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‘हज़ार झरनों वाली पहल’ - ओडिशा के स्थानीय समुदायों के लिये वरदान

भारत के ओडिशा राज्य में प्राकृतिक झरने से बहता पानी.
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भारत के ओडिशा राज्य में प्राकृतिक झरने से बहता पानी.

‘हज़ार झरनों वाली पहल’ - ओडिशा के स्थानीय समुदायों के लिये वरदान

जलवायु और पर्यावरण

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और भारत सरकार ने देश के पूर्वी प्रदेश ओडिशा में ‘1000 स्प्रिंग्स पहल’ नामक एक योजना शुरू की है, जिसके तहत स्थानीय झरनों का संरक्षण करके, जल की समस्या वाले दुर्गम पहाड़ी इलाक़ों में स्थानीय समुदायों को चौबीसों घण्टे पीने का स्वच्छ पानी मिल रहा है.

जब आपके घर में हर समय नलों से ‘जीवन का अमृत’ पानी धाराप्रवाह आता हो, तो इस वरदान को मामूली समझ लिया जाता है. जीवन बनाए रखने का यह सबसे महत्वपूर्ण तत्व, पानी, आज भी भारत के दुर्गम पहाड़ी इलाकों और जंगलों में रहने वाले अनेक स्थानीय समुदायों को मुश्किल से ही हासिल हो पाता है.

जल का अधिकार, भारत के संविधान में वर्णित एक मौलिक मानव अधिकार है. लेकिन यहाँ तक कि भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय (जल संसाधन) की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में 27% स्थानीय समुदायों के पास सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल तक पहुँच उपलब्ध नहीं है, यहाँ तक कि उनकी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पाती हैं.

जटिल भौगोलिक चुनौतियों के कारण, पहाड़ियों और जंगलों में कुओं, नलों, बोरहोलों जैसे भूजल विकास के पारम्परिक तरीक़े का उपयोग सीमित है. स्वच्छ जल तक पहुँच की कमी से, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण प्रभावित होता है और विकास के रास्ते में बाधाएँ उत्पन्न होती हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विश्व स्तर पर अपर्याप्त पानी, स्वच्छता और सफ़ाई के कारण हर साल, 8 लाख 27 हज़ार लोगों की, मौत हो जाती है. वहीं कोविड-19 महामारी ने स्वच्छता का महत्व और उजागर कर दिया है. 

ओडिशा के सुदूर इलाकों में पहाड़ी इलाके।
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ओडिशा के सुदूर इलाकों में पहाड़ी इलाके।

हर झरना मायने रखता है

ओडिशा के तेंतुलीपाड़ा गाँव में कृषि योग्य भूमि के मालिक, पिस्कू मांझी कहते हैं, "यह सब सूख गया है. पूरा सूखा. मेरे गाँव में चार झरने थे. वे सब ख़त्म हो गए हैं. हमारे लिये हर एक झरना मायने रखता है, लेकिन वे सभी सूख गए हैं, इसलिये हमारे गाँव में कोई खेती नहीं हो पाती.” 

झरने - पहाड़ी क्षेत्रों में भूजल का एक प्राकृतिक स्रोत हैं – जो पर्वतीय क्षेत्रों में दूरदराज़ के ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोगों की पानी की ज़रूरतों को पूरा कर सकते हैं. हालाँकि, भारत के मध्य और पूर्वी हिस्सों में, यह स्रोत बहुत कम उपयोग में हैं, जहाँ भारत की आदिवासी आबादी का 75% से अधिक हिस्सा है.

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और भारत सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय की ‘1000 स्प्रिंग्स पहल’, ग्राम विकास नामक सामुदायिक संगठन के साथ मिलकर, ओडिशा में शुरू की गई है. इसका उद्देश्य है - स्थानीय समुदायों तक स्वच्छ पानी की बेहतर पहुँच सुनिश्चित करना.

जल स्रोत जीवन्त करने की पहल

जनजातीय जल-विज्ञानियों को क्षेत्र स्तरीय प्रशिक्षण.
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जनजातीय जल-विज्ञानियों को क्षेत्र स्तरीय प्रशिक्षण.

इस पहल के तहत, प्राकृतिक झरनों की पहचान करके उन्हें फिर से जीवन्त करने का काम किया जाता है, जिससे समुदायों को स्वच्छता, पोषण और आजीविका में सुधार करने में भी मदद मिलती है. इससे स्थानीय समुदायों को प्राकृतिक झरनों का प्रबन्धन सौंपकर उनका सशक्तिकरण किया जाता है.

