युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में बाल अधिकार हनन के हर दिन, औसतन 71 मामले 

यूक्रेन में बच्चों के एक अस्पताल में भर्ती एक लड़की, जोकि बमबारी में घायल हुई थी.
© UNICEF/Tetiana Bundzilo
यूक्रेन में बच्चों के एक अस्पताल में भर्ती एक लड़की, जोकि बमबारी में घायल हुई थी.

युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में बाल अधिकार हनन के हर दिन, औसतन 71 मामले 

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की एक नई रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि विश्व भर में, हिंसक संघर्ष व टकराव से प्रभावित इलाक़ों में युद्धरत पक्षों द्वारा बच्चों के विरुद्ध, हर दिन अधिकार हनन के औसतन 71 गम्भीर मामले घटित हो रहे हैं.

मंगलवार को जारी, 25 years of children and armed conflict: Taking action to protect children in war, शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में अफ़्रीका, मध्य पूर्व, एशिया और लातिन अमेरिका में 30 स्थानों में हालात का विश्लेषण किया गया है.

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आपात परिस्थितियों में बाल संरक्षण के विषय पर यूनीसेफ़ की वरिष्ठ परामर्शदाता ताशा गिल ने मंगलवार को जिनीवा में एक पत्रकार वार्ता में रिपोर्ट के प्रमुख बिन्दुओं पर जानकारी दी. 

उन्होंने कहा कि वर्ष 2005 और 2020 के दौरान, संगठन ने 30 स्थानों पर, बाल अधिकार हनन के दो लाख, 66 हज़ार मामलों की पुष्टि की है.

ताशा गिल ने क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि हर दिन, बच्चों के अधिकार हनन के औसतन 71 गम्भीर मामले सामने आए हैं. 

रिपोर्ट में, हिंसक संघर्ष से प्रभावित हालात में, बाल अधिकार उल्लंघन के गम्भीर मामलों के पिछले 16 वर्ष के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया है.

ये अध्ययन विश्व भर में बच्चों पर सशस्त्र संघर्ष के प्रभावों को दर्शाता है. 

पाँच हॉटस्पॉट

रिपोर्ट बताती है कि सभी पुष्ट मामलों की 82 फ़ीसदी संख्या केवल पाँच स्थानों पर घटित हुई है: अफ़ग़ानिस्तान, इसराइल व फ़लस्तीन, सीरिया, यमन और सोमालिया.

रिपोर्ट में युद्धरत पक्षों के साथ सम्पर्क व बातचीत के ज़रिये, बाल अधिकार हनन की घटनाओं का अन्त व उनकी रोकथाम करने के उपायों की भी पड़ताल की गई है.

यूनीसेफ़ विशेषज्ञ के अनुसार संघर्षरत पक्षों और उन्हें प्रभावित करने वाले पक्षकारों के साथ दशकों की पैरोकारी और गम्भीर अधिकार हनन के मामलों की सख़्त निगरानी व रिकॉर्ड आलेखन के बावजूद, बच्चे अब भी युद्ध का दंश भुगत रहे हैं. 

अकथनीय पीड़ा

“हर दिन, लड़कियाँ और लड़के, हिंसक संघर्ष के अनुभव वाले इलाक़ों में रहते हैं और बयान नहीं की जा सकने वाली ऐसी भयावह पीड़ाओं को सहते हैं, जिनका अनुभव किसी को नहीं करना चाहिये.”

वर्ष 2005 से 2020 के दौरान, यूनीसेफ़ ने पाया है कि एक लाख चार हज़ार बच्चों के मारे जाने या उनके घायल होने की पुष्टि हुई.

93 हज़ार बच्चों की बाल सैनिकों के रूप में भर्ती की गई और युद्धरत पक्षों ने उनका इस्तेमाल किया, जबकि 25 हज़ार से ज़्यादा बच्चों का अपहरण किये जाने की पुष्टि की गई. 

यूनीसेफ़ की वरिष्ठ सलाहकार ने इस विशाल समस्या के प्रति सचेत करते हुए कहा कि पिछले एक दशक (2010-2020) में, हिंसाग्रस्त इलाक़ों में बाल अधिकार हनन के गम्भीर मामलों में 185 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है.  

“यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि अनेक बच्चे एक से अधिक अधिकार उल्लंघन का अनुभव करते हैं, जिससे उनके लिये हालात और ज़्यादा नाज़ुक हो जाते हैं.”

“उदाहरणस्वरूप, अपहरण किये जाने के बाद अक्सर अन्य हनन के मामले होते हैं, जैसेकि [बाल सैनिक के तौर पर] भर्ती, इस्तेमाल और यौन हिंसा.”

यूएन एजेंसियों के प्रयास

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष और अन्य साझीदार संगठनों ने गम्भीर उल्लंघन के मामलों को बेहतर ढंग से समझने और बच्चों की आवश्यकताओं के सम्बन्ध में जानकारी एकत्र व पुष्ट की है. इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, सकारात्मक नतीजे देखने को मिले हैं.  

वर्ष 2000 के बाद से अब तक, कम से कम एक लाख 70 हज़ार बच्चों को सशस्त्र गुटों से रिहा करा पाना सम्भव हुआ है. 

इनमें से अधिकतर बच्चों को अपहरण और यौन हिंसा समेत अधिकार हनन के अनेक मामलों में पीड़ा झेलनी पड़ी.

यूनीसेफ़ ने अन्तरराष्ट्रीय मानव कल्याण और अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानूनों के तहत अपने दायित्वों का अनुपालन नहीं करने के लिये, युद्धरत पक्षों की शिकायत और आलोचना की है.

मगर, साथ ही ध्यान दिलाया है कि हिंसक संघर्ष और टकराव के दौरान, बच्चों की रक्षा करने के लिये अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को भी प्रयास करने होंगे.