भारत: टीकाकरण के साथ बुनियादी स्वास्थ्य उपायों के पालन पर बल

28 जनवरी 2021

भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के प्रतिनिधि डॉक्टर रॉड्रिको एच. ऑफ्रिन ने कहा है कि कोविड-19 के ख़िलाफ़ टीकाकरण मुहिम एक मज़बूत सार्वजनिक स्वास्थ्य औज़ार है लेकिन इसके समानान्तर बुनियादी स्वास्थ्य उपाय भी अपनाना जारी रखना होगा. उन्होंने कहा कि ये उपाय, भारत जैसे विशाल, विविध और घनी आबादी वाले देश में भी संक्रमण के मामले घटाने में बहुत प्रभावी रहे हैं . यूएन न्यूज़ के साथ डॉक्टर ऑफ्रिन की एक ख़ास बातचीत...

यूएन न्यूज़: भारत ने हाल ही में, विशाल स्तर पर कोविड-19 टीकाकरण अभियान शुरू किया है. इस प्रक्रिया में विश्व स्वास्थ्य संगठन किस तरह भारत सरकार की मदद कर रहा है?

डॉक्टर रॉड्रिको ऑफ्रिन:  भारत के WHO कार्यालय में लगभग 2,600 कर्मचारी हैं और सच यह है कि चूँकि पहले हमने देश में पोलियो उन्मूलन के कार्य में सहयोग किया था, तो हम उसी ढाँचे को एक लाँचिंग पैड के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. 

इसमें मुख्य रूप से हमारी भूमिका - प्रशिक्षण, परिचालन दिशानिर्देशों का विकास करना, निगरानी, जाँच और टीके के बाद प्रतिकूल असर की घटनाओं पर नज़र रखने की है. देश में, अब तक हमारे सहयोग से टीकाकरण के काम में जुटे ढाई हज़ार से अधिक कर्मियों और स्वास्थ्यकर्मियों की टीम के लगभग 4 लाख 75 हज़ार सदस्यों को प्रशिक्षित किया गया है. 

WHO India
भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधि डॉक्टर रॉड्रिको ऑफ़्रिन.

WHO के सर्विलेंस मेडिकल ऑफिसर (निगरानी चिकित्सा अधिकारी) राज्य और ज़िला स्तरों की नियमित कार्य बलों की बैठकों के लिये उच्चतम स्तर का निरीक्षण सम्भव करने हेतु समीक्षा जानकारी मुहैया कराने की सुविधा प्रदान कर रहे हैं. 

भारत में WHO ने टीकाकरण अभियान से पहले उसके अभ्यास (Dry run) में भाग लिया, जिसमें मैं स्वयं शामिल था. इससे हम उन दिशानिर्देशों और प्रशिक्षण सामग्री को भी आज़मा सके, जो हमने निर्धारित किये थे. 

तीन चरणों में हुए इस अभ्यास के दौरान, हमने CO-WIN नामक आईटी सक्षम ऐप का उपयोग किया, और उसके ज़रिये टीकों के प्रबन्धन, लाभार्थियों के पंजीकरण, लाभार्थियों को उनकी बारी के लिये अलर्ट करने, टीकाकरण कवरेज की रिपोर्टिंग और टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटनाओं के कुछ परिदृश्यों के अभ्यास सहित कई मसलों पर वास्तविक समय में फ़ीडबैक दिया. अन्तिम चरण 8 जनवरी को था.

शुरुआत से अब तक पूरे देश में विश्व स्वास्थ्य संगठन के कर्मियों द्वारा 15 हज़ार से अधिक कोविड-19 टीकाकरण सत्रों की निगरानी की गई है. यह सारी जानकारी वास्तविक समय में दी जाती है. हर शाम, सत्रों की समीक्षा होती है कि क्या ग़लत हो सकता है और फिर इस बारे में राष्ट्रीय सरकार को जानकारी दी जाती है ताकि आगामी सत्रों में वो ग़लतियाँ सुधारी जा सकें.

यूएन न्यूज़: फ़िलहाल टीकाकरण स्वैच्छिक है लेकिन क्या विश्व स्वास्थ्य संगठन कोविड-19 के लिये अनिवार्य टीकाकरण की सिफ़ारिश करता है?

डॉक्टर रॉड्रिको ऑफ्रिन: WHO दुनिया भर में कोरोनोवायरस के प्रसार को रोकने के लिये टीकाकरण को अनिवार्य करना ज़रूरी नहीं समझता. 

स्वास्थ्यकर्मी व अग्रिम पंक्ति में काम करने वाले कर्मचारियों, बुज़ुर्गों व सह-रुग्णताओं वाले प्राथमिकता समूहों को टीके उपलब्ध कराना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करने का एक अधिक प्रभावी तरीक़ा होगा. वैसे तो, कोविड-19 के ख़िलाफ़ वैक्सीन विकसित करने में अभूतपूर्व प्रगति हुई है, लेकिन हम सभी जानते हैं कि फ़िलहाल वैक्सीन की आपूर्ति सीमित ही है. 