बदले में, यह उनके कृषि उत्पादन व आजीविका क्षमता को बढ़ाता है और पारिस्थितिक सन्तुलन बनाए रखने में मदद करता है. इससे सभी के लिये स्वच्छ पानी और सफ़ाई सुनिश्चित करने के टिकाऊ विकास लक्ष्य 06 को हासिल करने में मदद मिलती है.

सदियों से, स्वदेशी समुदाय, घरों, पशुओं और सिंचाई की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये प्राकृतिक झरने के पानी का उपयोग करते रहे हैं. हालाँकि, हाल ही में, जलवायु परिवर्तन के ख़तरों के कारण इन झरनों से पानी का निर्वहन काफ़ी कम हो रहा है.

इससे वनस्पति के फैलाव में कमी, पीने के पानी की गम्भीर समस्या और आजीविका सम्बन्धित गतिविधियाँ सीमित हो गई हैं. महिलाओं और लड़कियों को पीने और घरेलू खपत के लिये पानी लाने के लिये लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उन्हें शिक्षा या अन्य व्यवसाय करने का समय नहीं मिल पाता है.

पारम्परिक ज्ञान

 ओडिशा के कालाहाण्डी ज़िले में झरनों की रक्षा के लिये वृक्षारोपण और कण्टूर-ट्रैंचिंग में शामिल एक आदिवासी महिला.

‘1000 झरना पहल’ के हिस्से के रूप में, स्थानीय आदिवासी समुदायों के युवाओं को, पारम्परिक और वैज्ञानिक ज्ञान की मदद से, नंगे पाँव जलविज्ञानी के तौर पर प्रशिक्षित किया जाता है. ये प्रशिक्षित पैरा-हाइड्रोलॉजिस्ट एक मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग करके अपने और आस-पास की बस्तियों में सम्भावित झरनों की पहचान करते हैं और उनका नक्शा बनाते हैं.

फिर इस डेटा को एक भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित ‘स्प्रिंग एटलस’ में डाला जाता है, जो कि झरनों की एक ऑनलाइन सूची है. यह झरनों का पता लगाने, उनकी स्थिति, पानी की गुणवत्ता, निर्वहन क्षमता और अन्य भौतिक, रासायनिक व जैविक गुणों का विश्लेषण करने में मदद करता है. इससे राज्य में झरनों का राष्ट्रीय मानचित्र विकसित करने के लिये अहम सूचना कमी भी पूरी होती है.

पिस्कू मांझी के तुकुगुडा गाँव के एक जलविज्ञानी राजकुमार नाइक कहते हैं, “झरनों का खोज करने से झरनों की हालत, उनकी गुणवत्ता स्थिति, पानी की गुणवत्ता और निर्वहन क्षमता को समझने में मदद मिलती है. हमने पारम्परिक हाइड्रो-जियोलॉजिकल सिद्धान्त लागू किये हैं और अपने समुदाय के सहयोग से हमारे इलाक़े के तीन झरनों का सफलतापूर्वक कायाकल्प किया है.”

समुदाय की मदद

ये प्रशिक्षित हाइड्रो-जियोलॉजिस्ट, समुदाय के अन्य लोगों को झरनों की सुरक्षा, कायाकल्प और प्रबन्धन का प्रशिक्षण देते हैं.

राजकुमार कहते हैं, “मैं रोज़ाना पानी के बहाव का माप लेकर और गुणवत्ता मानकों के लिये पानी का परीक्षण करके, इसे मोबाइल ऐप के ज़रिये वेबसाइट पर अपलोड करता हूँ. झरनों के कायाकल्प के बारे में सीखने के अलावा, हमने प्रौद्योगिकी और उपयोगिता के बारे में भी सीखा है. मैं अपने काम से ख़ुश हूँ क्योंकि मैं अपने समुदाय की मदद कर रहा हूँ.” 

इस परियोजना ने समुदाय को ‘कण्टूर-ट्रेन्चिंग’ अपनाने के लिये भी प्रोत्साहित किया है, यानि सतह से बह जाने वाले वर्षा के जल को गढ्ढे खोदकर इकट्ठा करने की तकनीक, जिससे यह पानी धीरे-धीरे मिट्टी में रिस सके. झरने को मिट्टी के कटाव से बचाने के लिये, समुदाय जलग्रहण क्षेत्र में वृक्षारोपण और भूमि विकास कार्यों में भी भाग ले रहा है.

