भारत: महिला सफ़ाई कर्मियों के लिये एक नई शुरुआत

भारत के पटना शहर में, ‘महिला मैकेनाइज्ड क्लीनिंग कोऑपरेटिव’ के सदस्य, उन मशीनी उपकरणों के साथ, जिनके द्वारा उन्हें सफ़ाई करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
©Diksha Foundation
भारत के पटना शहर में, ‘महिला मैकेनाइज्ड क्लीनिंग कोऑपरेटिव’ के सदस्य, उन मशीनी उपकरणों के साथ, जिनके द्वारा उन्हें सफ़ाई करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

भारत: महिला सफ़ाई कर्मियों के लिये एक नई शुरुआत

महिलाएं

भारत के पूर्वी प्रदेश बिहार के पटना शहर में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष - UNFPA की एक मुहिम के तहत, ऐसी महिला सफ़ाई कर्मचारियों को सशक्त बनाकर, मशीनी उपकरणों के ज़रिये सफ़ाई करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिन्हें हाथ से मैला सफ़ाई करनी पड़ती है. इससे उन्हें सामाजिक कलंक से छुटकारा मिलने के साथ-साथ, आर्थिक स्वतन्त्रता भी हासिल हो रही है. 

इस प्रशिक्षण से लाभान्वित होने वाली कुछ महिलाओं का कहना है, "जब हम अपनी वर्दी पहनते हैं, तो लोग हमें पहचानते हैं, और हमें गर्व की अनुभूति होती हैं. वो कहते हैं – देखो, इन महिलाओं ने क्या-कुछ हासिल किया है और वे जो काम कर रही हैं ... इन्होंने पुरुषों को भी पीछे छोड़ दिया है."

28 वर्षीया रानी देवी अपने पति, दो बच्चों और सास-ससुर के साथ, पटना शहर की एक झुग्गी बस्ती में रहती हैं.

पेशे से सफ़ाई कर्मचारी, रानी ने एक घरेलू सहायिका के रूप में भी काम किया, लेकिन उनकी दैनिक आय से मुश्किल से ही गुज़ारा हो पाता था. जब उन्हें मालूम हुआ कि महिलाओं द्वारा, महिलाओं के लिये बनाए गए ‘महिला मैकेनाइज़्ड क्लीनिंग कोऑपरेटिव’ में हाथों की बजाय, मशीनों और सुरक्षा उपकरणों के माध्यम से सफ़ाई का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, तो वह इसमें शामिल होने के लिये उत्सुक थीं.

UNFPA और पटना शहर के शासकीय निकाय की यह पहल, सार्वजनिक सीवर से हाथों से सफ़ाई करने की अपमानजनक और ख़तरनाक प्रथा को ख़त्म करने और योजना में कार्यरत महिलाओं को वित्तीय स्वतन्त्रता हासिल करने में मदद करने के लिये, अक्टूबर 2021 में शुरू की गई थी.

रानी की ही तरह, उनकी सहयोगी 28 वर्षीय इन्दु देवी अपने ससुराल वालों और तीन बच्चों के साथ इसी झुग्गी में रहती हैं. 2016 में अपने पति से अलग होने के बाद, वो घरेलू सहायिका के रूप में काम करके अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही थीं, तब उन्हें इस सहकारी संस्था के प्रशिक्षण के बारे में जानकारी मिली.
 
वो बताती हैं, “जब मैंने देखा कि पुरुषों को मैला ढोने और हाथ से सफ़ाई करने के लिये अन्दर जाकर काम करना पड़ता है, तो मेरी सबसे बड़ी चिन्ता यह थी कि मैं इस काम में कहीं अपनी जान ना गँवा बैठूँ. लेकिन अब मशीनीकृत कार्यक्रम से महिलाएँ भी यह काम कर सकती हैं, हम इसे ज़्यादा अच्छी तरह कर सकते हैं और ख़ुद अपनी आय कमा सकते हैं.”

इस पहल का उद्देश्य है - सफ़ाई कर्मचारियों और उनके परिवारों को विकट परिस्थितियों से बाहर निकालना और उन्हें सम्मानजनक, सुरक्षित कामकाज के ज़रिये सशक्त बनाना.

इस कार्यक्रम के तहत, सफ़ाई काम में कार्यरत महिलाओं को शहर के सीवर और सैप्टिक टैंक साफ़ करने के लिये, विशेष मशीनें संचालित करने और चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे वो अपने जीवन को ख़तरे में डाले बिना, जीवन यापन कर सकें. 

मैला ढोने का कलंक

भारत के पटना शहर में, महिला सफ़ाई कर्मचारी, नई मशीनीकृत प्रणाली का उपयोग करके एक सीवर को सुरक्षित तरीक़े से साफ़ कर रही हैं.
©Diksha Foundation
भारत के पटना शहर में, महिला सफ़ाई कर्मचारी, नई मशीनीकृत प्रणाली का उपयोग करके एक सीवर को सुरक्षित तरीक़े से साफ़ कर रही हैं.

भारत में हालाँकि हाथ से ‘मैनुअल स्कैवेन्जर्स और पुनर्वास अधिनियम’ (Manual Scavengers and their Rehabilitation Act) के तहत, 2013 से हाथ से मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबन्ध है, लेकिन वास्तविकता में यह प्रथा अब भी जारी है और हाथ से मैला ढोने वाले ज़्यादातर लोग, देश के सबसे ग़रीब और वंचित समुदायों से हैं.
 
हाथ से मैला ढोने वाले पुरुषों और महिलाओं के लिये यह कार्य न केवल बहुत मेहनत भरा व भेदभावपूर्ण है, बल्कि उनके परिवारों को इसके लिये सामाजिक कलंक का भी सामना करना पड़ता है.

