कोविड-19: शिक्षा के 'विशालतम विभाजक' बन जाने का जोखिम

बुर्कीना फ़ासो में एक छात्र अपने घर पर पढ़ाई करते हुए.
© UNICEF/Tanya Bindra
बुर्कीना फ़ासो में एक छात्र अपने घर पर पढ़ाई करते हुए.

कोविड-19: शिक्षा के 'विशालतम विभाजक' बन जाने का जोखिम

संस्कृति और शिक्षा

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – UNICEF की बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अब तीसरे वर्ष में दाख़िल हो चुकी कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर में, लगभग साढ़े चालीस करोड़ बच्चों को, स्कूली शिक्षा के लिये पूर्ण वापसी से रोक दिया है.

जबकि 23 देशों में स्कूल पूरी तरह से खुलने हैं, तो ऐसे में बहुत से बच्चे स्कूली शिक्षा से पूरी तरह वंचित होने के जोखिम का सामना कर रहे हैं.

यूएन बाल एजेंसी की कार्यकारी निदेशिका कैथरीन रसैल का कहना है कि जब बच्चे अपने अध्यापकों और सहपाठियों के साथ सीधे तौर पर बातचीत नहीं कर पाते हैं तो उनकी तालीम प्रभावित होती है. और जब बच्चे अपने अध्यापकों और सहपाठियों के साथ बिल्कुल भी बातचीत नहीं कर पाते हैं तो उनकी शिक्षा हानि, स्थाई बन जाती है.

उनका कहना है, “शिक्षा प्राप्ति में इस बढ़ती विषमता का मतलब है कि शिक्षा जोखिम एक विशालतम विभाजक बन रहा है, नाकि विशालतम समानता कारक. जब दुनिया अपने बच्चों को शिक्षित करने में नाकाम हो जाती है तो उसके नुक़सान सभी को उठाने पड़ते हैं.”

दो ट्रिलियन घण्टों का नुक़सान

Are children really learning? नामक यूनीसेफ़ रिपोर्ट में, कोविड-19 के कारण स्कूल बन्द होने से शिक्षा प्राप्ति पर हुए प्रभावों के बारे में आँकड़े एकत्र किये गए हैं, जिनमें महामारी से पहले शिक्षा प्राप्ति की स्थिति के साथ तुलना भी की गई है.

रिपोर्ट ध्यान दिलाती है कि पिछले दो वर्षों के दौरान, लगभग 14 करोड़ 70 लाख बच्चों को अपनी स्कूली शिक्षा का लगभग आधा समय गँवाना पड़ा है – जोकि दुनिया भर में निजी माहौल में शिक्षा प्राप्ति के लगभग दो ट्रिलियन घण्टों के नुक़सान के बराबर है.

अफ़्रीका का उदाहरण

रिपोर्ट में साथ ही इस बारे में भी साक्ष्य रेखांकित किये गए हैं कि बहुत से बच्चे, अपने स्कूल खुलने पर स्कूली शिक्षा प्राप्ति के लिये कक्षाओं में वापिस नहीं लौटे हैं, जिनमें लाइबेरिया, पश्चिम अफ़्रीका शामिल हैं जहाँ पब्लिक स्कूलों के 43 प्रतिशत बच्चे, दिसम्बर 2020 में स्कूल फिर खुलने पर कक्षाओं में वापिस नहीं लौटे.

और दक्षिण अफ़्रीका में, मार्च 2020 से जुलाई 2021 के दरम्यान स्कूलों से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या ढाई लाख से तीन गुना बढ़कर साढ़े सात लाख हो गई. यूगाण्डा में लगभग दो वर्ष तक स्कूल बन्द रहने के बाद जब जनवरी 2022 में स्कूल खुले तो 10 में से लगभग एक छात्र स्कूली शिक्षा के लिये वापिस नहीं लौटा है.

उधर मलावी में सैकण्डरी शिक्षा में, स्कूलों से बाहर रहने वाली छात्राओं की संख्या में, वर्ष 2020 और 2021 के दौरान, 48 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है.
केनया में 10 से 19 वर्ष के 4000 किशोरों के बीच कराए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि 16 प्रतिशत लड़कियाँ और 8 प्रतिशत लड़के, स्कूल खुलने पर शिक्षा प्राप्ति के लिये वापिस नहीं लौटे हैं.

यूगाण्डा में एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षा हासिल करते हुए बच्चे
© UNICEF/Maria Wamala
यूगाण्डा में एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षा हासिल करते हुए बच्चे

निर्बल व हाशिये पर

स्कूली शिक्षा से वंचित रहने वाले बच्चों में ज़्यादातर समाज के निर्बल व हाशिये पर धकेल दिये गए समुदायों के बच्चे हैं जो पढ़ने, लिखने और बहुत शुरुआती गणित करने के योग्य भी नहीं हैं.

उसके अलावा ऐसे बच्चे स्कूलों के सुरक्षा नैटवर्क से अलग हो जाते हैं जिससे उनके शोषण और जीवन भर निर्धनता व वंचित हालात में जीवन जीने का और भी ज़्यादा जोखिम उत्पन्न हो जाता है.

यूनीसेफ़ की कार्यकारी निदेशिका कैथरीन रसैल का कहना है कि महामारी शुरू होने से पहले भी, निर्बल व हाशिये पर रहने वाले बच्चे पीछे ही छूटे हुए थे.

उनका कहना है कि महामारी अब तीसरे वर्ष में प्रविष्ट हो गई है, हम सामान्य हालात में वापिस नहीं लौट सकते हैं. हमें नई सामान्य स्थिति बनाने की ज़रूरत है, बच्चों को स्कूली शिक्षा के लिये कक्षाओं में पहुँचाना होगा, उनकी शिक्षा ज़रूरतों व स्तर का आकलना करना होगा और उन्हें उनकी आवश्यकतानुसार सहायता मुहैया कराने होंगे. साथ ही शिक्षों को भी पर्याप्त व समुचित प्रशिक्षण और अन्य संसाधन मुहैया कराने होंगे.

“इससे कुछ भी कम करने के बहुत बड़े जोखिम या नुक़सान हो सकते हैं.”