भोजन की बर्बादी, जलवायु परिवर्तन को न्योता

5 मार्च 2021

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के एक नए अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2019 में बेचा गया, 93 करोड़ टन से ज़्यादा भोजन, कूड़ेदान में फेंक दिया गया. यूएन एजेंसी के अनुसार भोजन की बर्बादी केवल धनी देशों की समस्या नहीं है, और इससे जलवायु परिवर्तन के लिये भी खाद मिलती है. वर्ष 2030 तक टिकाऊ विकास एजेण्डा के तहत, वर्ष 2030 तक, भोजन की बर्बादी में 50 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है.

‘Food Waste Index Report 2021’ नामक यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और साझीदार संगठन, WRAP,  ने मिलकर तैयार की है. 

रिपोर्ट दर्शाती है कि घरों, रेस्तराँओं और दुकानों से जितनी भोजन बर्बादी होती है, उसका लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा, भोजन फेंक देने के कारण बर्बाद होता है.

कुछ भोजन, खेतों और आपूर्ति श्रंखला में भी बर्बाद होता है. इससे स्पष्ट है कि कुल भोजन उत्पादन का एक तिहाई हिस्सा कभी नहीं खाया जाता है. 

यूएन एजेंसी की यह रिपोर्ट भोजन की बर्बादी के विषय में आँकड़े जुटाने और विश्लेषण करने का अब तक का सबसे विस्तृत प्रयास है.

इस रिपोर्ट के ज़रिये, देशों के लिये ऐसी प्रणाली भी सुझाई गई है, जिससे कि भोजन की बर्बादी का सटीकता से अनुमान लगाया जा सकता है.

यूएन पर्यावरण एजेंसी की कार्यकारी निदेशक इन्गेर एण्डरसन ने कहा, “अगर हम जलवायु परिवर्तन, प्रकृति व जैवविविधता के गुम होने, और प्रदूषण व बर्बादी से निपटने के लिये गम्भीर होना चाहते हैं, तो व्यवसायों, सरकारों व नागरिकों को भोजन की बर्बादी घटाने में अपनी भूमिका निभानी होगी.”

अभी तक भोजन की बर्बादी को, धनी देशों की समस्या के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, बर्बादी का स्तर सभी देशों में लगभग समान है. 

हालाँकि निर्धनतम देशों में आँकड़ें पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं हैं.

अध्ययन बताता है कि घरों में, आपूर्ति श्रंखला के खपत (Consumption) वाले चरण में 11 प्रतिशत भोजन, फेंक दिया जाता है, जबकि भोजन सेवाओं में बर्बादी का ये हिस्सा पाँच प्रतिशत और फुटकर विक्रेताओं में दो फ़ीसदी है.  

कार्बन उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार 

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है इन वजहों से, पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था पर काफ़ी असर पड़ता है. इस्तेमाल ना होने वाले भोजन को, आठ से 10 फ़ीसदी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों के लिये ज़िम्मेदार माना जाता है.  

यूएन एजेंसी प्रमुख ने कहा कि भोजन की बर्बादी घटाने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में कटौती होगी, प्रकृति के क्षरण की रफ़्तार धीमी होगी, भोजन की उपलब्धता बढ़ेगी और इसके ज़रिये, वैश्विक मन्दी के समय भुखमरी कम करने और धन बचाने में मदद मिलेगी.

वर्ष 2019 में, 69 करोड़ लोग भुखमरी से प्रभावित थे, और तीन अरब से ज़्यादा लोग एक सेहतमन्द आहार जुटाने में असमर्थ थे. 

इस पृष्ठभूमि में, कोविड-19 की वजह से ये आँकड़े और गम्भीर हो सकते हैं. इसके मद्देनज़र, अध्ययन में उपभोक्ताओं से घरों पर भोजन बर्बाद ना करने का आग्रह किया गया है.

इसके अलावा, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित जलवायु कार्रवाई योजनाओं में भोजन की बर्बादी से निपटने के उपायो शामिल करने की पैरवी की गई है. 

इस बीच, टिकाऊ विकास एजेण्डा के 12.3 लक्ष्य के तहत, वैश्विक स्तर पर प्रति व्यक्ति भोजन की बर्बादी को फुटकर और उपभोक्ता के स्तर पर, 50 प्रतिशत घटाया जाना है.

इसके समानान्तर, उत्पादन और आपूर्ति श्रंखला में भी भोजन की बर्बादी को भी कम किये जाने के प्रयास किये जाने हैं. “इस वर्ष, यूएन खाद्य प्रणाली शिखर वार्ता, वैश्विक भोजन बर्बादी से निपटने के लिये, निडर नई कार्रवाई का अवसर प्रदान करेगी.”

अब ऐसे देशों की संख्या बढ़ रही है, जो भोजन की बर्बादी को मापने लगे हैं. 

इनमें से 14 देशों ने घरों से आँकड़े, इस प्रकार जुटाए हैं कि वे ‘Food Waste Index’ के नज़रिये से उपयुक्त हैं, जबकि 38 अन्य देशों से मिले आँकड़े, एसडीजी - 12.3 के तरीक़ों के अनुरूप एकत्र किये गए हैं. 

यूएन एजेंसी भोजन की बर्बादी का आकलन करने के लिये, देशों की क्षमता विकसित करने के इरादे से, जल्द ही क्षेत्रीय समूह तैयार करने के प्रयासों में जुटी है.  

 

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