मैला ढोने का काम आमतौर पर केवल दलित समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है, जो पहले से ही भारत की पारम्परिक जाति व्यवस्था में सबसे ग़रीब और वंचित तबका रहा है.

सफ़ाईकर्मी समुदाय का सदस्य होने का सबसे अधिक असर महिलाओं पर पड़ता है: सामाजिक रूप से हाशिये पर धकेले जाने के अलावा, उनके लिये अपने परिवारों के भीतर और बाहर, दोनों स्थानों पर लिंग आधारित हिंसा का ख़तरा बढ़ जाता है.

जिन झुग्गियों में वो रहती हैं, वहाँ मादक द्रव्यों (शराब आदि) के सेवन, स्वच्छ पानी या स्वच्छता की कमी, और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक दुर्लभ पहुँच के कारण, हालात असुरक्षित होते हैं, जिससे अक्सर महिलाएँ और लड़कियाँ हमलों, बीमारी और अनचाहे गर्भधारण की चपेट में आ जाती हैं.

मैला ढोने से अर्जित आय से मुश्किल से दिन में दो बार के भोजन का प्रबन्ध हो पाता है, इसलिये परिवारों को भुखमरी और कुपोषण का जोखिम रहता है. साथ ही, सफ़ाई कर्मचारियों के बच्चों को भी अक्सर स्कूल में दाख़िला मिलना मुश्किल होता है, जिससे लड़कियों का बाल विवाह की चपेट में आकर विकास क्षमता कुन्द होने का जोखिम रहता है.

बिहार में, 40 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में हो जाती है, और इनमें भी पहले से ही दलितों का प्रजनन रिकॉर्ड, प्रति परिवार 3 बच्चों की उच्च दर का है.

यूएन जनसंख्या एजेंसी, इन कमज़ोरियों से निपटने के लिये लिंग आधारित और घरेलू हिंसा, बाल विवाह व यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की कमी समेत, महिलाओं व लड़कियों के सम्भावित ख़तरों पर क्षमता निर्माण और जागरूकता बढ़ाने वाले सत्र भी आयोजित करता है.

विशेष रूप से, कम सुविधा वाली बस्तियों और समुदायों में अत्यधिक लैंगिक असमानताओं के कारण, अक्सर महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य की उपेक्षा की जाती है. साथ ही, कम उम्र में शादी और गर्भधारण से, विशेष रूप से 24 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं में मातृ मृत्यु दर अधिक है. 

लैंगिक असमानताओं का अर्थ है, विषम प्रगति

एक मध्यम आय वाले देश, भारत में पिछले कुछ दशकों में स्वास्थ्य और शिक्षा में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है, लेकिन भारी असमानताएँ अब भी मौजूद हैं, जो जीवन को ख़तरे में डाल रही हैं, और महिलाओं और लड़कियों की अपनी व्यक्तिगत, सामाजिक एवं आर्थिक क्षमता के विकास के रास्ते में बाधा खड़ी कर रही हैं.
 
देश में लगभग एक चौथाई लड़कियाँ बाल वधू हैं, जो चौंकाने वाले आँकड़े तो हैं, लेकिन फिर भी इसमें पिछले एक दशक में, लगभग दो में से एक की संख्या का सुधार हुआ है. अनुमानों के मुताबिक़, भारत में औसतन, 15-49 वर्ष की आयु की 30 प्रतिशत महिलाओं ने शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव किया था, और समान आयु वर्ग की एक-तिहाई विवाहित महिलाओं ने, कभी अंतरंग साथी द्वारा हिंसा का अनुभव किया था. बिहार में यह आँकड़ा 40 फीसदी तक है.

 2020 में, भारत में UNFPA की यौन व प्रजनन स्वास्थ्य एवं लिंग आधारित हिंसा सेवाओं और कोविड-19 जागरूकता बढ़ाने वाली गतिविधियाँ, 3 करोड़ 10 लाख से अधिक लोगों तक पहुँची थीं.

गर्भवती महिलाओं, बुज़ुर्गों और स्वच्छता कार्यकर्ताओं सहित विभिन्न कमज़ोर समूहों के 10 लाख से अधिक लोगों को इन सेवाओं के ज़रिये साथ सहायता प्रदान की गई. और उन्हें स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों से जोड़ा गया, जिससे उन्हें अपनी स्वतन्त्रता, परिवारों और उनके भविष्य की रक्षा के अपने अधिकार को पुनः प्राप्त करने में मदद मिली.

इसके अलावा, लगभग 50 लाख लड़कियों का, जल्दी, जबरन और बाल्यावस्था में विवाह होने से रोकने में भी यूएन एजेंसी सक्रिय रही है.

रानी का कहना है कि शुरू में लोगों ने उनका साथ नहीं दिया और गली के सीवरों की सफ़ाई को लेकर ताने मारे. लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी. अपनी कड़ी मेहनत से उन्होंने जो आर्थिक और सामाजिक पूँजी अर्जित की है, उससे अब उन्हें अपने बच्चों को स्कूल भेजने में मदद मिलेगी. वही लोग जो पहले उन्हें हतोत्साहित करते थे, अब उनके दृढ़ संकल्प का सम्मान करने लगे हैं - कुछ तो यह सलाह भी लेते हैं कि वो इस परियोजना का हिस्सा कैसे बन सकते हैं.

एक सफ़ाई कर्मी ने यूएन एजेंसी को बताया, "मशीनों के साथ यह काम करने में सक्षम होने के कारण, मेरे लिये अब जीविकोपार्जन कर पाना सम्भव है. मेरे बच्चे अब आगे पढ़ सकेंगे और उनका भविष्य उज्जवल होगा."