51 करोड़ से अधिक लोग, यानि भारत की आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा, प्रदूषण के उस स्तर के सम्पर्क में हैं, जो पृथ्वी पर कहीं और पाए जाने वाले स्तर से अधिक है.

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के भारत कार्यालय ने लोगों और ग्रह के स्वास्थ्य की रक्षा के प्रयासों के हिस्से के रूप में, ब्रिटेन के नॉटिंघम विश्वविद्यालय के राइट्स लैब और भारत में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड्स के साथ साझेदारी में, अपनी तरह का पहला प्रौद्योगिकी मंच, GeoAI विकसित किया है, जो उपग्रह डेटा के ज़रिये, वायु प्रदूषण के स्रोतों का पता लगाने की चुनौती का समाधान करता है.

यह नवाचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नागरिक विज्ञान, उपग्रह छायांकन और मोबाइल प्रौद्योगिकी से संचालित है, जिससे ईंट भट्ठा क्षेत्र के स्थान और अनुपालन पर गुप्त जानकारी प्राप्त होती है. इसका उद्देश्य, देश में ईंट निर्माण उद्योग के पर्यावरण अनुपालन में सुधार करना है.

GeoAI ने भारत के 12 राज्यों के गंगा-सिन्धु क्षेत्र के मैदानों में, 47 हज़ार से अधिक ईंट भट्टों का सटीक लेखा-जोखा तैयार किया है, जो वायु प्रदूषण से प्रभावित मुख्य स्थान हैं.

नियमन चुनौती

बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष, डॉक्टर अशोक घोष बताते हैं, "बिहार में,  साढ़े सात हज़ार ईंट भट्टों में से लगभग 4 हज़ार भट्टे, अब हरित प्रौद्योगिकी में परिवर्तित हो चुके हैं. लेकिन हमें शेष ईंट भट्टों के मानचित्रण में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है."

"वे कहाँ स्थित हैं? उनके पर्यावरण अनुपालन की स्थिति क्या है? हम इन ईंट भट्टों के भू-सन्दर्भित आँकड़ों का संग्रह और अपनी नियामक शासन गतिविधियों की मदद के लिये समग्र अनुपालन निगरानी चाहते हैं."

इसके ज़रिये, इस समय बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में, ईंट निर्माण उद्योगों के पर्यावरण अनुपालन में सुधार के लिये, तीनों प्रदेशों की सरकारों का समर्थन जारी है. 

भारत में, 12 प्रदेशों में 47 हज़ार से भी ज़्यादा ईंट भट्टे, वायु प्रदूषण के प्रमुख केन्द्र हैं, क्योंकि वो ईंधन के लिये, कोयले का प्रयोग करते हैं.
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भारत में, 12 प्रदेशों में 47 हज़ार से भी ज़्यादा ईंट भट्टे, वायु प्रदूषण के प्रमुख केन्द्र हैं, क्योंकि वो ईंधन के लिये, कोयले का प्रयोग करते हैं.

उदाहरण के लिये, बिहार में, GeoAI ने उपग्रह छायांकन का उपयोग करके प्रदेश में 7 हज़ार 800 से अधिक ईंट भट्टों का आकलन किया है, जिनमें से एक हज़ार इकाइयों को ग़ैर-अनुपालन अंकों के आधार पर प्राथमिकता दी गई.

इनमें से 600 से अधिक इकाइयों का निरीक्षण करके, नियामकों ने कार्रवाई की. जिससे ईंट निर्माण क्षेत्र में ग़ैर-अनुपालन को साबित करने के लिये निवेश व आवश्यक समय में कमी की जा सकी.

भारत में यूएनडीपी की रैज़िडेण्ट प्रतिनिधि, शोको नोडा ने बताया, "हर साल, दुनिया में समय से पहले होने वाली अनुमानित 70 लाख मौतों के लिये वायु प्रदूषण को ज़िम्मेदार माना जाता है - यह हमारे समय के सबसे बड़े पर्यावरणीय स्वास्थ्य जोखिमों में से एक है.”

