कोविड-19 से हरित पुनर्बहाली, कर सकती है जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार धीमी

9 दिसम्बर 2020

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोनावायरस महामारी के परिणामस्वरूप, वैश्विक स्तर पर कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन में कुछ संक्षिप्त गिरावट आने के बावजूद, हालात, इस सदी के अन्त तक, वैश्विक तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की तरफ़ जाते नज़र आ रहे हैं. 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की बुधवार को प्रकाशित एक नई रिपोर्ट -  में हालाँकि ये भी कहा गया है कि अगर मज़बूत और त्वरित जलवायु कार्रवाई की जाए, तो तापमान वृद्धि के रास्ते को बदला जा सकता है. इस रिपोर्ट का नाम है - उत्सर्जन अन्तर रिपोर्ट 2020.

रिपोर्ट में, कोविड-19 महामारी से उबरने के प्रयासों के तहत, जलवायु कार्रवाई में भी तुरन्त संसाधन निवेश करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है. ऐसा करके दुनिया को पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्यों की प्राप्ति के नज़दीक लाया जा सकता है जिसमें तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस के नीचे रखने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है.

यूएन पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक इन्गेर एण्डरस ने ज़ोर देकर कहा है कि अगर सही मायनों में, महामारी से उबरने के प्रयासों को हरित बनाया जाए तो, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती की जा सकती है, और अन्ततः जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार भी धीमी पड़ सकती है.

उन्होंने तमाम देशों की सरकारों का आहवान करते हुए कहा कि वो कोविड-19 महामारी से उबरने के प्रयासों के अगले चरण में वित्तीय निर्णयों को हरित केन्द्रित रखें और वर्ष 2021 में अपनी जलवायु महत्वाकाँक्षाओं में उल्लेखनीय स्तर पर इज़ाफ़ा करें.

कथनी को करनी में बदलें

रिपोर्ट के अनुसार, हरित पुनर्बहाली, वर्ष 2030 तक अपेक्षित कार्बन उत्सर्जन में, 25 प्रतिशत तक की कटौती करने में मदद कर सकती है, और तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस के नीचे रखने की सम्भावनाओं को बल मिल सकता है.

बांग्लादेश के एक पूर्वी इलाक़े में एक ईंट भट्टे की चिमनी से निकलता काला धुँआ. इस भट्टे में, ईंटें पकाने के लिये कोयले का इस्तेमाल होता है.
UNICEF/Shehzad Noorani
बांग्लादेश के एक पूर्वी इलाक़े में एक ईंट भट्टे की चिमनी से निकलता काला धुँआ. इस भट्टे में, ईंटें पकाने के लिये कोयले का इस्तेमाल होता है.

शून्य कार्बन टैक्नॉलॉजी और ढाँचे, जीवाश्म ईंधन पर दी जाने वाली सब्सिडी कम करने, कोयले से चलने वाले नए कारख़ानों पर रोक लगाने, और प्रकृति आधारित समाधानों को बढ़ावा देने जैसे उपायों को प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिये.

रिपोर्ट में यह भी ज़िक्र किया गया है कि इस सदी के मध्य तक, शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित वाले देशों की बढ़ती संख्या, एक महत्वपूर्ण और प्रोत्साहन वाला घटनाक्रम है.

“अभी तक लगभग 126 देश नैट-ज़ीरो हासिल करने का या तो संकल्प व्यक्त कर चुके हैं, या उसकी घोषणा कर चुके हैं या कुछ देश अभी इस पर विचार कर रहे हैं. ये देश वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन की 51 प्रतिशत मात्रा के लिये ज़िम्मेदार हैं.” 

उपभोक्ता आदतें, परिवहन सैक्टर

प्रत्येक वर्ष जारी होने वाली उत्सर्जन अन्तर रिपोर्ट कुछ ख़ास क्षेत्रों की सम्भावनाओं पर नज़र डालती है. इस वर्ष रिपोर्ट का मुख्य ध्यान उपभोक्ताओं की आदतों के साथ-साथ जहाज़रानी और नागरिक उड्डयन (हवाई परिवहन) क्षेत्र रहे हैं.

रिपोर्ट में पाया गया है कि जहाज़रानी और नागरिक उड्डटन टैक्नॉलॉजी और उनके संचालन में बेहतरी लाकर, ईंधन किफ़ायत को भी बेहतर बनाया जा सकता है.

अलबत्ता, लगातार बढ़ती माँग के कारण, इन क्षेत्रों को जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से, तेज़ी से हटाकर कार्बन उत्सर्जन में बहुत बड़ी कटौती का लक्ष्य हासिल करना भी बहुत ज़रूरी है.

रिपोर्ट में ये भी पुष्टि की गई है कि दुनिया भर में, सबसे ज़्यादा अमीर केवल 1 प्रतिशत आबादी, निर्धनतम 50 प्रतिशत आबादी द्वारा किये जाने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन की तुलना में, दोगुने कार्बन उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार है. 

रिपोर्ट कहती है कि कार्बन उत्सर्जन की सबसे ज़्यादा मात्रा के लिये जिम्मेदार शीर्ष पायदान पर मौजूद देशों और आबादियों को, पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्यों की राह पर बने रहने के लिये, अपनी सामूहिक कार्बन मौजूदगी को 30 बिन्दुओं तक कम करना होगा.

इसी तरह से, निजी क्षेत्र और व्यक्तियों द्वारा अपने उपभोक्ता बर्तावों में, बदलाव लाकर, जलवायु कार्रवाई को मज़बूत करने में मदद की जा सकती है.

इनमें, घरेलू स्तर कम दूरी की विमान उड़ानों के बदले रेल यात्राएँ करना, साइकिल का प्रयोग बढ़ाना, कार यात्राएँ साझा करना, घरों को ज़्यादा ऊर्जा किफ़ायती बनाना, और भोजन की बर्बादी कम करना, जैसे क़दम शामिल हैं.

 

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