वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां

घर और अपनेपन का एहसास

भारत के नई दिल्ली में UNHCR) के एक मेंटरशिप कार्यक्रम से ली गई 16 ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों का एक कोलाज, जो युवा शरणार्थियों की व्यक्तिगत यात्राओं को दर्शाता है।
UNHCR/Abdul Bari Delawery, Roya Safura, Sediqa Rezaie, Mursal Mohammadi, Wahidullah Faizi, Kap Sian Sang, Zonunmawia Ralte (Daniel), Ajaz Musaferzada भारत की राजधानी, नई दिल्ली में छह महीने के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम के ज़रिये, आठ युवा शरणार्थियों को फ़ोटोग्राफी का प्रशिक्षण दिया गया.

घर और अपनेपन का एहसास

प्रवासी और शरणार्थी

भारत की राजधानी नई दिल्ली में छह महीने के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम के ज़रिये, आठ युवा शरणार्थी दृश्य-आधारित कहानीकार के अपने कौशल को संवार रहे हैं. इस क्रम में, वे कैमरे के माध्यम से अपने जीवन व स्वयं को पहचानने की यात्रा और अब तक खोने-पाने के सिलसिले को भी परख रहे हैं. 

अपने कैमरे के लैंस के ज़रिये भावनाओं, व्यक्तियों और वस्तुओं को तस्वीरों में उकेरते हुए, युवा शरणार्थी कहानीकार सोच रहे थे कि आख़िर घर क्या था -  क्या वो एक जगमगाती हुई खिड़की थी या ताज़ी पकी हुई रोटी की सुगन्ध? कोई प्रैशर कुकर या उसमें से आती आवाज़, या फिर कोई पुरानी तस्वीर.

ये आठ युवक और युवतियाँ, भारत में शरणार्थियों के लिये संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त कार्यालय (UNHCR) के एक कार्यक्रम का हिस्सा थे, जो ‘घर और अपनेपन का एहसास’ यानि ‘Home and Belonging' पर केन्द्रित था.

इस कार्यक्रम के तहत, उन्होंने तस्वीरों की एक श्रृंखला के ज़रियें, घर और परिवार के बारे में अपनी भावनाओं और विचारों को कैमरे में समेटा है.

सभी प्रतिभागियों ने साप्ताहिक कार्यशालाओं में भाग लिया, जहाँ उन्हें शिक्षकों और पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता फोटो पत्रकारों ने, दृश्य-आधारित कहानी कहने, सम्पादन, अनुक्रमण और तस्वीरें छाँटने पर प्रशिक्षण व सलाह दी.

यूएन एजेंसी में सहायक अधिकारी, किरी अत्री कहते हैं, "शरणार्थियों के पास कौशल, विचार, आशाएँ और सपने होते हैं. यह महत्वपूर्ण है कि हम एक शरणार्थी के बुनियादी अस्तित्व से परे जाकर सोचें."

इसी अहम लक्ष्य के साथ UNHCR ने फ़ोटोग्राफ़ी कार्यक्रम को, एक सुरक्षित स्थल सृजित करने और युवा शरणार्थियों के लिये एक अवसर के रूप में ढाला.

जून से दिसम्बर, 2021 तक, कड़ी चयन प्रक्रिया के बाद चुने गए आठ दृश्य-आधारित कथाकारों ने घर की परिकल्पना को तस्वीरों में ढालने की कोशिश की है.

युवाओं ने अपनी यात्रा को दर्ज करने और उसे परखने के लिये कैमरे का सहारा लिया, जो उनके लिये एक मरहम का ज़रिया भी बना. उनकी आशाओं, पहचान, अतीत और वर्तमान को छूने के लिये, जो भी उन्होंने खोया व पाया.

यह कार्यक्रम, शरणार्थी दृश्य-आधारित कहानीकारों को सशक्त बनाने और उन्हें एक ऐसा मंच प्रदान करने का प्रयास करता है जहाँ वे अपना काम प्रदर्शित कर सकें.

इसका लक्ष्य शरणार्थी आवाजों को बुलन्द करना, दृष्टिकोण बदलना और शरणार्थी सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ, शरणार्थियों एवं मेज़बान समुदायों के बीच परस्पर सम्बन्धों को बढ़ावा देना है.