“वायु प्रदूषण सबसे बड़े पर्यावरणीय स्वास्थ्य जोखिमों में से एक है. GeoAI मंच से स्पष्ट होता है कि हम वायु प्रदूषण के स्रोतों को उजागर करने के लिये, किस तरह कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उपग्रह छायांकन का उपयोग कर सकते हैं. यह मंच पहले से ही, ईंट भट्टों से प्रदूषण को नियंत्रित करने में राज्य सरकारों का समर्थन कर रहा है और आगे भी इस तरह के कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिये, प्रौद्योगिकी व AI का लाभ उठाना जारी रखेगा.”

वर्तमान परिदृश्य

भारत में बहुत से ईंट भट्टे अब भी पारम्परिक स्थिर चिमनी तकनीक (FCBTK) पर निर्भर हैं. इसमें कच्चे ईंधन के रूप में कोयले का उपयोग किया जाता है. इसकी जलाने वाली प्रक्रियाओं में, प्रति एक हज़ार ईंटें बनाने में, 600 टन कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है.

भारत में ईंट भट्टों में ईंधन के लिये का प्रयोग होता है जिसे कार्बन उत्सर्जन भी काफ़ी बड़ी मात्रा में होता है.
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भारत में ईंट भट्टों में ईंधन के लिये का प्रयोग होता है जिसे कार्बन उत्सर्जन भी काफ़ी बड़ी मात्रा में होता है.

श्रमिकों के स्वास्थ्य के लिये ख़तरा होने के साथ-साथ, इसके कण 50 किमी तक फैलने में सक्षम होने के कारण, ईंट भट्टों के आसपास के क्षेत्र को भी प्रदूषित करते हैं, जिससे वायु प्रदूषण फैलता है.

इसके मुक़ाबले, प्राकृतिक या उच्च ड्राफ़्टच ज़िगज़ैग जैसी हरित प्रौद्योगिकियों की अग्नि प्रक्रियाएँ 40 प्रतिशत अधिक तक ऊर्जा कुशल हैं.

GeoAI मोबाइल ऐप और वेब मंच, उपयोग अनुकूल होने के कारण, ईंट भट्टों की भौतिक सत्यापन प्रक्रिया को सशक्त एवं तेज़ करता है. नियामक, क्षेत्र के निरीक्षण के बाद, अनुपालन न करने वाले ईंट भट्ठों पर उचित कार्रवाई करते हैं ताकि या तो वो स्वच्छ हरित प्रौद्योगिकियों में बदलें या फिर काम बन्द दें.

नॉटिंघम विश्वविद्यालय की पृथ्वी अवलोकन प्रोफ़ैसर, डॉक्टर डोरीन बॉयड के मुताबिक़, "स्थान की जानकारी के साथ लक्षित आँकड़े, यह समझने की कुंजी है कि जलवायु और पर्यावरण परिवर्तन मानव अधिकारों को कैसे प्रभावित करते हैं - GeoAI ऐप इन आँकड़ों को इकट्ठा करने हेतु एक आकर्षक व कुशल मंच प्रदान करता है.”

“उच्च गुणवत्ता की जानकारी, उचित निर्णय लेने व उनकी प्रभावशीलता पर नज़र रखने के लिये ज़रूरी हैं. हमारा दृष्टिकोण है कि GeoAI, ईंट भट्टों में काम करने वाले सभी लोगों को, स्वच्छ हवा में साँस लेने और कामकाज की उतकृष्ट परिस्थितियों का अधिकार हासिल करने में मदद देगा."

आगे क्या?

बड़े पैमाने पर निर्मित यह नवीन तकनीक, एक तरफ़ तो, भारत के तीन प्रदेशों में ईंट भट्ठा क्षेत्र को विनियमित करने में मदद कर रही है, मगर इसमें पूरे भारत में बड़े पैमाने पर विस्तार करने की क्षमता मौजूद है. 

भविष्य में यूएनडीपी की योजना है - GeoAI को एक पूर्ण वायु प्रदूषण डिजिटल बैंक में विस्तारित करने की, जिसमें खुले आँकड़ें उपलब्ध हों, और वायु प्रदूषण के सभी प्रमुख स्रोतों की जानकारी हो, ताकि सरकारों को स्वच्छ हवा, बेहतर स्वास्थ्य और लम्बा जीवन प्रदान करने में मदद मिल सके.