दक्षिण एशिया में नाइट्रोजन प्रदूषण की रोकथाम ज़रूरी

3 जून 2021

नाइट्रोजन एक दोधारी तलवार है. यह उर्वरकों का एक प्रमुख तत्व है और गेहूँ व मक्का जैसी आवश्यक फ़सलों के विकास में मदद देता है. मगर, बहुत अधिक नाइट्रोजन से वायु प्रदूषित हो सकती है, मिट्टी नष्ट हो सकती है और समुद्र में बेजान "मृत क्षेत्र" पैदा हो सकता है. पाकिस्तान के फ़ैसलाबाद शहर के कृषि विश्वविद्यालय में खेती में नाइट्रोजन उपयोग के प्रमुख विशेषज्ञ तारिक़ अज़ीज, 'दक्षिण एशिया नाइट्रोजन हब' के मुख्य भागीदार भी हैं, जो आठ देशों में नाइट्रोजन के टिकाऊ उपयोग का समर्थन करता है. यूएन पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने तारिक़ अज़ीज से इस दिशा में उनके प्रयासों और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के विषय में विस्तार से बातचीत की.

इस साक्षात्कार को, प्रकाशन ज़रूरतों के लिये सम्पादित किया गया है...

यूएन पर्यावरण एजेंसी: दक्षिण एशिया नाइट्रोजन हब क्या काम करता है?

तारिक़ अज़ीज: हम कृषि में नाइट्रोजन प्रबन्धन में सुधार करने, उर्वरकों पर ख़र्च बचाने और खाद, मूत्र और प्राकृतिक नाइट्रोजन निर्धारण प्रक्रियाओं का बेहतर उपयोग करने पर शोध कर रहे हैं. यह हब, दक्षिण एशिया में अधिक लाभदायक और स्वच्छ खेती के विकल्प पेश करता है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, दक्षिण एशिया सहकारी पर्यावरण कार्यक्रम और दक्षिण एशियाई सरकारें, व्यावहारिक कार्रवाई को बढ़ावा देने के लिये सबसे आशाजनक समाधान साझा करेंगे.

यह यूएन एजेंसी समर्थित ‘कोलम्बो घोषणापत्र’ के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक, राष्ट्रीय कार्य योजनाओं के तहत, सभी स्रोतों से नाइट्रोजन कचरे को आधा करना है. इससे प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर की वैश्विक बचत हो सकेगी.

यूएन पर्यावरण एजेंसी: हब का नीतियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

तारिक़ अज़ीज: हम दक्षिण एशियाई देशों में नाइट्रोजन प्रबन्धन पर मौजूदा नीतियों का विश्लेषण कर रहे हैं. नीति, कृषि, पारिस्थितिकी तंत्र, प्रौद्योगिकी आदि में अनुसन्धान के ज़रिये, यह हब, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और मानवता के कल्याण के लिये पूरे दक्षिण एशिया में नाइट्रोजन प्रदूषण और इसके प्रभावों को कम करने में मदद करेगा.

इसके अलावा, हम किसानों, छात्रों, शुरुआती करियर शोधकर्ताओं, ग़ैर-सरकारी संगठनों और नीति निर्माताओं के लिये छह भाषाओं में पाठ्यक्रमों के माध्यम से, नाइट्रोजन प्रबन्धन और प्रदूषण के बारे में जागरूकता प्रसार के लिये काम कर रहे हैं.

यूएन पर्यावरण एजेंसी: पाकिस्तान में नाइट्रोजन की क्या स्थिति है?

तारिक़ अज़ीज: पाकिस्तान और पूरे दक्षिण एशिया में नाइट्रोजन का उपयोग पिछले चार दशकों में तेज़ी से बढ़ा है. हालाँकि, इस अवधि में नाइट्रोजन उपयोग की दक्षता 67 फ़ीसदी से 30 प्रतिशत तक कम हो गई है, जिससे वातावरण में फैलने के लिये भारी मात्रा में अतिरिक्त नाइट्रोजन उपलब्ध है.

जीवाश्म ईंधन जलने और कृषि गतिविधियों के कारण नाइट्रोजन ऑक्साइड और अमोनिया जैसे नाइट्रोजन उत्सर्जन, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली में बाधा पैदा करते हैं.

हालाँकि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में पाकिस्तान का योगदान नगण्य है - लगभग 0.3 प्रतिशत, मगर यह जलवायु परिवर्तन के लिये सबसे अधिक सम्वेदनशील देशों में से एक है.

दिसम्बर 2019 में, पाकिस्तान ने जलवायु परिवर्तन के लिये प्रकृति-आधारित समाधानों का समर्थन करने, पर्यावरणीय सुदृढ़ता बढ़ाने और वनीकरण व जैव विविधता संरक्षण के लिये एक पारिस्थितिकी तंत्र बहाली कोष की स्थापना की है. इसके अलावा, प्रधानमंत्री की 10 अरब ‘Tree Tsunami’ परियोजना’ को भी वैश्विक स्तर पर पहचान मिल रही है. 

यूएन पर्यावरण एजेंसी: दक्षिण एशिया में, जहाँ दुनिया की एक चौथाई आबादी रहती है, कोविड-19 के प्रकोप के दौरान, वायु प्रदूषण एक प्रासंगिक मुद्दा है. क्या यह हब, पारिस्थितिक तंत्र या मनुष्यों पर नाइट्रोजन के वायु प्रदूषण प्रभावों पर भी कोई शोध कर रहा है?

तारिक़ अज़ीज: वायु प्रदूषण लम्बे समय से दक्षिण एशिया के लिये, एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य ख़तरा रहा है, क्योंकि यह दुनिया के उन क्षेत्रों में से एक है जहाँ सबसे अधिक घरेलू वायु प्रदूषण होता है. चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि अस्थमा और पुरानी फेफड़ों की बीमारी जैसी साँस सम्बन्धित कमज़ोरियों से पीड़ित व्यक्तियों को कोविड-19 का जोखिम अधिक होता है.

कृषि क्षेत्र से अमोनिया का वाष्पीकरण और नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य पर गम्भीर प्रभाव डालते हैं. यह हब, वायुमण्डलीय नाइट्रोजन की सघनता को मापने के लिये एक वायु गुणवत्ता नैटवर्क विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है.

हम पूरे क्षेत्र में भूमि, पानी और वातावरण के बीच नाइट्रोजन प्रवाह को देखने के लिये, एक एकीकृत ढाँचे का निर्माण करने की भी कोशिश कर रहे हैं. हम प्रवाल (Corals) और शैवाल (Lichens) पर नाइट्रोजन प्रदूषण के प्रभाव की जाँच कर रहे हैं. 

साथ ही, हब इस बात पर भी विचार कर रहा है कि नाइट्रोजन प्रदूषण को किस तरह वापिस उर्वरक में बदला जा सकता है, जैसेकि कारखानों की नाइट्रोजन ऑक्साइड गैस को नाइट्रेट में परिवर्तित करना. 

इस इंटरव्यू का विस्तृत रूप पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.

 

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