भारत में कोविड-19 और महिलाएँ – कुछ अहम प्रश्नों के उत्तर 

29 जुलाई 2021

भारत में हाल के महीनों के दौरान, कोविड-19 महामारी के फैलाव की दूसरी लहर अपने साथ अभूतपूर्व बर्बादी लेकर आई है. महिलाओं और लड़कियों सहित, देश के निर्धनतम और निर्बलतम समुदायों को, आर्थिक चुनौतियों पर पार पाने और स्वास्थ्य संकट के दंश को कम करने में अपार मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. 

महिलाओं पर अपने परिजनों की देखभाल करने, आजीविका बनाए रखने, और महामारी के विरुद्ध लड़ाई में प्रयासों को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी थी, एक ऐसे समय में जब तीसरी लहर का ख़तरा भी मंडरा रहा हो.. 

महिला सशक्तिकरण के लिये प्रयासरत यूएन संस्था (UN Women) और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कोविड-19 स्वास्थ्य संकट और महिलाओं व लड़कियों पर हुए उसके असर के सिलसिले में अक्सर पूछे जाने वाले सवालों के जवाब दिये हैं.  

कोविड-19 से संक्रमित होने का ख़तरा, क्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ज़्यादा है?

भारत में कोरोनावायरस से, तीन करोड़ से अधिक लोग संक्रमित हुए हैं. कोविड-19 सभी उम्र के लोगों व लिंगों को संक्रमित कर सकता है. 

मगर, महिलाओं व लड़कियों के लिये जोखिम अधिक हो सकता है, चूँकि वे निर्धन होती हैं और उनके पास जानकारी व संसाधनों की कमी भी होती है. या फिर, वे अक्सर देखभाल और स्वास्थ्य व सेवा क्षेत्र में कामकाज से भी जुड़ी होती हैं.

भारत में महिलाएँ बड़ी संख्या में, स्वास्थ्य देखभालकर्मी के तौर पर कार्यरत हैं, और 80 फ़ीसदी से अधिक नर्सें व दाइयाँ महिलाएँ हैं. 

इसके बावजूद, जब स्वास्थ्य क्षेत्र में निर्णय-निर्धारण की आती है, तो वहाँ अक्सर उनकी उपस्थित नहीं होती, और पुरुष समकक्षों की तुलना में उनका वेतन भी कम होता है. 

राष्ट्रीय कोविड-19 टास्क फ़ोर्स में कुल सदस्यों में से महज़ 13 प्रतिशत ही महिलाएँ हैं. 

भारत में कुछ महिलाएँ, घर में बच्चों, बुज़र्गों और बीमार परिजनों की देखभाल में ज़्यादा समय बिताती हैं. मास्क और अन्य निजी बचाव सामग्री अक्सर पुरुषों की ज़रूरतों के अनुरूप तैयार की जाती है, इसलिये महिलाओं के लिये वायरस की चपेट में आने का ख़तरा ज़्यादा होता है. 

फ़िलहाल, एक चिन्ता ये भी है कि पुरुषों की तुलना में, भारत में कम संख्या में महिलाओं का टीकाकरण हो रहा है.

राष्ट्रीय आँकड़े दर्शाते हैं कि 17 फ़ीसदी अधिक पुरुषों का आंशिक या पूर्ण रूप से टीकाकरण किया गया है. महज़ दो राज्य ही ऐसे हैं जहाँ ख़ुराक पाने वाली महिलाओं की संख्या अधिक है. 

नई दिल्ली के बाटला हाउस इलाक़े में एक सामुदायिक केन्द्र में महिलाएँ व बच्चे.
UN Women/Ruhani Kaur
नई दिल्ली के बाटला हाउस इलाक़े में एक सामुदायिक केन्द्र में महिलाएँ व बच्चे.

इसके अलावा, महिलाओं की इण्टरनेट व स्मार्ट फ़ोन तक पहुँच अपेक्षाकृत रूप से कम है, इसलिये कुछ मामलों में उनके लिये टीकाकरण हेतु पंजीकरण करा पाना सरल नहीं है.  

समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक मानकों की वजह से, महिलाओं के लिये टीकाकरण केन्द्रों पर अकेले जाना मुश्किल हो सकता है. परिवारों में भी पहले पुरुष सदस्यों के टीकाकरण को प्राथमिकता दी जा सकती है. 

