अफ़ग़ानिस्तान: महिलाओं व लड़कियों को 'अदृश्य' बनाने वाले क़दमों की आलोचना

अफ़ग़ानिस्तान में यूनीसेफ़-समर्थित मिर्ज़ा मोहम्मद ख़ान क्लीनिक में महिलाएँ.
© UNICEF/Alessio Romenzi
अफ़ग़ानिस्तान में यूनीसेफ़-समर्थित मिर्ज़ा मोहम्मद ख़ान क्लीनिक में महिलाएँ.

अफ़ग़ानिस्तान: महिलाओं व लड़कियों को 'अदृश्य' बनाने वाले क़दमों की आलोचना

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के एक समूह ने आगाह किया है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान नेतृत्व, महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध व्यापक पैमाने पर व्यवस्थागत ढंग से लिंग-आधारित भेदभाव व हिंसा को संस्थागत रूप दे रहे हैं.

यूएन के विशेष रैपोर्टेयर के समूह ने एक वक्तव्य जारी करते हुए सचेत किया है कि महिलाओं की रोज़गार पर वापसी को रोका गया है, सार्वजनिक स्थलों पर किसी पुरुष सगे-सम्बन्धी के साथ ही जाने के लिये कहा गया है, सार्वजनिक परिवहन साधनों में अकेले यात्रा पर रोक के अलावा, महिलाओं व लड़कियों के लिये विशिष्ट पोशाक थोपी जा रही है.

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा कि, “ये नीतियाँ एक साथ मिलकर, महिलाओं और लड़कियों के लिये एक सामूहिक दण्ड हैं, जिनके मूल में लिंग-आधारित पूर्वाग्रह और नुक़सानदेह प्रथाएँ हैं.”

Tweet URL

इन नीतियों की वजह से महिलाओं के कामकाज करने और अपना गुज़ारा चलाने की क्षमता पर असर पड़ा है, और जिससे वे और भी ज़्यादा निर्धनता के गर्त में धँस गई हैं.

यूएन विशेषज्ञों ने कहा, “परिवारों की महिला मुखियाओं पर विशेष रूप से असर पड़ा है. देश भर में मानवीय संकट के विनाशकारी दुष्प्रभावों से उनकी पीड़ा और भी बढ़ गई है.”

उन्होंने आगाह किया कि मौजूदा हालात में महिलाओं व लड़कियों के शोषण का जोखिम बढ़ा है, और यौन शोषण, जबरन मज़दूरी और बाल व जबरन विवाह कराए जाने के लिये उनकी तस्करी का भी ख़तरा है.

शिक्षा में अवरोध

अगस्त 2022 में तालेबान ने काबुल में दाख़िल होते हुए, अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था. 

इसके बाद से महिलाओं व लड़कियों के लिये माध्यमिक व तृतीयक स्तर की शिक्षा के अधिकार को नकारा गया है.

तालेबान ने महिला और पुरुष छात्रों को एक दूसरे से अलग रखे जाने की पैरवी की है और महिला छात्रों को विशिष्ट पोशाक पहनने पर बल दिया है.

इसके परिणामस्वरूप, लड़कियों के अधिकतर माध्यमिक स्कूल बन्द ही रहे हैं. 7वीं से 12वीं कक्षा की अधिकतर छात्राएँ, स्कूल नहीं जा पा रही हैं.

यूएन विशेषज्ञों ने महिलाओं व लड़कियों को सार्वजनिक जीवन से अदृश्य बनाए जाने की कोशिशों की आलोचना की है. 

साथ ही, महिला मामलों के मंत्रालय को बन्द किये जाने और अफ़ग़ान मानवाधिकार आयोग को नियंत्रण में लिये जाने पर क्षोभ व्यक्त किया गया है.

बताया गया है कि लिंग-आधारित हिंसा के पीड़ितों तक सेवाएँ प्रदान करने वाले अनेक लोगों ने, बदले की कार्रवाई के भय से अपना काम रोक दिया है. 

उन विशेषीकृत अदालतों व अभियोजन इकाइयों, जिन पर वर्ष 2009 में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के उन्मूलन पर पारित क़ानून का दायित्व था, उन समेत अनेक महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं व कर्मचारियों को कामकाज से रोका जा रहा है.

जोखिमों के दायरे में समुदाय

विशेषज्ञों ने महिला मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज कार्यकर्ताओं व नेताओं, न्यायाधीशों, अभियोजकों, सुरक्षा बलों, पूर्व सरकारी कर्मचारियों व पत्रकारों के लिये परिस्थितियों पर विशेष रूप से चिन्ता व्यक्त की है.

उनका कहना है कि इन सभी महिलाओं को उत्पीड़न, हिंसा की धमकियों और वास्तव में शारीरिक नुक़सान पहुँचाए जाने का सामना करना पड़ रहा है और उनके लिये नागरिक समाज में स्थान सिकुड़ा है.

इन हालात में बहुत सी महिलाओं को देश छोड़कर जाने के लिये मजबूर होना पड़ा है.

विशेष रैपोर्टेयर ने शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट और बुरा बर्ताव किये जाने, धमकियाँ दिये जाने पर क्षोभ व्यक्त किया है. अनेक मामलों में उन्हें मनमाने ढंग से हिरासत में ले लिया गया है. 

हज़ारा, ताजिक, हिन्दू समेत अन्य जातीय, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं के लिये, ये चिन्ताएँ और भी पैनी हुई हैं.

विशेषज्ञों के समूह ने न्यायेतर हत्याओं और जातीय व धार्मिक अल्पसंख्यकों के विस्थापन के मामलों पर गहरी चिन्ता जताई है.

इनमें हज़ारा भी हैं, जिन्हें निशाना बनाए जाने, पाबन्दी लगाने और देश से बाहर निकालने का प्रयास किया जा रहा है.

यूएन विशेषज्ञों ने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से मानवीय राहत अभियान का दायरा व स्तर, तत्काल बढ़ाने और मानवाधिकार हनन के मामलों के लिये, तालेबान प्रशासन से दोषियों की जवाबदेही तय किये जाने पर बल दिया है.

मानवाधिकार विशेषज्ञ

इस वक्तव्य को जारी करने वाले मानवाधिकार विशेषज्ञों की सूची यहाँ देखी जा सकती है. 

सभी स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ, जिनीवा में यूएन मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त किये जाते हैं, और वो अपनी निजी हैसियत में, स्वैच्छिक आधार पर काम करते हैं. ये मानवाधिकार विशेषज्ञ, संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और ना ही उन्हें उनके काम के लिये, संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन मिलता है.