टिड्डियों से लेकर चक्रवातों तक: आपस में जुड़ी आपदाओं की मानवीय क़ीमत

9 सितम्बर 2021

चरम पर्यावरणीय घटनाओं का लोगों के जीवन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है, और संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ है कि उनमें से अनेक घटनाओं के अन्तर्निहित कारण समान और आपस में जुड़े हुए हैं.  इस रिपोर्ट के परिपेक्ष्य में, एक केनयाई किसान पर टिड्डियों के झुण्ड के प्रभाव का अवलोकन किया गया, और एक भारतीय कामगार पर चक्रवात अम्फ़ान का जायज़ा लिया.

2020 के वसन्त में अफ़्रीका पर हमला करने वाला टिड्डियों का विशाल झुण्ड, और उसी वर्ष मई में भारत और बांग्लादेश के सीमा क्षेत्र से टकराने वाला चक्रवाती तूफ़ान अम्फान, हो सकता है कि आपस में जुड़े हुए ना लगें.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र की अकादमिक और अनुसन्धान शाखा – यूएन विश्वविद्यालय द्वारा बुधवार को जारी रिपोर्ट से मालूम होता है कि इसके अन्तर्निहित कारण जुड़े हुए थे: मानव गतिविधि से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जो अप्रत्याशित तरीक़े से पर्यावरण को प्रभावित कर रहे हैं, और पर्याप्त आपदा जोखिम प्रबन्धन की कमी.

दोनों आपदाएँ 2020 में हुईं, जिस दौरान दुनिया कोविड-19 महामारी की चपेट में थी, जिसका मतलब था कि दोनों आपदाओं की जवाबी कार्रवाई की प्रभावशीलता कम हो गई थी, जिसमें मानवीय सहायता कार्यकर्ताओं और पीड़ितों, दोनों की आवाजाही प्रतिबन्धित थी, जिससे उन्होंने ख़ुद को आर्थिक रूप से अधिक कमज़ोर महसूस किया.  

इन परिस्थितियों से सीधे तौर पर प्रभावित दो लोगों ने, संयुक्त राष्ट्र के साथ आपबीती और अनुभव साझा किये हैं: केनया के न्यान्दरुआ काउण्टी की एक किसान सुसान मुम्बी करंजा और भारतीय शहर कोलकाता में स्टेशनरी बेचने वाले सुधांशु शेखर मैती.

टिड्डियों के भयावह झुण्ड का क़हर

“मेरा नाम सुसान मुंबी करंजा है. मैं न्यान्दरुआ काउण्टी के करीमा नामक गाँव में रहती हूँ. मैं एक किसान हूँ और मेरे छह बच्चे हैं.

मार्च 2020 में जब टिड्डियाँ आईं तो हमने उन्हें पहाड़ियों से आते देखा. वो बहुत सारे थे. उन्होंने खाद्य पदार्थों पर हमला किया: गोभी, गाजर, आलू, उन सभी पर जो खेत में था. जब वो आए तो सूरज छिप गया. अंधेरा सा हो गया. काम पर जाना भी सम्भव नहीं  था, गाएँ खाना भी नहीं खा सकती थीं.

हमने टीवी पर, टिड्डियों के ऐसे झुण्डों के बारे में सुना था, लेकिन हमने नहीं सोचा था कि यह कभी हम तक पहुँचेगा. जब टिड्डियों के दल ने हमला किया तो सरकार ने लोग यहाँ भेजे और उन्होंने टिड्डियों पर रसायन का छिड़काव किया, यहाँ तक कि खाद्य पदार्थों के ऊपर भी.

हमने देखा कि जब रसायनों का छिड़काव किया गया तो कुछ टिड्डियाँ मर गईं और अन्य बस सो गईं, मानो, सूरज निकलने का इन्तज़ार करने लगीं. उन्होंने अधिकतर खाद्य पदार्थ खा लिये- यहाँ तक कि  रसायनों द्वारा नष्ट हुआ भोजन भी.

जब झुण्ड चला गया तो न खाने के लिये कुछ बचा था, न ही बेचने के लिये. गायों ने दूध नहीं दिया क्योंकि उन्होंने कुछ खाया नहीं था: टिड्डियाँ हर जगह थीं, यहाँ तक कि घास में भी. हम टिड्डियों को भी नहीं खा सकते थे, क्योंकि उन पर केमिकल का छिड़काव किया गया था.

