आसमाँ छूना अभी बाक़ी है...

8 मार्च 2021

संयुक्त राष्ट्र में संसदों के अन्तरराष्ट्रीय संगठन, अन्तर-संसदीय संघ यानि आईपीयू की ताज़ा रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनियाभर की संसदों में, महिला सांसदों की भागेदारी 25 प्रतिशत से अधिक पहुँच गई है. यह आँकड़ा ऐतिहासिक है, लेकिन संसदों में लैंगिक समानता हासिल करने का लक्ष्य अभी भी दूर है. 

आईपीयू के महासचिव, मार्टिन चुनगॉन्ग ने, संसद में महिलाओं की भागेदारी का आकलन करती एक ताज़ा रिपोर्ट, हाल ही में जारी करते हुए, इसमें प्रगति की घोषणा की.

उन्होंने कहा कि उन्हें यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि “पहली बार दुनिया भर की संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी का वैश्विक औसत, एक चौथाई का आँकड़ा पार कर गया है.”

लेकिन साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि प्रगति की दर बहुत कम है और “अगर ऐसे हालात ही रहे तो संसदों में लैंगिक समानता लाने में, 50 साल लग जाएँगे.”

आइपीयू के लैंगिक साझेदारी कार्यक्रम मैनेजर, ज़ीना हिलाल ने बताया, “बीजिंग घोषणा के बाद से ही दुनिया भर में प्रगति नज़र आई है. वैश्विक स्तर पर संसदों में महिलाओं की भागेदारी 1995 के के स्तर 11.3 फ़ीसदी से बढ़कर, आज के दौरा में 25.5 फ़ीसदी हो गई है."

"एशिया में जहाँ पहले यह आँकड़ा 1995 में 13.2 प्रतिशत था, अब 20.4 प्रतिशत हो गया है. ज़ाहिर है कि हम इस प्रगति का स्वागत करते हैं, लेकिन अगर हम संसदों में पुरुष और महिलाओं के समान प्रतिनिधित्व के अपने लक्ष्य को देखें, तो अभी लैंगिक समानता हासिल करने से बहुत, बहुत दूर हैं.”

राजनैतिक सशक्तिकरण

पहली महिला प्रधानमन्त्री, महिला राष्ट्रपति, महिला स्पीकर, महिला रक्षा मन्त्री, महिला वित्त मन्त्री का रिकॉर्ड बनाने वाले देश, भारत में, राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर प्रगति देखी जाती रही है.   

भारत में संसद सदस्या और आईपीयू के महिला फ़ोरम में भारत की प्रतिनिधि, पूनमबेन मादम मानती हैं, “महिलाएँ दुनियाभर की आबादी का आधा हिस्सा हैं, इसलिये उन्हें मुख्य धारा में लाए बिना कोई भी विकास कार्य पूरा नहीं हो सकता. यही वजह है कि लैंगिक समानता का लक्ष्य हासिल करना, किसी भी समाज के लिये महत्वपूर्ण है.”

भारत की केन्द्रीय कपड़ा मन्त्री और महिला व बाल विकास मन्त्री, स्मृति ईरानी कहती हैं, “आज मुझे इस बात का गर्व है कि भारत की संसद में, देश के इतिहास में सबसे ज़्यादा महिला प्रतिनिधि हैं, लेकिन जैसे कि मैंने कहा कि आसमान छूना अभी बाक़ी है."

"हमारे देश में 13 लाख महिलाएँ पंचायत स्तर पर राजनैतिक भूमिका निभा रही हैं, अपनी सेवाएँ दे रही हैं. उन महिलाओं का उल्लेख करना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना कि संसद में महिलाओं का.” 

स्मृति ईरानी, भारत सरकार में केन्द्रीय कपड़ा मन्त्री और महिला व बाल विकास मन्त्री हैं.
UN News
स्मृति ईरानी, भारत सरकार में केन्द्रीय कपड़ा मन्त्री और महिला व बाल विकास मन्त्री हैं.

वो कहती हैं, “अगर आज हम राजनैतिक सशक्तिकरण की बात करें तो हाँ, हम संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लिये प्रतिबद्ध हैं, लेकिन दूसरी ओर जो महिलाएँ प्रशासन में भी अपनी भूमिका निभा रही हैं, उनकी भी संख्या बढ़ती जा रही है."

"हमारे देश की वित्त मन्त्री महिला हैं, पहली ऐसी वित्त मन्त्री हैं, लेकिन अगर आप प्रशासन के नज़रिये से देखें तो यह कहना भी उचित होगा कि पहली बार देश में, वित्तीय विकेन्द्रीकरण महिला केन्द्रित भी होगा. ये भारत के इतिहास में पहले कभी भी नहीं हुआ."