यह परियोजना शरणार्थियों पर UNHCR के ग्लोबल कॉम्पैक्ट की भावना में शुरू की गई थी, जोकि शरणार्थियों के लिये बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के तरीक़े और उद्देश्यों का एक खाका प्रदान करती है.

जो कहानियाँ सामने आईं, वे छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह थीं, जो घर और अपनेपन की एक बड़ी तस्वीर उकेरती हैं: एक माँ अपनी बेटी के बालों की चोटी बनाती हुई, एक पक्षी आकाश में उड़ता हुआ, एक चेहरा खिड़की से बाहर झाँकता हुआ, प्रार्थना, संगीत, और आशा के प्रतीक नए हरे पत्ते.

अब्दुल बारी डेलावरी, अफ़ग़ानिस्तान

युवक अब्दुल बारी डेलावेरी फोटो खींचने के लिए सोनी अल्फा कैमरा अपनी आंख के पास पकड़े हुए है।
UNHCR/Chirantan Khastgir 22 वर्षीय अब्दुल, एक दिन पत्रकार बनने और अपने कैमरे में घटनाएँ समेटने की उम्मीद रखते हैं.

22 वर्षीय अब्दुल, समय का इतिहासकार बनना चाहते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र, अब्दुल एक दिन पत्रकार बनने और अपने कैमरे में घटनाएँ समेटने की उम्मीद रखते हैं.

उनका कहना है कि फ़ोटोग्राफ़ी ने उन्हें तब भी आकर्षित किया जब वह काबुल में रहने वाले एक छोटे से लड़के थे. वह याद करते हैं कि किस तरह वह अक्सर अपने पड़ोसी के एक छोटे से फ़ोटो स्टूडियो में जाकर, उनसे तस्वीरें क्लिक करने के लिये कैमरा माँगते थे.

2018 से भारत में, अब्दुल यूएन एजेंसी के ‘Visual Storytellers’ कार्यक्रम के माध्यम से, अपना सपना साकार करने के लिये तैयार है.

हल्की पृष्ठभूमि के सामने किताब पढ़ती हुई एक महिला की आकृति।
UNHCR/Abdul Bari Delawery अफ़गान शरणार्थी, अब्दुल बारी डेलावरी द्वारा ली हुई एक तस्वीर.

वह बताते हैं कि वह जो तस्वीरें खींचते हैं, वो लोगों की कहानियों को वैसे ही बयान करती हैं जैसे वो असल में हैं. "मैं अपनी तस्वीरों को सम्पादित नहीं करना चाहता. मैं वास्तविक तस्वीरें क्लिक करना चाहता हूँ. मैं अपने कैमरे के लैंस के ज़रिये कहानियाँ सुनाना चाहता हूँ." 

हाल में ली गई एक तस्वीर के कैप्शन में वो कहते हैं, “जब मैं अपने छोटे भाई को अपनी नोटबुक में लिखता देखता हूँ, तो मैं आशा से भर जाता हूँ; कि जीवन बेहतर है और हो सकता है. घर वही है जहाँ यह सब शुरू होता है."

खुली किताब की एक तस्वीर, घर के बारे में उनकी बहन के विचारों को दर्शाती है: "किताबों की गन्ध, पन्ने पलटते हुए, काग़ज़ की श्रुति-मधुरता, वह रौशनी जो पढ़ते समय किताबों पर पड़ती है." अब्दुल आगे कहते हैं, "अगर वो यहाँ आकर ख़ुश है, तो मैं भी ख़ुश हूँ."

रोया सफूरा, अफ़ग़ानिस्तान

एक महिला फोटोग्राफर सड़क पर कैमरा पकड़े हुए है।
UNHCR/Chirantan Khastgir काबुल में पली-बढ़ी 20 वर्षीय रोया को याद है कि कैसे वह हमेशा पारिवारिक समारोहों में तस्वीरें क्लिक करने को आतुर रहती थीं.

काबुल में पली-बढ़ी 20 वर्षीय रोया को याद है कि किस तरह वह हमेशा पारिवारिक समारोहों में तस्वीरें क्लिक करना चाहती थी.

2019 से भारत में शरणार्थी के तौर पर रह रहीं रोया, एक कैमरे और चेहरे पर मुस्कान के साथ उम्मीद करती हैं कि उनके बचपन का जुनून अब उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करेगा.