ऐसे मिथक भी हैं कि वैक्सीन से महिलाओँ की प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ता है. 

वैक्सीन की ख़ुराक ना पाने वाली महिलाओं के संक्रमित होने का जोखिम अधिक होता है, विशेष रूप से नए वैरिएंट के फैलाव की स्थिति में. 

कोविड-19 ने भारत में महिलाओं के लिये रोज़गार को किस तरह प्रभावित किया है?

वेतन विषमता और अवैतनिक देखभाल कार्य के बोझ की वजह से ज़्यादा संख्या में महिलाओं का रोज़गार ख़त्म हो गया है और वे निर्धनता की चपेट में हैं. 

वैश्विक महामारी से पहले भी भारत में महिलाओं की कमाई, पुरुषों की कमाई का महज़ 20 फ़ीसदी थी. वैश्विक स्तर पर और भारत में, महिलाओं ने कोविड-19 के दौरान ज़्यादा संख्या में रोज़गार खोए हैं. 

अज़ीम प्रेमजी युनिवर्सिटी में टिकाऊ रोज़गार केन्द्र (Center for Sustainable Employment) की एक नई रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2020 में भारत में पहली बार की गई तालाबन्दी के दौरान 47 फ़ीसदी महिलाओं का रोज़गार ख़त्म हो गया, जबकि पुरुषों के लिये यह आँकड़ा 7 फ़ीसदी है. 

फिर ये महिलाएँ साल के अन्त तक रोज़गार पर नहीं लौट पाईं. अनौपचारिक क्षेत्र में महिलाओं के लिये परिस्थितियाँ और भी ज़्यादा ख़राब हैं. 

मार्च और अप्रैल 2021 में, अनौपचारिक क्षेत्रों में रोज़गार ख़त्म हो जाने के कारण 80 फ़ीसदी ग्रामीण भारतीय महिलाएँ प्रभावित हुई हैं. 

भारतीय महिलाएँ अवैतनिक देखभाल कार्यों में पुरुषों की तुलना में अधिक समय व्यतीत करती हैं. औसतन, वे पुरुषों की तुलना में अवैतनिक घरेलू कामकाज में, पुरुषों की अपेक्षा 9.8 गुना अधिक समय बिताती हैं. 

इसके अलावा, बच्चों की देखभाल, बुज़ुर्गों और बीमारों की सुश्रुषा में वे औसतन 4.5 घण्टों का समय देती हैं. महामारी के दौरान, अवैतनिक देखभाल कार्य में उनका हिस्सा लगभग 30 फ़ीसदी बढ़ा है. 

महिलाओं और लड़कियों पर मौजूदा हालात में व्यापक सामाजिक-आर्थिक असर हुआ है. महिलाओं पर लक्षित नीतियों और निवेश के बग़ैर, इसके दुष्परिणाम लम्बे समय तक महसूस किये जा सकते हैं. 

यह भी ख़तरा है कि कार्यबल से महिलाओं का बाहर जाना, स्थाई रूप ले सकता है, जिससे ना सिर्फ़ लैंगिक समानता के क्षेत्र में हुई प्रगति को ठेस पहुँचेगी बल्कि जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) को भी.

यूएन महिला संस्था के आँकड़े दर्शाते हैं कि महामारी के दौरान लड़कों की तुलना में ज़्यादा लड़कियाँ, स्कूलों के दायरे से बाहर आ गईं.

भारत की राजधानी नई दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में एक मरीज़ को भर्ती किये जाते हुए.
© UNICEF/Amerjeet Singh
भारत की राजधानी नई दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में एक मरीज़ को भर्ती किये जाते हुए.

एक सर्वेक्षण में शामिल हुए 65 फ़ीसदी अभिभावक अपनी लड़कियों की शिक्षा जारी रखने के अनिच्छुक थे और ख़र्चे बचाने के लिये बाल विवाह के लिये मजबूर हो रहे थे.

इससे युवा महिलाओं की एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो सकती है, जो शिक्षा व रोज़गार के अवसरों से वंचित होगी. 

क्या कोविड-19 की वजह से भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा बढ़ी है?

