फ़लस्तीनी इलाक़ों में, इसराइली बाशिन्दों की हिंसा बढ़ी, मानवाधिकार विशेषज्ञों की चेतावनी

14 अप्रैल 2021

संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा है कि इसराइल द्वारा क़ब्ज़ा किये हुए फ़लस्तीनी क्षेत्र पश्चिमी तट में बसाए गए इसराइली बाशिन्दों द्वारा फ़लस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा में, हाल के महीनों में तेज़ी आई है, और इस हिंसा के ज़िम्मेदार लोगों में क़ानून या दण्ड के लिये निडरता का माहौल भी देखा गया है.

विशेष रैपोर्टेयरों ने बुधवार को कहा कि इस वर्ष अभी तक, 210 से ज़्यादा घटनाएँ हो चुकी हैं और एक फ़लस्तीनी व्यक्ति की मौत भी हुई है.

उन्होंने इसराइली अधिकारियों से व्यापक जाँच कराने का आग्रह करते हुए ये भी कहा है कि, बहुत से मामलों में तो इसराइली सेना भी घटनास्थलों पर मौजूद थी.

बच्चों में दहशत

1967 से इसराइल द्वारा क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़ों में मानवाधिकारों की स्थिति पर विशेष रैपोर्टेयर माइकल लिंक सहित अनेक विशेषज्ञों ने विस्तार से बताया है कि 13 मार्च को, दक्षिणी हेब्रॉन में, किस तरह एक फ़लस्तीनी परिवार पर, 10 इसराइली बाशिन्दों ने हमला किया, उनमें से कुछ के पास तो हथियार भी थे.

उन्होंने कहा कि इस हमले में घायल हुए अभिभावकों का, एक चिकित्सा सुविधा में इलाज भी कराया गया, और उनके 8 बच्चों में डर व दहशत फैल गई. 

इन मानवधिकार विशेषज्ञों ने संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता कार्यों के संयोजन कार्यालय (OCHA) द्वारा, फ़लस्तीनी इलाक़ों के बारे में उपलब्ध आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि इसराइली बाशिन्दों की हिंसा की 771 घटनाओं पर नज़र रखी गई.

इनमें 133 फ़लस्तीनी लोग घायल हुए और 9 हज़ार 646 पेड़ों व 184 वाहनों को नुक़सान पहुँचाया गया. इनमें से अधिकतर घटनाएँ हेब्रॉन, येरूशलम, नेबलूस और रामल्लाह इलाक़ों में हुईं.

डराना-धमकाना

इस संयुक्त वक्तव्य में, माइकल लिंक ने कहा कि इसराइली बाशिन्दों द्वारा की गई हिंसा, विचारधारा से प्रेरित थी और उसके पीछे मुख्य मक़सद, ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने की नीयत के साथ-साथ, फ़लस्तीनियों में डर व दहशत फैलाना भी था.

मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों और बुज़ुर्गों को भी इस हिंसा का निशाना बनाने से नहीं छोड़ा गया, और विशेष रूप में, ग्रामीण इलाक़ों में तो मवेशियों, फ़सलों, पेड़ों और घरों को भी नुक़सान पहुँचाया गया.

फ़लस्तीनी इलाक़ों में, इसराइली बस्तियों के विस्तार के साथ-साथ, इसराइली बाशिन्दों द्वारा इस हिंसा के पीछे मक़सद – फ़लस्तीनियों का दैनिक जीवन मुश्किल बनाना है.

बेदख़ली नोटिस

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा है कि ये ख़बरें भी चिन्तित करने वाली हैं कि पूर्वी येरूशलम के शेख़ जर्राह इलाक़े की कर्म अल जाबूनी बस्ती में, 70 से ज़्यादा परिवारों को, अपने घर व ठिकाने ख़ाली करने के लिये मजबूर किया जा रहा है ताकि नई इसराइली बस्तियाँ बसाई जा सकें.

7 परिवारों को पहले ही, अपने घर व ठिकाने, 2 मई तक ख़ाली करने के बेदख़ली नोटिस थमा दिये गए हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह जनसंख्या की अदला-बदली करने वाली जबरन बेदख़ली, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून में सख़्ती से प्रतिबन्धित है.

उन्होंने इसराइली मानवाधिकार संगठन येश दिन के आँकड़ों का सन्दर्भ देते हुए कहा कि वर्ष 2005 से 2019 के बीच, फ़लस्तीनियों द्वारा दर्ज कराई गईं विचारधारा प्रेरित अपराधों की शिकायतों में से, 91 प्रतिशत को, इसराइली सेना को अभियुक्त बनाए बिना ही, बन्द कर दिया गया.

व्यवस्थागत दण्डमुक्ति

मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है, “इसराइली बाशिन्दों द्वारा किये गए अपराधों की प्रकृति व संख्या को देखते हुए, ये संख्या भयावह है. इससे इसराइल द्वारा क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़ों में, इसराइली पक्षों में जारी संस्थागत व व्यवस्थागत दण्डमुक्ति के माहौल की पुष्टि होती है.”

विशेषज्ञों का कहना है कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत, क़ाबिज़ ताक़त पर, अपने अधीन जनसंख्या की सुरक्षा सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी व जवाबदेही है.

चौथे जिनीवा कन्वेन्शन का अनुच्छेद 27 कहता है कि क़ाबिज़ आबादी के साथ हर समय मानवीय बर्ताव किया जाएगा, और ख़ासतौर पर, किसी भी तरह की हिंसा व धमकियों के तमाम कृत्यों से उसकी हिफ़ाज़त की जाएगी.

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ, यूएन मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं. ये विशेषज्ञ स्वेच्छा के आधार पर काम करते हैं, और संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं, और ना ही उन्हें उनके काम के लिये, संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन मिलता है.

 

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