सकारात्मक परिणाम

अब घरों में चौबीसों घण्टे झरनों का पानी उपलब्ध है.
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अब घरों में चौबीसों घण्टे झरनों का पानी उपलब्ध है.

सामाजिक वन कार्यक्रम के अन्तर्गत, वन विभाग, ओडिशा सरकार के सहयोग से, जलग्रहण क्षेत्रों में झरनों के खण्डित तलों की सुरक्षा के लिये, लगभग 20 हज़ार स्वदेशी पौधे भी लगाए गए हैं. पुनर्बहाली के ऐसे कार्यक्रमों से, झरनों के माध्यम से पानी का निर्वहन धीरे-धीरे बढ़ रहा है.

जैसे ही झरनों से पानी की आपूर्ति सुनिश्चित हुई, ग्रामीणों ने इन बस्तियों में पीने और आजीविका की ज़रूरतों के लिये एक सामुदायिक झरना पाइप जल आपूर्ति टैंक का निर्माण किया.

अब, ओडिशा के कालाहाण्डी और कन्धमाल ज़िलों की कई बस्तियों के घरों में चौबीसों घण्टें प्राकृतिक झरनों के ताज़े पानी की आपूर्ति होती है, जिससे महिलाओं और लड़कियों का बोझ कम हुआ है और वे अपने समय का उपयोग अन्य गतिविधियों के लिये करने में सक्षम हैं.

कालाहाण्डी क्षेत्र के गाँव तुकुगुड़ा की ग्राम विकास समिति की सचिव, संथिलता मांझी कहती हैं, “शुरू में, हम खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पारम्परिक स्थानान्तरण खेती करते थे. लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से, ग्रामीणों ने झरनों का पानी कम होते देखा. हमें ‘1000 झरना पहल’ के तहत झरना कायाकल्प के बारे में पता चला. हमने अलग-अलग जगहों पर हज़ार से अधिक गड्ढे खोदे और उन्हें मज़बूत करने के लिये 9 हज़ार पौधे लगाए.”

वो कहती हैं, “अब हमारे घरों में चौबीसों घण्टे पानी आता है. अब हम सर्दियों में भी सब्ज़ियाँ उगाते हैं और हर साल दो फ़सलें उगा पाते हैं. ग्राम विकास समिति के सचिव के रूप में, मैं यह सुनिश्चित करुंगी कि समुदाय इन झरनों की हमेशा के लिये रक्षा करे.”

अब तक, ‘1000 झरना पहल’ के तहत, ओडिशा के 11 ज़िलों की 116 बस्तियों में 554 झरनों की पहचान करने में मदद मिली है. परिणामस्वरूप, 25 आदिवासी बस्तियों को, समुदाय के नेतृत्व वाले स्प्रिंग-आधारित गुरुत्वाकर्षण आपूर्ति प्रणाली के माध्यम से, चौबीसों घण्टे अपने घरों में स्वच्छ और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध है.

झरनों के जलग्रहण क्षेत्रों में, वर्षा के जल को बह जाने से रोकने के लिये और जलभृतों के स्थाई पुनर्भरण हेतु, मिट्टी की नमी को बढ़ाने के मक़सद से, एक लाख 50 हज़ार से अधिक देसी प्रजातियों के पेड़ लगाए गए हैं.

इस पहल से जलग्रहण क्षेत्र में लगभग  एक हज़ार 250 एकड़ भूमि पर सकारात्मक असर पड़ा है. 25 बस्तियों ने 115 एकड़ (वर्तमान) से 750 एकड़ तक वृक्षों के आवरण को बढ़ाने के लिये मुहिम शुरू कर दी है, जिससे अगले 40 वर्षों में 95 हज़ार 200 टन कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण सम्भव होगा.

‘1000 झरना पहल’ से आजीविका निर्माण के साथ-साथ, आदिवासी समुदाय को सशक्त बनाने, किसानों की आय में वृद्धि करने और टिकाऊ विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में भारत के जलवायु कार्रवाई प्रयासों में भी मदद मिली है.

यंत्र के ज़रिये जलविज्ञानीय मानचित्रण और झरना जल संसाधनों की पहचान की जाती है.
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यंत्र के ज़रिये जलविज्ञानीय मानचित्रण और झरना जल संसाधनों की पहचान की जाती है.