कोविड-19 तालाबन्दियों ने महिलाओं को घरों पर उनके साथ दुर्व्यवहार करने वालों के साथ फँसा दिया, दुनिया भर में घरेलू हिंसा के मामलों में तेज़ उछाल आया.

भारत में महामारी के पहले कुछ महीनों में ही, घरेलू हिंसा, बाल विवाह, साइबर हिंसा और महिलाओं व लड़कियों की तस्करी के मामलों में वृद्धि हुई.

राष्ट्रीय महिला आयोग के आँकड़ों के मुताबिक़, फ़रवरी और मई 2020 के दौरान भारत में घरेलू हिंसा के ढाई गुना अधिक मामले दर्ज किये गए.

कुछ महिला संगठनों का कहना है कि तालाबन्दी के शुरुआती चार चरणों में, घरेलू हिंसा के जितने मामले सामने आए, उतने मामले पिछले 10 मामलों में नहीं देखे गए थे. 

अनेक महिलाएँ उनके साथ हुई हिंसा की शिकायत करा पाने में सक्षम नहीं थी, उनके पास निजता की कमी थी और मदद के साधनों की भी. 

भारत सरकार ने घरेलू हिंसा से बचने के लिये शरणस्थलों और समर्थन सेवाओं को अति आवश्यक श्रेणी में सम्मिल्लित किया है. कोविड-19 पर जवाबी कार्रवाई में ये एक अहम क़दम है. 

महामारी की पहली और दूसरी लहरों के दौरान, भारत में 700 वन-स्टॉप संकट केन्द्र ख़ुले रहे, जिनके ज़रिये तीन लाख से अधिक ऐसी महिलाओं को मदद उपलब्ध कराई गई, जो दुर्व्यवहार का शिकार हुई थीं और जिन्हें शरण, क़ानूनी मदद और चिकित्सा सुविधाओं की आवश्यकता थी. 

मानव-तस्करी विरोधी क़ानून जल्द ही संसद में पेश किया जाएगा, जोकि स्वागतयोग्य है. इसमें दोषियों के लिये दण्ड को बढ़ाने और ऐसी शिकायतों को दर्ज किया जाना अनिवार्य बनाये जाने पर ज़ोर दिया गया है.

जो कोविड-19 से उबर चुके हों, क्या उन्हें टीकाकरण नहीं कराना चाहिये? 

भारत में 19 जुलाई 2021 तक, देश की आबादी के 6.2 फ़ीसदी हिस्से का पूर्ण रूप से टीकाकरण किया जा चुका है और 17 फ़ीसदी आबादी को वैक्सीन की कम से कम एक ख़ुराक मिल चुकी है. 

भारत की राजधानी नई दिल्ली में, एक स्वास्थ्यकर्मी कोविड-19 की वैक्सीन दिखाते हुए.
© UNICEF/Sujay Reddy
भारत की राजधानी नई दिल्ली में, एक स्वास्थ्यकर्मी कोविड-19 की वैक्सीन दिखाते हुए.

मगर टीकाकरण की रफ़्तार में कमी आ रही है और अब यह औसतन प्रतिदिन 40 लाख के आसपास है. 

दुनिया भर में अग्रणी स्वास्थ्य संगठनों ने इस बात की पुष्टि की है कि जो लोग कोविड-19 से उबर चुके हैं, वे फिर से संक्रमित हो सकते हैं.

पर्याप्त जानकारी के अभाव में यह कह पाना कठिन है कि बीमारी से उबरने के बाद, शरीर में स्वाभाविक ढंग से विकसित हुई प्रतिरोधक क्षमता कितने लम्बे समय तक रहती है, या फिर इससे अन्य वैरीएंट्स के संक्रमण से बचने में कितनी मदद मिल पाएगी.

इसलिये, जो लोग कोविड-19 से उबर चुके हों, उन्हें भी टीकाकरण करा लेना चाहिये. 

टीकाकरण कराने से, वायरस से गम्भीर रूप से बीमार पड़ने से भी रक्षा होती है, और इनमें बेहद संक्रामक वैरीएंट्स यानि वायरस के रूपों से बचाव भी है. 

क्या कोविड-19 वैक्सीन, गर्भवती या माहवारी से गुज़र रही महिलाओं के लिये सुरक्षित है?