इसलिये कोविड-19 का सामना करने के लिये समग्र लक्ष्य यही रहेगा कि लोगों के स्वास्थ्य व कल्याण के लिये समान रूप  से योगदान किया जाए.

WHO India
भारत में यह टीकाकरण अभियान, दुनिया के सबसे बड़े और सबसे महत्वाकाँक्षी टीकाकरण कार्यक्रमों में से एक है.

यूएन न्यूज़: कोविड-19 संकट अभी जारी है. ऐसे में, इन वैक्सीनों की क्या भूमिका होगी? क्या हम कह सकते हैं कि उलटी गिनती शुरू हो गई है और कोविड-19 का अन्त अब नज़दीक है?

डॉक्टर रॉड्रिको ऑफ्रिन: कोविड-19 अभी फैल रहा है और ऐसे में वैक्सीनें, एक ऐसा मज़बूत सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप बनकर आईं हैं, जिनसे बीमारी को फैलने से रोकने और ज़िन्दगियाँ की रक्षा करने की उम्मीद जागी है. 

लेकिन बेहतर सुरक्षा के लिये हमें यह सुनिश्चित करना चाहिये कि जिन लोगों को अधिक जोखिम है, पहले उन्हें टीका लगाया जाए. आने वाले महीनों में महामारी को नियन्त्रित करने के अन्य मूलभूत सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों में कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिये.

जैसा कि हमने हमेशा कहा है और सलाह दी है, हमें निगरानी और सम्पर्क खोज को मज़बूत करना होगा ताकि हम कोविड संक्रमण के मामलों का पता लगा सकें. इसके अलावा, जिन लोगों को बीमारी होने का सन्देह हो, उनके लिये परीक्षण हमेशा उपलब्ध और सुलभ होना ज़रूरी है. 

एकान्तवास और उस दौरान देखभाल बहुत महत्वपूर्ण है और इसे रोका नहीं जाना चाहिये. साथ ही, हमें जनता को कोविड उचित व्यवहार जारी रखने के लिये प्रोत्साहित करते रहना होगा. यह स्पष्ट है कि टीके बीमारी से लड़ने और उसे ख़त्म करने के सबसे प्रभावी व सस्ते तरीक़ों में से एक हैं. 

टीकाकरण के हमारे सफल अनुभवों में, भारत और दुनिया भर के अन्य देशों से चेचक (small pox) और पोलियो का उन्मूलन प्रमुख रहे हैं. लेकिन हम अभी इस महामारी के लिये यह नहीं कह सकते. 

यह उन कार्रवाइयों में से एक है जिसे लागू करने में, हम मदद कर रहे हैं. इससे हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों और जवाबी कार्रवाई की रूपरेखा में कोई बदलाव नहीं आएगा. 

क्योंकि जैसा कि आपने देखा है, भारत जैसे विशाल, विविध और घनी आबादी वाले देश में संक्रमण के मामलों को घटाने में ये उपाय प्रभावी रहे हैं.

यूएन न्यूज़: जैसा कि आपने कहा, कई अन्य देशों की तुलना में, भारत में कोविड-19 के संक्रमणों की संख्या में काफ़ी गिरावट देखी गई है, लोगों के ठीक होने की दर भी अधिक है. तो, इससे क्या निष्कर्ष निकाला जाए? क्या भारत में ‘हर्ड इम्युनिटी’ आ चुकी है या महामारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई बेहतर रही है?

डॉक्टर रॉड्रिको ऑफ्रिन: मुझे लगता है कि मैं दूसरे विकल्प के साथ जाना चाहूँगा कि महामारी की जवाबी कार्रवाई वास्तव में सभी राज्यों और ज़िलों में बहुत सुसंगत और बेहतर तरीक़े से हुई है. हमने देखा है कि विभिन्न ज़िलों में संक्रमण में वृद्धि के साथ ही उनके उपाय भी तेज़ कर दिये गए हैं, तो यह बहुत स्पष्ट है कि संख्या हमें दिखा रही है कि मामले कम हो रहे हैं, परीक्षण अभी भी बहुत उच्च स्तर पर हो रहा है. 

UNICEF India/Ruhani Kaur
भारत में एक आशा कार्यकर्ता, रीना धाकड़ का कहना है कि वह कोविड से सुरक्षा पाने के लिये टीकाकरण करवाना चाहती हैं.

विशेष रूप से, अति सम्वेदनशील और उच्च जोखिम वाले समूहों में संक्रमण फैलने से रोकने में टीकाकरण से बहुत मदद मिलेगी. 

मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहूँगा कि कोविड-19 के ख़िलाफ़ ‘हर्ड इम्युनिटी’, टीकाकरण से लोगों की रक्षा करके हासिल की जानी चाहिये, ना कि उन्हें बीमार बीमार बनाने वाले वायरस के सम्पर्क में लाकर. 

सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों को जारी रखना और कोविड उपयुक्त व्यवहार को लागू करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि जब तक वायरस के पास फैलने का अवसर मौजूद रहता है, तब तक उसके विभिन्न प्रकार सामने आते रहेंगे, जैसे कि हम देख रहे हैं. 

