कोविड-19: मेडिकल कूड़े-कचरे की समस्या बनी विशाल चुनौती

कोविड-19 महामारी से बचने के ऐहतियाती उपायों के तहत पहना जाने वाला फ़ेस मास्क भी, अब प्लास्टिक प्रदषण बढ़ने का एक बड़ा कारण बन गया है क्योंकि लोग बिना सोचे-समझे इन्हें कहीं भी फेंक देते हैं.
Unsplash/Brian Yurasits
कोविड-19 महामारी से बचने के ऐहतियाती उपायों के तहत पहना जाने वाला फ़ेस मास्क भी, अब प्लास्टिक प्रदषण बढ़ने का एक बड़ा कारण बन गया है क्योंकि लोग बिना सोचे-समझे इन्हें कहीं भी फेंक देते हैं.

कोविड-19: मेडिकल कूड़े-कचरे की समस्या बनी विशाल चुनौती

स्वास्थ्य

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में, कोविड-19 महामारी का मुक़ाबला करने के प्रयासों के परिणामस्वरूप लाखों टन अतिरिक्त मेडिकल कूड़ा - कचरा इकट्ठा हो गया है जिसने स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों पर भारी बोझ डाल दिया है.

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने मंगलवार को जारी रिपोर्ट में कहा है कि मुख्य रूप से प्लास्टिक से भरे इस चिकित्सा कचरे के भारी बोझ से, इनसानी और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिये भी भारी जोखिम उत्पन्न होने के साथ-साथ, कूड़ा – कचरा प्रबन्धन सेवाओं में बेहतरी लाने की तत्काल ज़रूरत भी उजागर हुई है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस ऐडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा कि रिपोर्ट याद दिलाती है कि महामारी वैसे तो किसी एक सदी में सबसे गम्भीर स्वास्थ्य संकट होता है, मगर ये संकट देशों के सामने दरपेश अनेक अन्य तरह की चुनौतियों से भी जुड़ा हुआ है.

इस्तेमाल किये हुए फ़ेस मास्क सावधानी के बिना ही फेंक दिये जाते हैं जो जगह-जगह नज़र आ रहे हैं.
© UNICEF/Johanna Alarcón

संगठन की इस रिपोर्ट में, निजी बचाव उपकरण (PPE) सामग्री की लगभग 87 हज़ार टन तादाद के विश्लेषण के आधार पर ये बात कही गई है, जो मार्च 2020 से नवम्बर 2021 के बीच ख़रीदी गई.

रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया गया है कि इसमें से ज़्यादातर सामग्री कूड़े-कचरे में तब्दील हो गई होगी.

रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि ये आँकड़ा, इस बारे में आरम्भिक संकेत मुहैया कराता है कि कोविड-19 महामारी का मुक़ाबला करने में कूड़े-कचरे की कितनी बड़ी समस्या उत्पन्न हुई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि 14 करोड़ से ज़्यादा टैस्ट किटों की आपूर्ति की गई जिनसे लगभग 2600 टन कचरा बनने का अनुमान है, जिसमें मुख्य रूप से प्लास्टिक है और ये ग़ैर-संक्रामक है.

इसके अलावा 7 लाख 31 हज़ार लीटर रासायनिक कचरा भी प्रयोग किया गया, जिसका आकार ओलिम्पिक तैराकी पूल के बराबर होगा. 

दुनिया भर में कोविड-19 वैक्सीन के 8 अरब टीके लगाए गए हैं जिनसे एक लाख 44 हज़ार टन अतिरिक्त कूड़ा-कचरा उत्पन्न हुआ है जो सिरिंज, सुइयों और सुरक्षा बक्सों के रूप में है.

रिपोर्ट कहती है कि संयुक्त राष्ट्र और तमाम देश, चूँकि अच्छी गुणवत्ता वाली पीपीई सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित करने में व्यस्त हो गए, इसलिये कोविड-19 महामारी सम्बन्धी स्वास्थ्य देखभाल में उत्पन्न होने वाले कूड़े-कचरे के सुरक्षित और टिकाऊ प्रबन्धन की तरफ़ कम ध्यान और संसाधन लगा पाए.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्वास्थ्य आपदा कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक डॉक्टर माइकल रायन ने कहा, “स्वास्थ्य कर्मियों को उपयुक्त पीपीई मुहैया कराना बहुत अहम है. मगर ये सुनिश्चित करना भी बहुत ज़रूरी है कि ये सामग्री, आसपास के पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डाले बिना, प्रयोग की जा सके.”

