मुनाफ़ा कमाने की दौड़ से मानवाधिकारों के लिये ख़तरा

20 अक्टूबर 2021

संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने चेतावनी भरे शब्दों में कहा है कि दुनिया भर में, निवेशकों की ज़रूरतें पूर करने या उन्हें सन्तुष्ट करने की ख़ातिर, वित्तीय क्षेत्र की धन सम्पदा के नए स्रोतों की बढ़ती मांग के कारण, मानवाधिकारों पर गम्भीर नकारात्मक असर हो रहा है.

इन विशेषज्ञों के अनुसार, वित्तीय बाज़ारों में धन निवेश प्रबन्धन का काम करने वाले कोष (Hedge Funds) व अन्य निवेश कम्पनियों द्वारा वित्तीय बाज़ारों में बढ़ते सट्टे और क़यासबाज़ियों के कारण, जो मानवाधिकार जोखिम के दायरे में आ रहे हैं, उनमें पीने के लिये स्वच्छ पानी और स्वच्छता का अधिकार, भोजन, पर्याप्त आवास, विकास, और स्वस्थ व टिकाऊ पर्यावरण के साथ-साथ अन्य अधिकार भी शामिल हैं.

हाशिये पर रहने वालों का शोषण

संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र विशेष रैपोर्टेयर और अन्य विशेषज्ञों ने एक वक्तव्य में, अर्थव्यवस्था के नए क्षेत्रों में, वित्तीय क़यासबाज़ी और सट्टे की बढ़ती आक्रामक दख़लअन्दाज़ी पर चिन्ता व्यक्त की है, जिसके कारण मानवाधिकारों के लिये जोखिम उत्पन्न हो रहा है.

उन्होंने विशेष रूप में ऐसे क्षेत्रों में व्यापार की ओर ध्यान दिलाया जो हाशिये पर रह रहे लोगों, आदिवासियों, अफ़्रीकी मूल के लोगों और कृषक समुदायों द्वारा मानवाधिकारों का आनन्द उठाने के लिये महत्वपूर्ण हैं.

इन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाते हुए ये भी कहा कि 1980 से नई वित्तीय सेवाओं द्वारा प्रबन्धित नए वित्तीय उपकरणों व तरीक़ों की बढ़त यानि तथाकथित वित्तीयकरण बढ़ने के कारण, महिलाओं और लड़कियों के भी, अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की सामर्थ्य पर ग़ैर-आनुपातिक असर पड़ा है.

महिलाओं व लड़कियों के साथ व्यवस्थागत तरीक़े से भेदभाव किया जाता है. वृद्धजन पर भी इसके असर को रेखांकित किया गया है.

आवास पर प्रभाव

पर्याप्त आवास पर पूर्व विशेष रैपोर्टेयर के अनुसार, हाल के वर्षों में, वैश्विक धन सम्पदा का बहुत विशाल हिस्सा, आवास क्षेत्र में एक वित्तीय दस्तावेज़ के रूप में निवेश किया गया है, यानि वैश्विक बाज़ारों में चलने वाले उपकरणों की ज़मानत के रूप में, और ज़्यादा से ज़्यादा धन सम्पदा जुटाने के एक साधन के रूप में.

मगर, जब वर्ष 2008 में, वैश्विक आर्थिक संकट आया तो, बहुत से मकानों और आवासीय इमारतों का मूल्य बहुत तेज़ी से गिर गया, और बहुत से लोग व परिवार, रातों-रात बेघर हो गए थे.

पर्याप्त आवास पर विशेष रैपोर्टेयर ने ध्यान दिलाया कि वैश्विक दक्षिण क्षेत्र में, दक्षिणी शहरों में, अनौपचारिक बस्तियों को अक्सर, उनके स्थानों पर चमक-दमक वाली आवासीय इमारतें बनाने के लिये ध्वस्त किया जाता है. ऐसा, व्यावसायिक लाभ हासिल करने और आबादी के सर्वाधिक धनी वर्गों को फ़ायदा पहुँचाने के इरादे से किया जाता है.