उनका कहना है कि दुनिया की किसी भी अर्थव्यव्यस्था में  शायद ही इस तरह का प्रयास किया गया कि अगर महिला को सशक्त करना है, तो उसे वित्तीय बजट से भी जोड़ने की ज़रूरत है. ऐसा बजट जो देश में प्रदेश और पंचायत स्तर तक जाएगा.”

चुनौतियाँ

लेकिन आज भी महिलाओं के लिये राजनीति का रास्ता आसान नहीं है. पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को इस राह में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. 

आइपीयू की ज़ीना हिलाल बताती हैं कि दुनिया भर के सभी देशों में महिलाओं के राजनीतिक करियर में आने वाले रोड़े समान ही होते हैं. 

वो कहती हैं, “सबसे पहले तो महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका देने में राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी है. फिर उन्हें कई तरह के पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है."

"यही नहीं, क़ानून में, अवसरों में, उनके साथ अक्सर भेदभाव होता है और राजनीति में भी उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है, यौन उत्पीड़न और हिंसा.”

वहीं, भारत की कैबिनेट मंत्री, स्मृति ईरानी मानती हैं, “कठिनाइयाँ और चुनौती तो महिलाओं के जीवन का एक अभिन्न अंग है. मैं एक रीसर्च के आधार पर यह कह रही हूँ कि जहाँ-जहाँ प्रशासनिक स्तर पर महिलाओं को ज़िम्मेदारी सौंपी गई, वहाँ-वहाँ देखा गया कि शिक्षा हो या स्वास्थ्य, जो संयुक्त राष्ट्र के विकास सूचकाँक के मानदण्ड हैं, उनमें महिलाओं ने ज़्यादा प्रशासनिक गति दिखाई, वित्त वहाँ ज़्यादा आबंटित करवाया."

"इसलिये जब एक महिला को ज़िम्मेदारी मिलती है, प्रशासनिक अथवा राजनैतिक, तो उनका रुझान - परिवारों को, शिक्षा, स्वास्थ्य की दृष्टि से, रोज़गार की दृष्टि से, आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ और सक्षम करने का रहता है.” 

आइपीयू के लैंगिक साझेदारी कार्यक्रम की मैनेजर, ज़ीना हिलाल का मानना है कि संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर प्रगति हुई है, लेकिन अब भी हम दुनियाभर की संसदों में लैंगिक समानता हासिल करने के लक्ष्य से बहुत दूर हैं.
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आइपीयू के लैंगिक साझेदारी कार्यक्रम की मैनेजर, ज़ीना हिलाल का मानना है कि संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर प्रगति हुई है, लेकिन अब भी हम दुनियाभर की संसदों में लैंगिक समानता हासिल करने के लक्ष्य से बहुत दूर हैं.

सोशल मीडिया का उदय

हाल ही में सोशल मीडिया के उदय से भी राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं को ऑनलाइन हिंसा व दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा है. 

ज़ीना हिलाल कहती हैं, “सोशल मीडिया पर महिलाओं के ख़िलाफ़ हमले होना आम बात है. विशेषकर यह हमले, अपना करियर शुरू कर रही युवा महिलाओं पर ज़्यादा होते हैं, जिससे कई बार वो अपने राजनैतिक जीवन को आगे बढ़ाने से पीछे हटने को मजबूर हो जाती हैं."

"यह स्थित लोकतन्त्र के लिये बहुत घातक है और यह सभी जगह देखी जा रही है. किसी न किसी रूप में सभी तरह की हिंसा सोशल मीडिया पर मौजूद है. उन सभी का लक्ष्य एक ही होता – महिलाओं को चुप करवाना, या उनकी राह में मुश्किलें खड़ी करके, उन्हें प्रतिबन्धित कर, या राजनैतिक परिदृश्य से उनकी मौजूदगी ही ख़त्म कर देना.”

स्मृति ईरानी सोशल मीडिया पर अपने अनुभव को याद करते हुए बताती हैं, “मैंने अपने जीवन में राजनीति में जिन-जिन लोगों को पछाड़ा है, वो सोशल मीडिया के अन्तर्गत, अपने इको-सिस्टम के साथ अटैक करते हैं, ट्रोलिंग करते हैं, लेकिन मैंने बार-बार यह कहा है कि जब हम सोशल मीडिया का अंग बनते हैं, तब हम जानते हैं कि ये चुनौतियाँ है, तत्पश्चात हम इन चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी सोशल मीडिया मौजूदगी को बरक़रार रखते हैं. लेकिन सोशल मीडिया पर हम ज़िम्मेदारी के साथ सम्वाद क़ायम करें, यह हम सबका दायित्व है.” 