एक चमकदार, गर्म पृष्ठभूमि के सामने, ऊर्ध्वाधर पाइपों की एक श्रृंखला से उड़ान भरते हुए एक पक्षी की आकृति को कैद किया गया है।
UNHCR/Roya Safura अफ़गान शरणार्थी, रोया सफ़ूरा द्वारा खींची गई एक तस्वीर.

रोया कहती हैं, "मैं पहले लोगों से बात करने से डरती थी, लेकिन अब मुझमें आत्मविश्वास है. यह परियोजना मेरे लिये एक बड़ा अवसर है." 

उनकी तस्वीरें स्वतंत्रता के साथ-साथ, अपनेपन की भावना को भी दर्शाती हैं.

शाम को आकाश में उड़ते पक्षी की तस्वीर, घर और आज़ादी का प्रतीक है. जिस घर को आप देख सकते हैं, वही तस्वीर, घर की तस्वीर है. वह तस्वीर के कैप्शन में कहती हैं, "हम अपना घर अपने साथ ले जाते हैं." 

सेदिका रेज़ी, अफ़ग़ानिस्तान

अफगान शरणार्थी सिदिका रेज़ाई बाहर सोनी कैमरा पकड़े हुए मुस्कुरा रही हैं।
UNHCR/Chirantan Khastgir 24 वर्षीय सेदिका, 2018 में अफ़ग़ानिस्तान से अपनी माँ और चार भाई-बहनों के साथ भारत आई थीं.

24 वर्षीय सेदिका, 2018 में अफ़ग़ानिस्तान से अपनी माँ और चार भाई-बहनों के साथ भारत आई थीं.

यूएनएचसीआर के कार्यक्रम के बारे में वह कहती हैं, "मैं इसे एक साहसिक कार्य मानकर, इसका हिस्सा बन गईं."

कार्यक्रम ने उन्हें यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि घर उन्हें क्या सन्देश देता है.

भारत के नई दिल्ली में रहने वाला एक शरणार्थी, UNHCR के मेंटरशिप कार्यक्रम के तहत ली गई एक सशक्त तस्वीर के माध्यम से अपने घर और परिवार पर विचार कर रहा है।
UNHCR/Sediqa Rezaie सेदिका रेज़ी की तस्वीरें, उनके घर के कई अलग-अलग पहलुओं को पेश करती हैं.

उनकी तस्वीरें, घर के कई अलग-अलग पहलुओं को पेश करती हैं - उसके पिता के साथ वर्चुअल बातचीत, उनकी माँ की पकाई रोटी की सुगन्ध, अपने भाई-बहनों के साथ हल्के पल साझा करते हुए.

वो कहती हैं, "घर वही है, जहाँ मेरा परिवार है." 

मुरसल मोहम्मदी, अफ़ग़ानिस्तान

चश्मा पहने एक महिला फोटोग्राफर सोनी कैमरे से फोटो खींच रही है।
UNHCR/Chirantan Khastgir दिल्ली विश्वविद्यालय में मल्टीमीडिया और मास कम्युनिकेशंस के तीसरे वर्ष की छात्रा, मुरसल को लगता है कि यूएनएचसीआर परियोजना उन्हें कहानी कहने के कौशल को सुधारने में मदद करेगी.

23 वर्षीय मुरसल का घर से क्या सम्बन्ध है? क्या वो शान्ति, जो उसे तब महसूस होती है, जब उसकी माँ उसके बाल सँवारती है.

वह कहती हैं, "मैं उसके हाथों में प्यार और देखभाल महसूस करती हूँ और इससे मुझे घर जैसा महसूस होता है." मुरसल ने काबुल छोड़ दिया और 2017 में शरणार्थी के रूप में भारत में बस गईं.

एक व्यक्ति द्वारा सफेद टी-शर्ट पहने एक युवा व्यक्ति के बालों की चोटी बनाते हुए एक क्लोज-अप, ब्लैक एंड व्हाइट फोटो।
UNHCR/Mursal Mohammadi 23 वर्षीय मुरसल, अपने घर को तब महसूस करती है, जब उनकी माँ उनके बाल सँवारती है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में मल्टीमीडिया और मास कम्युनिकेशंस के तीसरे वर्ष की छात्रा, मुरसल को महसूस होता है कि UNHCR परियोजना उन्हें कहानी कहने के कौशल को सुधारने में मदद करेगी.