केवल यही किया जा सकता है कि सरकार यह पता लगाए कि टिड्डियाँ कहाँ से आ रही हैं, ताकि उन्हें रोका जा सके या जलाया जा सके. टिड्डियों के इस दल के हमले के दौरान, सरकार ने उनसे छुटकारा पाने के लिये एक हेलीकॉप्टर भी भेजा, लेकिन वो भी विफल रहा और वापस चला गया.

हम सोच रहे हैं कि हम क्या कर सकते हैं. टिड्डियों के ख़तरे की वजह से कोई योजना भी नहीं बनाई जा सकती; केवल सरकार ही मदद कर सकती है.”

'यह एक बमबारी की तरह था':  अम्फ़ान तूफ़ान पीड़ित 

“मैं सुधांशु शेखर मैती हूँ, और मैं पश्चिम बंगाल के रामगंगा गाँव से हूँ.
कोविड-19 महामारी और उसके बाद के लॉकडाउन उपायों के कारण, मुझे मार्च 2020 में कोलकाता में अपनी नौकरी छोड़कर गाँव लौटना पड़ा, जहाँ मैं छह महीने तक रहा.

विभिन्न मीडिया से आई ख़बरों के आधार पर वायरस फैलने को लेकर दहशत का माहौल था और हम बाहर क़दम रखने में डरते थे.

ज़ाहिर है कि मुझे बड़े वित्तीय संकट का सामना भी करना पड़ा है. अगर हम दिन-ब-दिन घर पर रहते हैं और काम पर नहीं जा सकते हैं, तो आमदनी कैसे होगी?

चक्रवाती तूफ़ान अम्फ़ान के दौरान, हम अपने घर से समुद्र को स्पष्ट रूप से देख सकते थे - 20-25 फुट लहरों के साथ सीमाओं से टकराने वाला पानी भीषण था. जैसे ही चक्रवाती तूफ़ान क़रीब आने लगा, हम खिड़कियों से टकराने वाली तेज़ हवा का भयावह शोर सुन सकते थे. यह एक बमबारी की तरह  था. नदी उफनने लगी और पानी गाँव में घुसने लगा.

लोग ख़ुद को बचाने के लिये अपने पशुओं को साथ लेकर भागने लगे. अधिकांश लोगों ने होटलों में शरण ली.

मई 2020 में भारत और बांग्लादेश के सीमावर्ती क्षेत्र में आए चक्रवाती तूफ़ान अम्फान के कारण व्यापक विनाश हुआ.
जब चक्रवात गुज़रा, तो मैं अपने घर से बाहर निकला और मुझे चारों तरफ़ केवल पानी ही पानी दिखाई दे रहा था: अधिकाश घर पानी में डूबे थे, और मिट्टी से बने घर बिखर गए थे.

तालाब, गाँव के क्षेत्रों में पानी का सबसे विश्वसनीय स्रोत हैं, हम इन तालाबों में मछली पालन करते हैं जो हमारे वार्षिक उपभोग के लिये पर्याप्त है. बाढ़ के कारण, तालाब खारे पानी से भर गए, और सभी मछलियाँ मर गईं.

चक्रवात और बाढ़ के कारण सभी फ़सलें नष्ट हो गईं. चक्रवात के कारण पान के पत्तों की खेती करने वाले किसानों को सबसे भयानक समय का सामना करना पड़ा: वे अपने घरों की पकी मिट्टी की छतों पर खेती करते थे, और ये सभी नष्ट हो गए थे.

चक्रवात के ठीक बाद, सबसे पहले मैंने भोजन और पीने के पानी का इन्ताज़ाम करने के बारे में सोचा. और सोचा कि अब हम अपना जीवन कैसे जियेंगे? हमारे सारे तालाब और ज़मीनें तो नष्ट हो गईं थीं.

कोई सब्ज़ी और किराने का सामान उपलब्ध नहीं था, कोई इण्टरनेट कनेक्टिविटी नहीं, बिजली नहीं, सभी सड़कें अवरुद्ध थीं और निकटतम स्वास्थ्य देखभाल केंन्द्रों तक कोई पहुँच नहीं थी. पीने के पानी की कमी के कारण, हमें कुएँ का पानी लेने के लिये लम्बी क़तार में खड़ा होना पड़ा: लगभग 50-60 परिवारों के लिये एक कुआँ था.

हमने बहुत ही कठिन समय का सामना किया है और मेरी बचत की रक़म भी तालाबन्दी के दौरान खर्च़ हो गई है. मैं अब भी स्थिति से उबरने की कोशिश कर रहा हूँ. हमारे गाँव में क़रीब 12 हज़ार परिवार रहते हैं और उनमें से ज़्यादातर ने चक्रवात का दंश झेला है.

 

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