म्याँमार  में ‘शान्तिपूर्ण, व्यवस्थित व विश्वसनीय’ चुनावों की पुकार 

6 नवंबर 2020

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने म्याँमार में 8 नवम्बर को होने वाले चुनाव को स्थानीय जनता के लिये एक अहम पड़ाव बताते हुए उम्मीद ज़ाहिर की है कि इससे देश में समावेशी टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी. यूएन प्रमुख ने भरोसा जताया है कि सफलतापूर्वक चुनाव सम्पन्न होने से रोहिंज्या शरणार्थियों की सुरक्षित और गरिमामय ढँग से वापसी का रास्ता सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी. 

महासचिव गुटेरेश ने शुक्रवार को एक बयान जारी करके ध्यान दिलाया है कि म्याँमार में शान्तिपूर्ण, व्यवस्थित और विश्वसनीय चुनाव सुनिश्चित किया जाना अहम है और देश में घटनाक्रम पर उनकी नज़र बनी रहेगी. 

यूएन प्रमुख ने चुनावों को म्याँमार के लिये एक ऐसा अवसर बताया है जिससे समावेशी टिकाऊ विकास, मानवीय राहत कार्रवाई, मानवाधिकारों और लोकतान्त्रिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिलेगी. 

साथ ही इससे सैन्य तन्त्र पर नागरिकों का नियन्त्रण होगा.

महासचिव गुटेरेश ने उम्मीद जताई है कि इससे देश में शरणार्थियों के सुरक्षित व गरिमामय ढँग से वापिस लौटने का मार्ग भी प्रशस्त हो सकेगा.  

एंतोनियो गुटेरेश के मुताबिक म्याँमार की जनता के लिये यह एक अहम पड़ाव है और गरिमा व शान्ति की उनकी तलाश में हरसम्भव मदद प्रदान करने के लिये संयुक्त राष्ट्र उनके साथ है. 

यूएन महासचिव ने देश भर में युद्धविराम स्थापित किये जाने की अपनी पुकार को नए सिरे से दोहराया है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा है कि इससे सभी पक्षों को कोविड-19 महामारी से निपटने के प्रयासों पर ध्यान केन्द्रित करना सम्भव होगा. 

म्याँमार के अनेक इलाक़ों के सशस्त्र संघर्ष की चपेट में बने रहने पर उन्होंने चिन्ता जताई है. विशेष रूप से राख़ीन और चिन प्रान्तों में जहाँ झड़पें तेज़ हो रही हैं और जिसका ख़ामियाज़ा निर्बल नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है. 

महासचिव ने सभी युद्धरत पक्षों से अन्तरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के तहत अपने दायित्वों का निर्वहन करने और नागरिकों व नागरिक प्रतिष्ठानों की रक्षा करने का आग्रह किया है. 

उन्होंने ध्यान दिलाया है कि संयुक्त राष्ट्र और साझीदार संगठनों को निर्बाध रूप से मानवीय राहत पहुँचाने देने का रास्ता खुला रखना अहम होगा. 

मानवाधिकारों पर पाबन्दियाँ चिन्ताजनक

म्याँमार में 8 नवम्बर को आम चुनाव होने हैं लेकिन देश में मानवाधिकारों की स्थिति पर यूएन मानवाधिकार विशेषज्ञ, हाल के दिनों में अपनी चिन्ता ज़ाहिर कर चुके हैं. 

म्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर यूएन के विशेष रैपोर्टेयर थॉमस एण्ड्रयूज़ ने सोमवार को एक बयान जारी करके 'लोकतन्त्र की जीवन रेखा' समझे जाने वाले अधिकारों पर पाबन्दियाँ लगाए जाने के आरोप बढ़ने पर चिन्ता जताई और पत्रकारों व छात्र प्रदर्शनकारियों समेत विरोधी गुटों के समर्थकों का उत्पीड़न रोकने का आग्रह किया. 

उन्होंने कहा कि स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव तब तक सम्भव नहीं होंगे जब तक ऐसे क़ानूनों को लागू करना जारी रहेगा जिनसे लोकतन्त्र की मूल भावना कमज़ोर होती हो, और नस्ल, जातीयता व धर्म के आधार पर मताधिकार को नकारा जाए, जैसेकि रोहिंज्या लोगों के साथ हो रहा है.

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स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने चिन्ता जताई कि म्याँमार की सेना, वर्ष 1861 में ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित दण्ड संहिता का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आज़ादी के बुनियादी अधिकार का उपयोग कर रहे पत्रकारों, छात्रों और अन्य कार्यकर्ताओं को जेल में बन्द करने के लिये कर रही है.

ग़ौरतलब है कि कोविड-19 महामारी के ऐहतियाती उपायों के मद्देनज़र लगाई गई पाबन्दियों के कारण चुनाव में उम्मीदवारों के पास मतदाताओं तक अपनी आवाज़ पहुँचाने के सीमित विकल्प हैं.  

“मैंने विरोधी राजनैतिक पार्टियों से सुना है कि उन्हें सरकारी मीडिया तक नहीं पहुँचने दिया जा रहा है और सरकारी नीतियों की आलोचना करने वाले उनके सन्देशों के प्रसारण पर रोक लगाई जा रही है.”

उन्होंने कहा कि यह स्थिति अनुचित है और मतदाताओं तक ऐसी जानकारियाँ पहुँचने से रोकती है जो हासिल करना, चुनाव के दिन मतदान करने में सही फ़ैसला करने के लिये आवश्यक है.  

यूएन विशेषज्ञ ने संघीय चुनाव आयोग के उस मतदाता सूचना ऐप की भी आलोचना की है जिसमें उम्मीदवारों की नस्ल व धर्म सम्बन्धी जानकारी उपलब्ध कराई गई है और रोहिंज्या उम्मीदवारों के लिये अनादरपूर्ण ढँग से ‘बंगाली’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है.

 

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