"यह परियोजना मुझे अपने शरणार्थी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने का अवसर देती है. यह एक ऐसा माध्यम है जो मुझे अपनी आवाज़ बुलन्द करने में मदद करता है."

वह इस तथ्य से सशक्त महसूस करती है कि अब वह अपनी कहानी ख़ुद बता सकती हैं. "अब मेरे पास अपने ख़ुद के कैमरे से ऐसा करने की शक्ति है, न कि किसी अजनबी के लैंस से." मुरसल कहती हैं, हमें बस एक मंच और एक अवसर की ज़रूरत थी.

वहीदुल्लाह फ़ैज़ी, अफ़ग़ानिस्तान

फोटोग्राफर वाहिदुल्लाह फैजी दिल्ली में कांटेदार तार की बाड़ को कैमरे के लेंस से देख रहे हैं।
UNHCR/Chirantan Khastgir 18 वर्षीय वहीदुल्लाह को दिल्ली की सड़कों की तस्वीरें, अपने कैमरे में क़ैद करना बेहद पसन्द है.

18 वर्षीय वहीदुल्लाह को दिल्ली की सड़कों की तस्वीरें, अपने कैमरे में क़ैद करना बेहद पसन्द है.

वो कहते हैं, ''कभी-कभी मैं अकेले ही सड़कों पर चलते-चलते तस्वीरें खींचता हूँ.''

2017 में भारत आने से बहुत पहले, वह अफ़ग़ानिस्तान में तस्वीरें लेते रहे थे, जहाँ वो पले-बढ़े थे. वो कहते हैं, "मुझे पलों और भावनाओं को क़ैद करना पसन्द था." 

भारत में रात के समय बारिश में मोटरसाइकिल पर सवार तीन आदमी।
UNHCR/Wahidullah Faizi अफ़ग़ानिस्तान के शरणार्थी, वहीदुल्लाह फ़ैज़ी द्वारा ली गई दिल्ली की सड़कों की एक तस्वीर.

उनका मानना है कि दृश्य-आधारित कहानीकारों के लिये यह कार्यक्रम, उनके फ़ोटोग्राफ़ी कौशल को बढ़ाने - और उन्हें घर के मायने समझने में मदद करेगा.

"एक शरणार्थी के रूप में हम लगातार एक नए घर की तलाश में रहते हैं. इस परियोजना ने मुझे यह पता लगाने में मदद की है कि मेरा घर क्या है - वो मेरी खाना बनाती माँ और खेलते हुए भाई-बहनों से बनता है."

काप सियान सांगो, म्याँमार

कैप सियान सांग नाम का एक युवक बाहर फोटो खींचते समय कैमरे को अपनी आंख से लगाए हुए है।
UNHCR/Chirantan Khastgir 20 वर्षीय कप सियान के लिये फ़ोटोग्राफ़ी एक शौक हुआ करता था. अब यह एक जुनून बन चुका है. यूएनएचसीआर परियोजना ने इस क्षेत्र में उनकी रुचि बढ़ा दी है, और उन्हें विभिन्न आयामों का पता लगाने के लिये प्रोत्साहित किया है.

20 वर्षीय कप सियान के लिये फ़ोटोग्राफ़ी एक शौक़ हुआ करता था.

अब यह एक जुनून बन चुका है. यूएनएचसीआर परियोजना ने इस क्षेत्र में उनकी रुचि बढ़ा दी है, और उन्हें विभिन्न कोणों का पता लगाने के लिये प्रोत्साहित किया है. वो कहते हैं, "जितना ज़्यादा मैं क्लिक करता हूँ, मुझे उतने ही अधिक आइडिया आते हैं." 

चांदी के रंग के प्रेशर कुकर का क्लोज-अप शॉट, जिसके ऊपरी हिस्से से भाप निकल रही है।
UNHCR/Kap Sian Sang म्याँमार से शरणार्थी, काप सियान सांगो को प्रैशर कुकर की आवाज़, घर पर होने का अहसास कराती है.

कप बहुत कम उम्र में म्याँमार से अपनी माँ के साथ भारत आ गए थे. वो याद करते हैं कि कैसे उनकी माँ ने उनके पालन पोषण के लिये संघर्ष किया. वो एक तस्वीर में कहते हैं, प्रैशर कुकर की आवाज़, उन्हें घर पर होने का अहसास कराती है.