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इसका मतलब है कि प्रभावशाली प्रबन्धन प्रणाली मौजूद हो, जिसमें स्वास्थ्य कर्मियों के लिये इस बारे में दिशा-निर्देश भी शामिल हों कि पीपीई सामग्री व अन्य स्वास्थ्य सामग्री को प्रयोग करने के बाद उसका निपटारा किस तरह किया जाए.

आज के समय में, दुनिया भर में लगभग 30 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएँ, कूड़े-कचरे के मौजूदा बोझ को संभालने में सक्षम नहीं हैं, कम विकसित देशों में ये संख्या 60 प्रतिशत है. जबकि कोविड-19 महामारी ने अतिरिक्त बोझ डाल दिया. 

इससे स्वास्थ्यकर्मियों को अनेक तरह के स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य मामलों की निदेशक मारिया नीरा का मानना है कि महामारी ने, दुनिया को इस समस्या पर गम्भीर ध्यान देने के लिये विवश किया है.

सिफ़ारिशें

रिपोर्ट में इस समस्या का सामना करने के लिये, कुछ सिफ़ारिशें भी पेश की गई हैं, मसलन पर्यावरण अनुकूल पैकेजिंग और शिपिंग, पीपीई की सुरक्षित और बार-बार प्रयोग होने वाली सामग्री की ख़रीद, और इस तरह के री-सायकलिंग सैक्टर में निवेश करने पर विचार करना, जिसमें प्लास्टिक एक से ज़्यादा बार प्रयोग की जा सके.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, ये स्वास्थ्य संकट – मज़बूत राष्ट्रीय नीतियाँ और नियम व क़ानून बनाने, व्यवहार परिवर्तन, और बजट प्रावधान में बढ़ोत्तरी करने जैसे अवसर भी मुहैया कराता है.

महामारी की ताज़ा स्थिति

रविवार, 30 जनवरी को, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कोविड-19 को, अन्तरराष्ट्रीय चिन्ता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा घोषित किये हुए दो वर्ष हो गए. अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के अन्तर्गत, ये उच्चतम स्तर का ऐलर्ट होता है.

उस समय कोविड-19 के संक्रमण के 100 से भी कम मामले थे, और चीन के बाहर किसी मौत की कोई ख़बर नहीं थी.

दो वर्ष बाद, दुनिया भर में संक्रमण के 37 करोड़ मामले दर्ज किये गए हैं, और 56 लाख से ज़्यादा लोगों की मौतें भी हो चुकी हैं. संगठन का कहना है कि असल संख्या कहीं ज़्यादा होने की सम्भावना है.

लगभग 10 सप्ताह पहले ओमिक्रॉन वैरिएण्ट की शिनाख़्त होने के बाद से, संक्रमण के लगभग 9 करोड़ मामले दर्ज किये गए हैं जोकि पूरे वर्ष 2020 के दौरान दर्ज मामलों से भी ज़्यादा हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस ऐडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा कि कुछ देशों में ये मान्यता बनती देखी जा रही है कि वैक्सीन की मौजूदगी, और चूँकि ओमिक्रॉन की संक्रमण फैलाव क्षमता बहुत ज़्यादा है मगर उसकी गम्भीरता कम है, तो संक्रमण की रोकथाम अब सम्भव नहीं है और ज़रूरी भी नहीं बची है.

उन्होंने ध्यान दिलाया कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है, और यूएन स्वास्थ्य एजेंसी किसी भी देश से, तालाबन्दी में वापिस दाख़िल होने के लिये नहीं कह रही है, मगर सभी देशों को, केवल वैक्सीन से भी आगे बढ़कर, तमाम सम्भव उपायों और औज़ारों के ज़रिये, अपने लोगों की हिफ़ाज़त करना जारी रखना होगा.

उन्होंने दलील देते हुए कहा कि अभी किसी भी देश के लिये, समर्पण कर देना या फिर जीत घोषित कर देना जल्दबाज़ी होगी.