स्मृति ईरानी मानती हैं कि “सोशल मीडिया टैक्नॉलॉजी एक बहुत बड़ा उपकरण बना है महिलाओं के दृष्टिकोण से. आज अगर हम परिचर्चाओं की दृष्टि से देखें तो सोशल मीडिया में भिन्न प्रकार की आवाज़ें सुनाई देती है, किसी पॉलिसी के ऊपर भिन्न प्रकार के दृष्टिकोण सामने आते हैं."

"लेकिन सोशल मीडिया पर सामाजिक उत्तरदायित्व को भी उतना ही स्थान मिलना चाहिये कि अगर कोई महिला हो या पुरूष हो, अगर किसी विषय को सामने रखते हैं, तो उसपर सबूत-आधारित वार्ता हो सकती है, चर्चा हो सकती है, लेकिन सम्मान की भावना के साथ.” 

ज़मीनी स्तर की राजनीति

कोविड-19 के दौरान महिलाओं के नेतृत्व की एक नई लहर उठी. गाँवो में, पंचायतों में, ज़िलों में, शहरों में, स्वयंसेवकों के रूप में, स्वास्थ्यकर्मियों के तौर पर, महिलाओं ने, विभिन्न भूमिकाओं में समान रूप से कमान सम्भाली. 

आइपीयू महिला फ़रम में भारत की प्रतिनिधि, पूनमबेन मादम कहती हैं, “संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिये, ज़मीनी स्तर पर महिलाओं को राजनैतिक रूप से सशक्त बनाना महत्वपूर्ण है. भारत के 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन (1992) से सभी ग्रामीण या शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिये अध्यक्ष पदों पर, कुल सीटों के एक-तिहाई आरक्षण निर्धारित किया गया है. वर्तमान में, स्थानीय निकायों में कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों में लगभग 46 प्रतिशत महिलाएँ हैं."

भारत की पहली एमबीए सरपंच के नाम से मशहूर, छवि राजावत का मानना है कि ज़मीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिये बुनियादी स्तर पर शुरू करना ज़रूरी है. 

राजस्थान की राजधानी जयपुर के निकट एक गाँव सोडा की, 2010 से 2020 तक, सरपंच रहीं, छवि राजावत कहती हैं, “अगर हम मूलभूत चीज़ों की बात करें, तो हम बच्चों से स्कूलों में पूछते हैं कि विपरीत शब्द बताओ. सफ़ेद का विपरीत शब्द क्या है – काला बताते हैं. और पूछें कि पुरुष का विपरीत शब्द क्या है – तो वो कहेंगे महिला."

"तो शुरुआती स्तर पर ही हम बहुत ग़लत चीज़ें सिखा रहे हैं. क्योंकि पुरुष और महिला विपरीत नहीं हैं, वो एक-दूसरे के पूरक हैं. यह समझना बहुत ज़रूरी है और इसकी शुरूआत हमारे घरों में होती है और समाज में होती है.”  

समाधान 

संसंदों में लैंगिक असमानता की खाई को पाटने के लिये राजनैतिक इच्छा शक्ति के साथ-साथ, पुरुषों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है.  

स्मृति ईरानी कहती हैं, “जन-प्रतिनिधि जो भी हों, वो महिलाओं और उनकी ज़रूरतों के प्रति, समाधानों के प्रति, समर्पित हों,” 

वहीं संसदों में, महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिये प्रयासरत, आइपीयू  की भारतीय प्रतिनिधि और भारत में लोकसभा सदस्य, पूनमबेन बताती हैं, “हम संसद में महिला आरक्षण विधेयक के पारित होने पर भी आम सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो महिलाओं के लिये लोकसभा और सभी राज्यों की विधान सभाओं में 33 प्रतिशत सीटों आरक्षण प्रदान करेगा.”

छोटी सी आशा

महिलाओं को समान अवसर मिलें, संसांधनों तक समान पहुँच हासिल हो, समाज में बराबरी का दर्जा मिले, शिक्षा मिले, तो उनके सपनों को पंख अपने-आप मिल जाते हैं.

भारत की केन्द्रीय मन्त्री, स्मृति ईरानी स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, “अगर हम महिला और महिला की क्षमता व योग्यता पर चर्चा करें, तो ये जानना बहुत ज़रूरी है कि महिलाएँ चाहती हैं कि वो पुरूषों के साथ सामान्य धरातल पर प्रतिस्पर्धा करें.” 

“हम किसी से ख़ैरात नहीं चाहते, हम केवल यह चाहते हैं कि हमें समान अवसर मिलें, और संसाधनों तक समान पहुँच मिले.”

वो कहती हैं. “जैसाकि मैंने कहा कि पूरा आसमान छूना अभी बाक़ी है.” 

 

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