सम्पदा के वित्तीयकरण की यह प्रक्रिया, कोविड-19 महामारी के दौरान और ज़्यादा मज़बूत हुई है.

सट्टेबाज़ी वाला खाद्य बुलबुला

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने बताया है कि वैश्विक वित्तीय संकटों के लिये ज़िम्मेदार विशाल अन्तरराष्ट्रीय बैंकों ने, खाद्य भविष्य में किस तरह, अरबों डॉलर की राशि, कृषि बाज़ारों में निवेश की है. इससे कुछ ही महीनों के दौरान, गेहूँ, मक्का और सोयाबीन जैसे कच्चे माल की क़ीमतों में उछाल आकर वो दोगुनी और तीन-गुनी हो गई हैं और ऐसा किया जाने से, एक नया सट्टेबाज़ी वाला खाद्य बुलबुला उत्पन्न हो गया है.

विश्व बैंक के अनुसार, मुख्य रूप से, निम्न आय वाले देशों में, 13 करोड़ से 15 करोड़ के बीच और ज़्यादा लोग, गम्भीर निर्धनता और भुखमरी के गर्त में धकेल दिये गए हैं. ये ऐसे देश हैं जो अपनी आबादियों की खाद्य ज़रूरतें पूरी करने के लिये अन्य देशों से खाद्य सामग्री के आयात पर निर्भर हैं.

इन विशेषज्ञों ने ये भी ध्यान दिलाया है कि आवास व खाद्य का वित्तीयकरण किये जाने से, विषमताएँ और बहिष्करण किस तरह और ज़्यादा गम्भीर हुए हैं. ऐसा किये जाने से, पहले से ही क़र्ज़ में दबे परिवारों व घरों और कम आय वाले परिवारों पर बहुत ज़्यादा असर पड़ा है.

इन क्षेत्रों में सट्टेबाज़ी और क़यासबाज़ी का तर्क लागू करने से, निर्धनता में रहने वाले लोगों के मानवाधिकारों का हनन होता है, लैंगिक विषमता बढ़ती है और हाशिये पर रहने वाले समुदायों के पहले से ही कमज़ोर हालात और ज़्यादा नाज़ुक होते हैं.

प्रकृति का उपभोक्ताकरण

विशेषज्ञों ने, पर्यावरणीय सेवाओं का और ज़्यादा वित्तीयकरण किये जाने और उन्हें उपभोग की वस्तु समझे जाने की ओर भी ध्यान दिलाया है.

उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि ऐसा किये जाने से पारिस्थितिकी प्रणालियों की स्थिरता के लिये ख़तरा उत्पन्न होता है, प्राकृतिक और सांस्कृतिक मूल्यों की अहमियत कम होती है, जिनका कोई ज़ाहिर आर्थिक मूल्य नहीं है. इससे आदिवासी लोगों और स्थानीय समुदायों के क्षेत्रों पर उनका ख़ुद का नियंत्रण कमज़ोर होता है.

उन्होंने कहा कि प्रकृति को प्रदूषित करने और उसका विनाश करने का अधिकार, धीरे-धीरे पहचान पकड़ता जा रहा है और उसका व्यावसायीकरण हो रहा है.

उन्होंने कहा कि आवास, भोजन और पर्यावरण को वित्तीय कारोबार करने वाली कम्पनियों द्वारा, वित्तीय कारोबार के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किये जाने से, लोगों के मानवाधिकार इस्तेमाल किये जाने की सामर्थ्य पर सीधा असर पड़ता है. इनमें आवास, भोजन, स्वस्थ पर्यावरण से लेकर पीने का पानी और स्वच्छता के अधिकार तक शामिल हैं.

मानवाधिकार विशेषज्ञ

इस वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने वाले मानवाधिकार विशेषज्ञों की सूची यहाँ देखी जा सकती है.

सभी स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ, यूएन मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त किये जाते हैं, और वो अपनी निजी हैसियत में, स्वैच्छिक आधार पर काम करते हैं. ये मानवाधिकार विशेषज्ञ संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और ना ही उन्हें उनके काम के लिये, संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन मिलता है.

 

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