यूएन न्यूज़: बदलते परिदृश्य और टीकाकरण मुहिम के मद्देनज़र, भारत को अब कितने परीक्षण करने की आवश्यकता है?

डॉक्टर रॉड्रिको ऑफ्रिन: भारत में परीक्षणों की संख्या बहुत बढ़ गई है. वास्तव में इसकी कहानी बहुत अभूतपूर्व रही है. शुरुआत में चार प्रयोगशालाओं से लेकर तीन हज़ार प्रयोगशालाओं तक, सार्वजनिक और निजी प्रयोगशालाओं को संगठित करने, और इनके लिये मानक स्थापित करना. 

इन सभी क़दमों से परीक्षण क्षमता बढ़ाने में मदद मिल रही है. अब तक, 19 करोड़ 50 लाख परीक्षण किये गए और एक दिन में ही सात लाख 25 हज़ार तक परीक्षण किये गए हैं. 

यह जानना महत्वपूर्ण है कि संक्रमण के सकारात्मक मामलों की दर भी कम है. तो, इसका मतलब है कि सात लाख 25 हजार परीक्षण ज़रूर हुए हैं, लेकिन इनमें से बहुत से मामले कोविड-19 के लिये नकारात्मक होंगे. 

भारत के लिये संक्रमण के सकारात्मक मामलों की दर केवल 1.8 प्रतिशत है यानि दो प्रतिशत के आसपास. तो, इसका मतलब है कि अगर आप इतने परीक्षण कर रहे हैं और उनमें से ज़्यादातर नकारात्मक आ रहे हैं, तो मानना होगा कि सभी सार्वजनिक उपाय अच्छी तरह काम कर रहे हैं.

यूएन न्यूज़: टीकों के असरदार साबित होने को लेकर काफ़ी आशंका जताई जा रही है. क्या टीके सुरक्षित हैं? वैक्सीन के प्रति विश्वास जगाने और संकोच को कम करने की दिशा में क्या किया जा सकता है?

डॉक्टर रॉड्रिको ऑफ्रिन: हमने टीकाकरण अभियानों के दौरान हिचकिचाहट देखी है और उससे निपटा है, चाहे फिर वो पोलियो का टीकाकरण हो, हाल ही में ख़सरे का या आम टीकाकरण. 

इन अनुभवों के आधार पर, विशेष रूप से यूनीसेफ़ के साथ साझेदारी में भारत सरकार ने कोविड-19 की संचार रणनीति तैयार की है, जिसमें संकोच सम्बन्धी चिन्ता पर विस्तार से ध्यान दिया गया है.

वैक्सीन लगवाने में संकोच की स्थिति से निपटने के लिये समुदायों को इससे जोड़ना बेहद ज़रूरी होता है. पूर्व अनुभवों के आधार पर परम्परागत रूप से वैक्सीन का विरोध करने वाले समूहों या क्षेत्रों की पहचान करना अहम है. 

इसलिए कोविड-19 टीकाकरण योजना के लिये, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ख़सरा अभियान के अपने पिछले अनुभवों से सबक़ सीखा है. स्थानीय समुदायों के भरोसेमन्द लोगों को समझाना इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, ताकि लोगों में विश्वास व स्वीकृति जाग सके. 

साथ ही, वैक्सीनों की सुरक्षा और प्रभावीपन पर प्रमुख वैज्ञानिकों के लेख और मीडिया संवाद भी. 

सुरक्षा व प्रभावशीलता, अलबत्ता, एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं और ये दो भिन्न अवधारणाएँ हैं. ऐसा हमने, भारत में बहुत स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय, राज्य और क्षेत्रीय मीडिया में देखा है. 

कोविड-19 का टीका लगवाने के बाद प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तियों के सन्देश, वैक्सीन से जुड़ी हिचकिचाहट का मुक़ाबला करने का एक और तरीक़ा है. झिझकने वाले समूहों के साथ बातचीत, उनके सन्देहों या उनके दिमाग़ों में चल रहे मिथकों व टीकों से जुड़ी भ्रान्तियों को दूर करना भी कारगर उपाय है. 

हमने राष्ट्रीय, राज्य और क्षेत्रीय मीडिया में इससे जुड़े लेख देखे हैं. पूरे समय डिजिटल मीडिया की निगरानी करना भी ज़रूरी है. हम जिस युग में रहते हैं, उसमें हम जहाँ महामारी और इस वायरस का मुक़ाबला कर रहे हैं, उसी तरह ‘इन्फ़ोडैमिक’ यानि ‘ग़लत जानकारी की महामारी’ से भी जूझ रहे हैं. 

शुरू से ही कोविड-19 से जुड़ी भ्रन्तियों व अफ़वाहों से निपटना हमारी जबावी कार्रवाई का हिस्सा रहा है, और टीकाकरण प्रक्रिया का भी यह अभिन्न हिस्सा है.

 

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