महामारी के दौरान, शान्ति प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी पर भीषण असर - बाशेलेट

18 जनवरी 2022

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) की प्रमुख मिशेल बाशेलेट ने कहा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान, महिला मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिये हालात बदतर हुए हैं, और शान्ति निर्माण प्रक्रियाओं में महिलाओं की पूर्ण भागीदारी की सम्भावनाओं को भी ठेस पहुँची है. 

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा कि वर्ष 1992 से 2019 के दौरान, केवल 13 प्रतिशत महिलाएँ वार्ताकार, छह प्रतिशत मध्यस्थ और महत्वपूर्ण शान्ति प्रक्रियाओं में छह प्रतिशत महिलाएँ ही हस्ताक्षकर्ताओं की भूमिका में रही हैं.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने मंगलवार को सुरक्षा परिषद में आयोजित एक चर्चा को सम्बोधित किया, जिसका विषय, शान्ति व सुरक्षा प्रक्रियाओं में महिलाओं को निशाना बनाकर की जाने वाली हिंसा से निपटने, और इन प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी को सुनिश्चित करना है.

बताया गया है कि समर्थन व सहायता के नज़रिये से, नाज़ुक हालात से गुज़र रहे और हिंसा प्रभावित देशों के लिये उपलब्ध धनराशि का केवल एक प्रतिशत ही महिला अधिकारों के लिये प्रयासरत संगठनों को मिल पाता है.

यूएन एजेंसी प्रमुख ने ध्यान दिलाया कि यह आँकड़ा, वैश्विक महामारी, गहन होते हिंसक टकरावों, अलोकतांत्रिक राजनैतिक संक्रमणकालीन प्रक्रियाओं और त्रासदीपूर्ण मानवीय संकटों के अनेक देशों में पैर पसारने से पहले का है.

उन्होंने क्षोभ ज़ाहिर करते हुए कहा कि अनेक देशों व समाजों में महिला अधिकार कमज़ोर हुए हैं. 

अधिकार हनन मामलों की निगरानी

वर्ष 2020 में, उच्चायुक्त कार्यालय ने हिंसा-प्रभावित सात देशों में 35 महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और ट्रेड यूनियन के सदस्यों के मारे जाने की पुष्टि की थी. 

यूएन एजेंसी के मुताबिक़, यह आँकड़ा वर्ष 2018 और 2019 में पुष्ट मामलों से कहीं अधिक है और वास्तविक मामलों की संख्या इससे कहीं अधिक होने की आशंका है.

OHCHR के अनुसार, लैंगिक समानता, यौन व प्रजनन स्वास्थ्य एवं अधिकार, भ्रष्टाचार, श्रम अधिकार और पर्यावरणीय व भूमि विवाद जैसे मुद्दों पर सक्रिय महिलाओं के विरुद्ध हमलों का रिकॉर्ड दर्ज किया गया है.

यूएन एजेंसी की शीर्ष अधिकारी ने बताया कि हर क्षेत्र में, महिलाओं को गिरफ़्तार किया गया है, उन्हें हिरासत में रखा गया है, और यौन हिंसा, बदनाम करने की कोशिशों के ज़रिये, उनका उत्पीड़न भी किया गया है. 

सरकारों और ग़ैर-सरकारी तत्वों द्वारा, संयुक्त राष्ट्र का सहयोग करने वाले लोगों को डराए-धमकाए जाने और बदले की भावना से कार्रवाई करने के मामले भी बड़ी संख्या में सामने आए हैं. 

इनमें वो देश शामिल हैं, जोकि सुरक्षा परिषद के शान्तिरक्षा एजेण्डा में हैं.  

सर्वाधिक प्रभावित देश

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने अफ़ग़ानिस्तान, अफ़्रीका के सहेल क्षेत्र, म्याँमार समेत अन्य स्थानों का उल्लेख करते हुए कहा कि महिला अधिकारों का उल्लंघन किये जाने से, हिंसक संघर्षों की रोकथाम करने और टिकाऊ शान्ति सुनिश्चित करने पर केन्द्रित वैश्विक प्रयास कमज़ोर हुए हैं.  