कोविड-19 वैक्सीन पर ऐसा फ़िलहाल कोई सबूत नहीं है जिससे पता चल सके कि क्या माहवारी से गुज़र रही, गर्भवती या स्तनपान करा रही महिलाओं के लिये दुष्प्रभाव होंगे. 

ऐसा भी कोई तथ्य नहीं है जिससे मालूम हो कि कोविड-19 वैक्सीन से प्रजनन क्षमता से जुड़ी समस्याएँ होती हैं. वास्तव में, गर्भावस्था के दौरान कोविड-19 के गम्भीर लक्षण सामने आने का जोखिम अधिक है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पुष्टि की है कि स्तनपान करा रही महिलाओं के लिये वैक्सीन सुरक्षित है. स्तनपान के ज़रिये शिशुओं के वायरस से संक्रमित होने के मामले भी सामने नहीं आए हैं. 

ये सबूत ज़रूर हैं कि स्तनपान करा रही महिलाओं के टीकाकरण से, बच्चों को कुछ सुरक्षा मिलती है, चूँकि एण्टीबॉडी माँ से बच्चों तक पहुँच जाती है. 

भारत में कोविड-19 संकट के दौरान हम महिलाओं व लड़कियो को किस तरह समर्थन दे सकते हैं?

मौजूदा लैंगिक मानकों और विषमताओं की वजह से, हर संकट पुरुषों की तुलना में, महिलाओं व लड़कियों को अलग ढंग से प्रभावित करता है. 

भारत की राजधानी नई दिल्ली में एक कोविड-19 मरीज़ अस्पताल में बिस्तर के लिये इन्तज़ार कर रहा है.
UNICEF/Amarjeet Singh
भारत की राजधानी नई दिल्ली में एक कोविड-19 मरीज़ अस्पताल में बिस्तर के लिये इन्तज़ार कर रहा है.

कोविड-19 संकट से बेहतर और समान पुनर्बहाली के लिये नीतियों, निवेश और कार्रवाई को, महिलाओं व लड़कियों को सोच-समझकर लक्षित करना होगा.

यूएन वीमैन संस्था, सरकारों और ज़मीनी स्तर पर प्रयासरत संगठनों के साथ मिलकर महिलाओं को भोजन, निजी बचाव उपकरण और नक़दी सहायता प्रदान कर रही है.   

अपनी संचार मुहिमों के ज़रिये, हमने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि महिलाओं को, बीमारी की रोकथाम व टीकाकरण के सम्बन्ध में सत्यापित जानकारी मिले. 

साथ ही लिंग आधारित हिंसा पर सार्वजनिक जागरूकता के प्रसार के लिये भी प्रयास हो रहे हैं. 

हमारे कार्यक्रमों के माध्यम से, हम शिक्षा और वैकल्पिक रोज़गार प्रशिक्षण, महिलाओं तक पहुँचा रहे हैं और इसके लिये डिजिटल व दूरस्थ पढ़ाई का सहारा लिया जा रहा है.

उनके लिये रोज़गार और छोटे उद्यमों तक रास्ता बनाने के लिये भी मदद प्रदान की जा रही है. 

हम अपने राष्ट्रीय साझीदारों के साथ मिलकर, लिंग-आधारित हिंसा में जीवित बची महिलाओं को, कोविड-19 सुरक्षित स्थलों में शरण, वित्तीय, क़ानूनी व चिकित्सा सहायता मुहैया करा रहे हैं.

यूएन वीमैन, सरकारों और निजी सैक्टर सहयोगियों के साथ मिलकर औपचारिक व अनौपचारिक देखभाल अर्थव्यवस्थाओं में निवेश की पैरोकारी कर रहा है. 

इसका लक्ष्य टिकाऊ रोज़गारों का सृजन करना और महिला सशक्तिकरण व आय को बढ़ावा देना है. 

प्रकाशन ज़रूरतों के लिये सम्पादित यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ. 

 

♦ समाचार अपडेट रोज़ाना सीधे अपने इनबॉक्स में पाने के लिये यहाँ किसी विषय को सब्सक्राइब करें
♦ अपनी मोबाइल डिवाइस में यूएन समाचार का ऐप डाउनलोड करें – आईफ़ोन iOS या एण्ड्रॉयड