नई 'जलवायु वास्तविकता' के अनुरूप बदलाव ज़रूरी, अन्यथा गम्भीर क्षति का ख़तरा

14 जनवरी 2021

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक नई रिपोर्ट दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन अनुकूलन प्रयासों में प्रगति हुई है, इसके बावजूद बाढ़, सूखा और बढ़ता समुद्री जलस्तर, जैसी अन्य चुनौतियों से असरदार ढँग से निपटने के लिये पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का अभाव है. यूएन एजेंसी ने गुरुवार को ‘Adaptation Gap’ नामक  रिपोर्ट को जारी कर सचेत किया है कि पुख़्ता जलवायु कार्रवाई के बग़ैर दुनिया को गम्भीर मानवीय व आर्थिक क्षति झेलनी पड़ेगी.

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि तापमान में बढ़ोत्तरी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों में जैसे-जैसे तेज़ी आ रही है, देशों को भी नई जलवायु वास्तविकताओं से निपटने के लिये आवश्यक बदलाव लाने होंगे. 

अगर ऐसा नहीं किय गया तो फिर दुनिया को इसकी गम्भीर क़ीमत चुकानी होगी.

यूएन एजेंसी की कार्यकारी निदेशक इन्गर एण्डरसन ने कहा, “कठिन सच्चाई यह है कि जलवायु परिवर्तन अब हमारे ऊपर मँडरा रहा है.”

“इसके प्रभाव और पैने होंगे और निर्बल देशों व समुदायों पर सबसे ज़्यादा असर डालेंगे.”

उन्होंने कहा कि पेरिस समझौते में तय लक्ष्यों - इस सदी में तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के प्रयासों के बावजूद ऐसा होनगा. 

वैश्विक संकल्प की दरकार

विकासशील देशों में अनुकूलन प्रयासों की वार्षिक क़ीमत 70 अरब डॉलर आंकी गई है लेकिन वर्ष 2030 तक यह आँकड़ा बढ़कर 300 अरब डॉलर और 2050 में यह 500 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है.

रिपोर्ट दर्शाती है कि तीन-चौथाई से ज़्यादा देशों के पास कुछ हद तक अनुकूलन सम्बन्धी योजनाएँ हैं लेकिन उन्हें प्रभावी ढँग से लागू करने के लिये वित्तीय इन्तज़ाम नहीं है.

इसके मद्देनज़र सार्वजनिक व निजी स्तर पर वित्तीय संसाधनों का प्रबन्ध करने की तत्काल आवश्यकता है. 

यूएन एजेंसी प्रमुख ने महासचिव गुटेरेश का उल्लेख करते हुए कहा कि वैश्विक जलवायु वित्तीय संसाधनों का पचास फ़ीसदी अगले वर्ष अनुकूलन प्रयासों में आवण्टित करने के लिये एक वैश्विक संकल्प ज़रूरी है. 

इन्गर एण्डरसन ने उम्मीद जताई है कि इस उपाय से अनुकूलन प्रयासों में तेज़ी आयेगी – समय पूर्व चेतावनी प्रणाली से लेकर सुदृढ़ जल संसाधनों व प्रकृति आधारित समाधानों तक.

जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में अनुकूलन को जलवायु कार्रवाई का एक अहम स्तम्भ माना गया है. 

इसका उद्देश्य जलववायु दुष्प्रभावों का ख़तरा झेल रहे देशों व समुदायों की निर्बलताओं को कम करना और असर को सहने की क्षमता का निर्माण करना है. 

प्रकृति-आधारित समाधान 

यूएन एजेंसी की रिपोर्ट में किफ़ायती प्रकृति-आधारित समाधानों की अहमियत को भी रेखांकित किया गया है जिससे जलवायु जोखिमों को कम, जैवविविधता की रक्षा व पुनर्बहाली और समुदायों व अर्थव्यवस्थाओं के लिये बेहतरी को सुनिश्चित किया जा सकता है.

रिपोर्ट में चार अहम जलवायु और विकास कोष का विश्लेषण किया गया है: वैश्विक पर्यावरण सुविधा (Global Environment Facility); हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund); अनुकूलन कोष (Adaptation Fund); और अन्तरराष्ट्रीय जलवायु पहल (International Climate Initiative).

इस विश्लेषण के आधार पर बताया गया है कि प्रकृति-आधारित समाधानों से सम्बन्धित हरित पहलों के लिये समर्थन में पिछले दो दशकों में वृद्धि हुई है.

इन चार कोषों के ज़रिये जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिये कुल निवेश को 94 अरब डॉलर आंका गया है. लेकिन फ़िलहाल 12 अरब डॉलर को ही प्रकृति-आधारित समाधानों पर ख़र्च किया गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के ज़रिये जलवायु परिवर्तन के प्रभावों व उसकी क़ीमतों को कम किया जा सकता है. 

यूएन एजेंसी ने सभी देशों से आग्रह किया है कि दिसम्बर 2020 में जारी Emissions Gap Report में जिन उपायों का ज़िक्र किया गया है उन्हें अपनाया जाना होगा. 

उस रिपोर्ट में महामारी के बाद हरित पुनर्बहाली की पुकार लगाई गई थी और राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं में नैट कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का संकल्प लेने का आहवान किया गया है. 

 

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