लेकिन घर क्या है? वो कहते हैं, "मेरा स्थाई घर हमेशा मेरा परिवार रहेगा, भले ही मैंने देश और शहर बदल लिये हों, और अलग-अलग घरों में रहा हूँ." 

ज़ोनुनमाविया राल्टे (डैनियल), म्याँमार

भारत से आए शरणार्थी डेनियल के हाथ में कैमरा है और वह व्यूफाइंडर से देख रहा है।
UNHCR/Chirantan Khastgir डैनियल, भारतीय धरती पर पैदा हुए थे, लेकिन वो एक शरणार्थी हैं. वो याद करते हैं कि जब यूएनएचसीआर से दृश्य कहानीकारों के कार्यक्रम के बारे में फ़ोन आया तो वह कितने उत्साहित थे.

19 साल के डैनियल, फ़ोटोग्राफ़ी के बारे में बात करते समय मुस्कराते हुए कहते हैं, "मैं एक वन्यजीव फ़ोटोग्राफ़र बनना चाहता हूँ."

भारत में अभयारण्यों और चिड़ियाघरों का दौरा और जानवरों की तस्वीरें क्लिक करना वो याद करते हैं. उनका कहना है कि अगर आज भी उन्हें यह मौक़ा मिले, तो वह घण्टों चिड़ियाघरों में बैठकर "उस बेमिसाल तस्वीर की प्रतीक्षा करेंगे."

भारत के नई दिल्ली में स्थित एक हरित इमारत की दीवार पर हाथियों और एक गिरे हुए पेड़ का एक विशाल भित्तिचित्र बना हुआ है, जिसे आसपास की हरी-भरी हरियाली के बीच से देखा जा सकता है।
UNHCR/Zonunmawia Ralte 19 साल के डैनियल, वन्यजीव फ़ोटोग्राफ़र बनना चाहते हैं.

डैनियल भारतीय धरती पर पैदा हुए थे, लेकिन वो एक शरणार्थी हैं. वो याद करते हैं कि जब यूएनएचसीआर से दृश्य कहानीकारों के कार्यक्रम के बारे में फ़ोन आया तो वह कितने उत्साहित थे.

"मैंने कहा: हाँ! मैं इसका हिस्सा बनना चाहता हूँ." इस कार्यक्रम ने एक फ़ोटोग्राफ़र बनने की उनकी महत्वाकांक्षा में उनका मार्गदर्शन किया है.

डैनियल ने अपनी तस्वीरों में घर के कई मायनों की पड़ताल की. एक अनजान शहर में एक अकेली माँ द्वारा अपनी सन्तान को पाले जाने पर, अपनी एक तस्वीर में वो कहते हैं, "यह प्रार्थना ही थी जिसने हमें आगे बढ़ाया."

खेलने से होने वाले आनन्द से जोड़ते हुए, वो कहते हैं घर फुटबॉल है. वहीं एक दूसरी तस्वीर में, क्षितिज से उन्हें आश्वासन मिलता है कि अन्धेरे के बाद प्रकाश होगा.

ऐज़ाज़ मुसफ़रज़ादा, अफ़ग़ानिस्तान

घुंघराले बालों और लाल चेकदार शर्ट पहने एक युवक खुले में कैमरे से तस्वीर ले रहा है।
UNHCR/Chirantan Khastgir 18 वर्ष के ऐज़ाज़ को वह समय याद है जब वह काबुल में अपने दोस्तों से कैमरे के सामने पोज़ देने के लिये कहता था.

18 वर्षीय ऐज़ाज़ को वो समय याद है जब वह काबुल में अपने दोस्तों से कैमरे के सामने पोज़ देने के लिये कहते थे.

उनका कहना है कि यूएनएचसीआर परियोजना ने फ़ोटोग्राफ़ी के प्रति उनके प्रेम को फिर से जगा दिया है.

वो कहते हैं, "मैं एक फ़ैशन फ़ोटोग्राफ़र बनना चाहता हूँ." मैं अपनी तस्वीरों के माध्यम से भावनाओं को पकड़ने की कोशिश करता हूँ."

एक युवक धुंधली रोशनी वाले कमरे में गिटार के पास बैठकर किताब पढ़ रहा है।
UNHCR/Ajaz Musaferzada ऐज़ाज़, अपनी तस्वीरों के माध्यम से भावनाओं को पकड़ने की कोशिश करते हैं.

यह इस लेख का संक्षिप्त संस्करण है, जोकि पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.