मिख़ाइल गोर्बाचौफ़: 'एक ऐसे वैश्विक क़द्दावर नेता, जिन्होंने इतिहास का रुख़ बदल दिया'

30 अगस्त 2022

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने सोवयत संघ के अन्तिम राष्ट्रपति मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ को, उनके निधन पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है, जिनका मंगलवार को 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया. 

यूएन महासचिव ने उन्हें एक अनन्य हस्ती क़रार देते हुए कहा कि उन्होंने शीत युद्ध का शान्तिपूर्ण अन्त किया, जिसने अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों पर 1940 से ही अपना प्रभुत्व जमा रखा था.

एंतोनियो गुटेरेश ने कहा कि उन्हें मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ के निधन की ख़बर सुनकर बहुत दुख पहुँचा है.

रूस की सरकारी समाचार एजेंसियों ने ख़बर दी है कि मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ का निधन राजधानी मॉस्को में एक लम्बी और गम्भीर बीमारी के कारण हुआ है. 

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ के पूरे परिवार को, रूसी महासंघ के लोगों और वहाँ की सरकार को अपनी हार्दिक सम्वेदनाएँ प्रकट की हैं.

क़द्दावर वैश्विक नेता

यूएन प्रमुख ने कहा कि दुनिया ने एक क़द्दावर नेता खो दिया है जो, बहुपक्षवाद के लिये समर्पित था, और शान्ति का अथक पैरोकार भी था.

मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ 1985 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने थे, जब पूर्व और पश्चिम के बीच परमाणु तनाव उच्च स्तर पर थे.

उन्होंने अर्थव्यवस्था में जान फूँकने और राजनैतिक व्यवस्था का आधुनिकीकरण करने के लिये एक सुधारवादी कार्यक्रम तैयार किया था, जिसके तहत पैरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त यानि खुलापन की नीतियाँ शामिल थीं.

मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ ने तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के साथ सफल वार्ता करके इंटरमीडियेट परमाणु बल सन्धि (INFT) की तमाम मिसाइलें नष्ट करने पर राज़ी करके शीत युद्ध का अन्त किया.

उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में रूसी नियंत्रण भी ख़त्म किया और पूर्वी योरोप पर रूसी आधिपत्य भी समाप्त किया. और अन्ततः सोवियत संघ का भी विकेन्द्रीकरण हुआ, और ये सब छह वर्ष के भीतर हुआ.

नोबेल पुरस्कार

इन सब कार्यों के लिये अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर तो मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ की ख़ासी प्रशंसा हुई, मगर देश में उनकी बहुत आलोचना हुई. मगर उन्हें “पूर्व व पश्चिम के सम्बन्धों में नाटकीय बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाने के लिये”, नोबेल शान्ति पुरस्कार से भी नवाज़ा गया, जैसाकि नोबेल पुरस्कार समिति के जजों ने कहा था.

यूएन प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने अपने वक्तव्य में रेखांकित किया है कि नोबेल पुरस्कार प्राप्त करते हुए मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ ने कहा था कि 'शान्ति समरूपता में एकता नहीं है, बल्कि विविधता में एकता है.’

"उन्होंने इस महान दृष्टिकोण को बातचीत, सुधारों, पारदर्शिता और निरस्त्रीकरण का रास्ता अपनाकर वास्तविकता में बदला.”

मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ को 1991 में कट्टर पंथी साम्यवादियों के विद्रोह का सामना करना पड़ा, और जब वो काला सागर में छुट्टियाँ मनाने गए हुए थे, तो उन्हें वहाँ गिरफ़्तार कर लिया गया था.

मगर उस समय मॉस्को में पार्टी के नेता बोरिस येल्तसिन ने, राजधानी में सोवियत सेना द्वारा समर्थित विद्रोह को प्रभावशाली तरीक़े से ख़त्म कर दिया था, मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ को रिटायरमेंट में भेज दिया था, और अन्ततः उसके बाद सोवियत यूनियन (USSR) का विघटन हो गया था.

सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति मिख़ाइल गोर्बाचौफ़, वर्ष 1988 में तत्कालीन यूएन प्रमुख ज़ेवियर पेरेज़ डी कुइया को, यूएन मुख्यालय में एक उपहार भेंट करते हुए.
UN Photo/Yutaka Nagata
सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति मिख़ाइल गोर्बाचौफ़, वर्ष 1988 में तत्कालीन यूएन प्रमुख ज़ेवियर पेरेज़ डी कुइया को, यूएन मुख्यालय में एक उपहार भेंट करते हुए.

नई चुनौतियों का सामना

एंतोनियो गुटेरेश ने कहा कि मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ ने अपनी उम्र के अन्तिम वर्षों में, ऐसी नई चुनौतियों का सामना किया जो मानवता के बेहतर रहन-सहन के लिये बहुत अमह हैं: उन्होंने इनसानों और वातावरण के बीच सामंजस्यपूर्ण सम्बन्धों को बढ़ावा दिया.

इसी से प्रेरित होकर उन्होंने, ‘ग्रीन क्रॉस इंटरनेशनल’ की स्थापना की थी.

 

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