उत्तरी आयरलैण्ड: मानवाधिकार हनन मामलों में ‘प्रस्तावित दण्डमुक्ति चिन्ताजनक’

11 अगस्त 2021

संयुक्त राष्ट्र के दो स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने ब्रिटेन की उस योजना पर गम्भीर चिन्ता जताई है, जिसमें उत्तरी आयरलैण्ड में 30 वर्षों तक चले हिंसक संघर्ष के दौरान, घटित मानवाधिकार हनन के गम्भीर मामलों पर अभियोजन कार्रवाई समाप्त करने की बात कही गई है.

उत्तरी आयरलैण्ड में तीन दशकों तक चले हिंसक संघर्ष व टकराव को, मुसीबत के दौर को "the Troubles" के तौर पर भी जाना जाता है.

उत्तरी आयरलैण्ड के लिये ब्रिटेन के मंत्री ब्रैण्डन लुईस ने जुलाई में इस योजना की घोषणा की थी.

इसके तहत हिंसक संघर्ष व टकराव से सम्बन्धित सभी मुक़दमों पर रोक लगाए जाने की योजना है.

यूएन के मानवाधिकर विशेषज्ञों का कहना है कि यह घोषणा वस्तुत: आम माफ़ी दिये जाने और इस अवधि के दौरान मानवाधिकार हनन के गम्भीर मामलों में, पूर्ण दण्डमुक्ति दिये जाने के समान है.

यूएन विशेषज्ञों ने मंगलवार को एक बयान जारी करके कहा, "हम गहरी चिन्ता व्यक्त करते हैं कि जुलाई में पेश योजना, मुसीबत भरे समय के दौरान किये गए गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघनों के लिये न्याय व जवाबदेही के प्रयासों को रोकती है..."

उन्होंने कहा कि इससे पीड़ितों का सत्य जानने का अधिकार भी प्रभावित होता है और उन्हें हुई हानि के कष्ट निवारण के कारगर समाधान भी प्रभावित होते हैं.

यूएन विशेषज्ञों के मुताबिक़, ब्रिटेन की यह योजना, उसके अन्तरराष्ट्रीय दायित्वों का खुला उल्लंघन होगी.

उन्होंने ध्यान दिलाते हुए कहा कि ब्रिटेन के मंत्री ने इस क़दम को यह कहते हुए सही ठहराया है कि आपराधिक न्याय से सच्चाई, जानकारी पुनर्बहाली और आपसी मेलमिलाप में अवरोध खड़े हो सकते हैं.

विशेष रैपोर्टेयरों ने चिन्ता जताई कि यह तर्क आपसी मेलमिलाप और दण्डमुक्ति को एक समान मानने की ग़लती करता है – आपराधिक न्याय संक्रमणकालीन न्याय प्रक्रियाओं का एक अति आवश्यक स्तम्भ बताया गया है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सत्य, न्याय, मुआवज़ा, स्मृतियों को सहेजा जाना और फिर ऐसा ना होने देने की गारण्टी, संक्रमणकालीन न्याय प्रक्रिया के अहम घटक हैं.

इनमें, अपने मन मुताबिक़ केवल कुछ को चुना और अन्य को नहीं छोड़ा जा सकता और ना ही उनकी अदला-बदली की जा सकती है.

'मुसीबत का दौर'

उत्तरी आयरलैण्ड में यह टकराव 1960 के दशक के अन्तिम वर्षों में शुरू हुआ – इसमें साढ़े तीन हज़ार लोगों की मौत हुई और 40 हज़ार से ज़्यादा लोग घायल हुए थे.

ब्रिटिश सेना और स्वयंभू आयरिश रिपब्लिकन आर्मी, व कैथलिक-प्रोटेस्टेण्ट साम्प्रदायिक विभाजन रेखा के इर्द-गिर्द खड़े अन्य अर्धसैनिक गुटों के बीच वर्षों तक टकराव हुआ.

इस संघर्ष का अन्त, मोटे तौर पर, अप्रैल 1998 में गुड फ़्राइडे समझौते पर हस्ताक्षर के साथ हो गया था.

ब्रिटेन की सरकार के प्रस्ताव में एक नया स्वतंत्र निकाय स्थापित किये जाने की योजना है, जिसके माध्यम से लोगों को, हिंसक संघर्ष के दौरान हताहत हुए अपने प्रियजनों के बारे में सूचना मिल पाएगी.

साथ ही, इसके तहत एक मौखिक इतिहास कार्यक्रम शुरू किये जाने की योजना है.

मगर, यूएन विशेषज्ञों का कहना है कि प्रस्तावित योजना में मुसीबत भरे उस समय के दौरान, मानवाधिकार हनन के मामलों के बारे में पूर्ण रूप से सच्चाई सामने लाने के लिये उपायों की व्यवस्था नहीं है.

और ये भी स्पष्ट नहीं होगा कि किन हालात, कारणों और ज़िम्मेदारियों की वजह से ऐसी घटनाएँ हुईं.

विशेष रैपोर्टेयरों ने बताया कि इस प्रस्ताव में सच्चाई को सभी पीड़ितों व पूर्ण समाज के लिये सुलभ बनाया जाना भी प्रतीत नहीं होता. साथ ही ये भी स्पष्ट नहीं है कि सार्वजनिक क्षमा के प्रावधान के सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय मानकों का किस तरह अनुपालन होगा.   

स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतन्त्र संस्था है. ये दरअसल परिषद की स्वतन्त्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करती है. स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिये कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतन्त्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं.

 

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