कोविड-19: महिलाओं पर दोहरी गाज, अग्रिम मोर्चों पर मुस्तैद मगर निर्णय-प्रक्रिया से बाहर

22 मार्च 2021

महिला अधिकारों व सशक्तिकरण के लिये काम करने वाले यूएन संगठन – यूएन वीमैन की अध्यक्षा ने कहा है कि निसन्देह दुनिया भर में, स्वास्थ्यकर्मियों में 70 प्रतिशत संख्या महिलाओं की है, और कोविड-19 महामारी से सबसे ज़्यादा और बुरी तरह महिलाएँ ही प्रभावित हुई हैं, फिर भी, महामारी का मुक़ाबला करने से सम्बन्धित निर्णय प्रक्रिया से, महिलाओं को ही, व्यवस्थागत तरीक़े से बाहर रखा जा रहा है. इनमें दुनिया भर में, सरकारों द्वारा संचालित कार्यबल (टास्क फ़ोर्स) भी हैं.

यूएन वीमैन, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और पित्सबर्ग़ विश्वविद्लाय की ‘लैंगिक असमानता शोध प्रयोगशाला’ द्वारा सोमवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं ने, कोविड-19 की भीषण तबाही झेली है, ना केवल स्वास्थ्य सेवाओं के अग्रिम मोर्चों पर, बल्कि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के सिकुड़ जाने के परिणामस्वरूप, रोज़गार व आजीविकाएँ ख़त्म होने के रूप में भी.

घरेलू हिंसा में बहुत तेज़ व चिन्ताजनक बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है; अवैतनिक स्वास्थ्य देखभाल करने की ज़िम्मेदारी ने लगभग 4 करोड़ 70 लाख महिलाओं को अत्यधिक ग़रीबी में धकेल दिये जानने का जोखिम पैदा कर दिया है. 

आँकड़े बताते हैं कि लगभग 137 देसों में, कोविड-19 से निपटने के लिये क़रीब 225 कार्य बल सक्रिय हैं मगर उनमें केवल 24 प्रतिशत ही महिलाएँ हैं.

यूएनडीपी के प्रशासक आख़िम स्टीनर ने कहा, “कोविड-19 का मुक़ाबला करने के प्रयासों में, महिलाएँ अग्रिम मोर्चों पर मुस्तैद रही हैं... फिर भी, उन्हें महामारी के प्रभावों का मुक़ाबला करने के उपायों में, निर्णय-प्रक्रिया से व्यवस्थागत रूप में बाहर रखा गया है.”

उन्होंने “आँख खोल देने वाले आँकड़ों” का सन्दर्भ देते हुए कहा कि इस समय जो अति महत्वपूर्ण निर्णय लिये जा रहे हैं, उनमें महिलाओं की आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप में पूरा करने के लिये, ज़रूरी है कि सार्वजनिक संस्थाओं में, महिलाओं की पूर्ण व समावेशी भागीदारी हो.

“ऐसे ऐसे प्रावधान हैं जिनसे, महिलाओं की आने वाली अनेक पीढ़ियों तक उनका भविष्य निर्धारित होगा.”

लैंगिक नज़रिया दरकार

यूएन एजेंसियों न कहा है कि कोविड-19 महामारी का प्रभावशाली ढंग से मुक़ाबला करने वाली नीतियों व कार्यक्रमों में, लैंगिक नज़रिया समाहित करने की बहुत ज़रूरत है.

निर्णय-निर्धारण भूमिकाओं में, महिलाओं की मौजूदगी के बिना, सरकार उपायों में, महिलाओं की ज़रूरतों की अनदेखी होने का बहुत अन्देशा है और ऐसा होने से, पुनर्बहाली में असमानता और भी ज़्यादा बढ़ सकती है.

ध्यान देने की बात है कि विषम पुनर्बहाली ने लैंगिक समानता के क्षेत्र में दशकों के दौरान हासिल की गई प्रगति को पलटने का जोखिम उत्पन्न कर दिया है.

एजेंसियों के अनुसार, 32 देशों ने महामारी से उबरने के ऐसे उपायों के लिये पंजीकरण कराया जिनमें लैंगिक सम्वेदनशीलता का ख़याल रखा गया है.

यूएन एजेंसियों ने, तमाम देशों की सरकारों से, कोविड-19 से निपटने के उपायों, व निर्णय-निर्धारण और नेतृत्व वाली भूमिकाओं में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करने का आग्रह किया है.

यूएन वीमैन संगठन की अध्यक्षा फ़ूमज़िले म्लाम्बो न्गूका ने कहा, “ये सोचना भी समझ से परे है कि हम इस अभूतपूर्व भेदकारी संकट का मुक़ाबला, महिलाओं की पूर्ण सक्रियता के बिना कर सकेंगे.”

उन्होंने कहा, “इस समय, पुरुषों ने, महिलाओं का नज़रिया शामिल किये बिना ही, उनके बारे में सही फ़ैसले करने का असम्भव कार्य अपने कन्धों पर डाल रखा है."

"इसे बिना और देरी के ठीक करना होगा ताकि हम सभी एक ऐसे भविष्य पर काम कर सकें जो समानता आधारित, लैंगिक सम्वेदनशील और ज़्यादा हरित हो.”

 

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