उन्होंने बताया कि अफ़ग़ानिस्तान में अभूतपूर्व स्तर पर मानवीय त्रासदी घटित हो रही है और महिलाओं व लड़कियों के बुनियादी अधिकारों को नकारे जाने से, अर्थव्यवस्था व देश को व्यापक क्षति पहुँची है.

हाल के महीनों में, लगातार धमकियाँ मिलने के बाद, अनेक अफ़ग़ान महिला मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों व न्यायधीशों को या तो जबरन देश छोड़ना पड़ा है, या फिर वे गुप्त स्थान पर छिप गए हैं.  

अनेक महिलाओं के लिये आय के सभी स्रोत ख़त्म हो गए हैं. महिलाओं को उनके जीवन पर असर डालने वाली निर्णय-निर्धारण प्रक्रियाओं से बाहर रखा जा रहा है, और अपने अधिकारों के पूर्ण इस्तेमाल से भी रोका गया है.

मिशेल बाशेलेट ने सुरक्षा परिषद से महिलाओं के अधिकारों के हनन के लिये ज़िम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय किये जाने का आग्रह किया है.

उन्होंने सुरक्षा परिषद से अपने प्रभुत्व का इस्तेमाल करने का भी आग्रह किया है ताकि तालेबान पर बुनियादी मानवाधिकारों का सम्मान किये जाने का दबाव डाला जा सके.

सहेल, म्याँमार...

मानवाधिकार मामलों की प्रमुख ने ध्यान दिलाया कि सहेल क्षेत्र में, यूएन विकास कार्यक्रम के लैंगिक समानता इण्डेक्स में, अनेक देश निचले पायदान पर हैं.

म्याँमार में युवजन, लोकतंत्र के समर्थन में हो रहे एक प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं.
Unsplash/Pyae Sone Htun
म्याँमार में युवजन, लोकतंत्र के समर्थन में हो रहे एक प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं.

उन्होंने एक ऐसे परिदृश्य का ज़िक्र किया, जिसमें हिंसक हथियारबन्द गुटों के हमलों के कारण महिलाओं व लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार होने, उन्हें अगवा किये जाने, हिंसा व शोषण का जोखिम बढ़ा है. 

उन्होंने बताया कि हाल के समय में एक मिशन के दौरान, जी5 सहेल साझा बलों के वरिष्ठ सदस्यों से बातचीत में, यह सुनना उत्साहजनक था कि एकीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है. 

ये साझा बल, क्षेत्र में तस्करी और आतंकवाद का अन्त करने के लिये सक्रिय प्रयास कर रहे हैं.

वहीं म्याँमार में, महिला मानवाधिकार कार्यकर्ता, लम्बे समय से शान्ति व समावेश के लिये एक ताक़त रही हैं.

मगर, फ़रवरी 2021 में देश में सैन्य तख़्तापलट के बाद से, अनेक नागरिक समाज समूहों को अपना कामकाज बन्द करने के लिये मजबूर होना पड़ा है. 

महिला चिकित्साकर्मियों, मीडियाकर्मियों, प्रदर्शनकारियों, सविनय अवज्ञा में हिस्सा लेने वाली, सोशल मीडिया पर सक्रिय और ज़रूरतमन्दों के लिये, भोजन व शरण का प्रबन्ध कर रही महिलाओं को निशाना बनाया गया है और उन्हें मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया है.

इसके विपरीत, उन्होंने कोलम्बिया में वर्ष 2016 में हुए शान्ति समझौते को, महिलाओं की भागीदारी और लैंगिक रूप से सम्वेदनशील उपायों के सन्दर्भ में, विश्व में एक बेहद अहम उपलब्धि क़रार दिया.

उन्होंने कहा कि इसके बावजूद, भूमि सुधार, राजनैतिक भागीदारी और सुरक्षा गारण्टी जैसे कुछ मुद्दों पर लैंगिक-विशिष्ट उपायों को मज़बूती प्रदान की जानी होगी.

उन्होंने कहा कि मौजूदा चुनौतियों की लहरों के बावजूद, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को आगे बढ़कर, महिला अधिकारों पर हमलों, उन्हें चुप करा दिये जाने का विरोध करना होगा.

साथ ही, निर्णय-निर्धारण प्रक्रियाओं में भागीदारी सुनिश्चित की जानी होगी और विरोध के स्वरों को भी मुखर होने देना होगा.

 

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