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आर्थिक संकट से गुज़र रहे श्रीलंका में विरोध प्रदर्शनों के दमन की निन्दा

श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में सुपरमार्केट में ज़रूरी खाद्य सामग्री की क़िल्लत.
© ADB/M.A. Pushpa Kumara
श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में सुपरमार्केट में ज़रूरी खाद्य सामग्री की क़िल्लत.

आर्थिक संकट से गुज़र रहे श्रीलंका में विरोध प्रदर्शनों के दमन की निन्दा

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने श्रीलंका सरकार से शान्तिपूर्ण ढँग से एकत्र होने और प्रदर्शनों के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित किये जाने का आग्रह किया है. गम्भीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे श्रीलंका में हाल के महीनों में, आमजन में हताशा बढ़ी है जिसके परिणामस्वरूप देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए हैं.

 

यूएन के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने शुक्रवार को जारी अपने एक वक्तव्य में, हाल ही में देश में आपातकाल लागू किये जाने और सोशल मीडिया प्लैटफ़ार्म के इस्तेमाल को बन्द किये जाने की घोषणा पर गहरी चिन्ता जताई है.

“ऐसा प्रतीत होता है कि बद से बदतर हो रहे आर्थिक संकट और ईंधन, बिजली, दवाओं व अतिआवश्यक खाद्य सामग्री की क़िल्लत की पृष्ठभूमि में, ये क़दम शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों को रोकने या हतोत्साहित करने पर लक्षित हैं.”

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31 मार्च को राष्ट्रपति निवास के बाहर सैकड़ों लोगों ने उनके इस्तीफ़े की मांग करते हुए प्रदर्शन किया जिसके बाद सरकार ने 2 से 4 अप्रैल तक राष्ट्रव्यापी करफ़्यू लागू किया था. 

2 अप्रैल को ही राष्ट्रपति ने राष्ट्रव्यापी आपातकाल लागू किये जाने की घोषणा की थी, जिसे बाद में हटा लिया गया, और सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म के इस्तेमाल पर लगी रोक को भी वापिस ले लिया गया है.

यूएन विशेषज्ञों ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिये आँसू गैस और पानी की तेज़ बौछारों के अत्यधिक इस्तेमाल और सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म पर रोक लगाये जाने की निन्दा की है. 

विशेष रैपोर्टेयर ने श्रीलंका सरकार से छात्रों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों को शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों की अनुमति देने का आग्रह किया है.

साथ ही, उन्हें ऑनलाइन और ऑफ़लाइन, बिना किसी हिचक के, मुक्त भाव से अपने राजनैतिक विचारों और असंतोष को साझा करने देना होगा.

आर्थिक संकट

विदेशी कर्ज़, भ्रष्टाचार और कोविड-19 महामारी से उपजी चुनौतियों के कारण श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है. 

श्रीलंका में विदेशी मुद्रा की कमी के परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति में उछाल आया है, ईंधन और अतिआवश्यक सामान की क़िल्लत है और लम्बे अन्तराल के लिये बिजली आपूर्ति बाधित हो रही है. 

बताया गया है कि आर्थिक संकट के कारण खाद्य वस्तुओं और स्वास्थ्य सुविधाओं की सुलभता पर गम्भीर असर हुआ है, जिससे निर्धनता में जीवन गुज़ार रहे और गम्भीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिये मुश्किलें खड़ी हो गई हैं.

हज़ारों लोगों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लेते हुए देश में राजनैतिक व आर्थिक सुधारों की मांग की है. 

सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिये आँसूगैस के गोले छोड़े और पानी की तेज़ बौछारों का इस्तेमाल किया, जिसके बाद सुरक्षाकर्मियों और विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच झड़पें हुईं. 

प्रदर्शनों में लगभग 50 लोग घायल हुए हैं, जिनमें अनेक पत्रकार हैं और 50 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.

सम्वाद पर बल

विशेष रैपोर्टेयर ने श्रीलंका प्रशासन से आर्थिक संकट का असर कम करने और राजनैतिक सुधारों के मुद्दे पर आमजन के साथ रचनात्मक और खुले माहौल में सम्वाद स्थापित करने का आग्रह किया है.

“शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों और जायज़ असहमति के स्वरों के विरुद्ध प्रशासन द्वारा अनावश्यक और अत्यधिक बल प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए.”

उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध बल प्रयोग से शान्तिपूर्ण ढँग से अपने असंतोष को व्यक्त करने के रास्तों के लिये जोखिम पैदा होगा और तनाव बढ़ने का ख़तरा बढ़ेगा.

मानवाधिकार विशेषज्ञ

इस वक्तव्य को जारी करने वाले मानवाधिकार विशेषज्ञों की सूची यहाँ देखी जा सकती है.

सभी स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ, जिनीवा में यूएन मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त किये जाते हैं, और वो अपनी निजी हैसियत में, स्वैच्छिक आधार पर काम करते हैं.

ये मानवाधिकार विशेषज्ञ संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और ना ही उन्हें उनके काम के लिये, संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन मिलता है.