मृत जन्म: ग़ैर-ज़रूरी, अत्यन्त गहरे व ख़ामोश दर्द भरी मुसीबत

8 अक्टूबर 2020

संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में हर 16 सेकण्ड में एक मृत बच्चे का जन्म (Stillbirth) होता है जिसका मतलब है कि साल भर में लगभग 20 लाख बच्चे ऐसे पैदा होते हैं जो इस दुनिया में आने के बाद अपनी ज़िन्दगी की पहली साँस शुरू ही नहीं कर पाते हैं. 

ये रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), विश्व बैंक (World Bank) और संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक व सामाजिक मामलों के विभाग (DESA) ने संयुक्त रूप से तैयार की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मृत जन्म के लगभग 84 प्रतिशत मामले निम्न व मध्यम आय वाले देशों में होते हैं.

अपनी तरह के पहले इस संयुक्त वैश्विक अनुमान में ये भी ध्यान दिलाया गया है कि मृत जन्म उच्च आमदनी वाले देशों के लिये भी एक चुनौती बना हुआ है, जहाँ माँ का शिक्षा स्तर असमानता का एक प्रमुख कारण है. जातीय अल्पसंख्यकों को गुणवत्ता वाली पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल का भी अभाव हो सकता है.

यूनीसेफ़ की कार्यकारी निदेशक, हैनरिएटा फ़ोर का कहना है, “अपने बच्चे को जन्म के समय या गर्भावस्था के दौरान खो देना परिवार के लिये बहुत भारी मुसीबत होती है, ऐसी मुसीबत जिसे ख़ामोश रहकर ही सहन किया जाता है, लेकिन दुनिया भर में ये मुसीबत बहुत जल्दी-जल्दी और बार-बार होती है.”

कोविड कारक

रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के कारण मृत जन्म के मामलों में और बढ़ोत्तरी होने की सम्भावना है.

जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग सार्वजनिक स्वास्थ्य स्कूल द्वारा तैयार इस रिपोर्ट के लिये जुटाए गए आँकड़ों के अनुसार महामारी के कारण स्वास्थ्य सेवाओं में 50 प्रतिशत तक की कमी हो गई है जिसके कारण 117 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 12 महीनों के दौरान मृत प्रसव के लगभग दो लाख अतिरिक्त मामले हो सकते हैं.

विश्व बैंक में स्वास्थ्य, पोषण और जनसंख्या मामलों के वैश्विक निदेशक, और महिलाओं, बच्चों व किशोरों के लिये वैश्विक वित्तीय सुविदा के निदेशक मुहम्मद अली पाटे का कहना है, “कोविड-19 के कारण जीवनदायी स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवधान पैदा होने के कारण महिलाओं, बच्चों और किशोरों के लिये एक दूसरे विनाशकारी स्वास्थ्य संकट की स्थिति बन गई है.”

रिपोर्ट कहती है कि गर्भावस्था और प्रसव के दौरान मिलने वाली अपर्याप्त व ख़राब स्वास्थ्य देखभाल, जच्चा-बच्चा सेवाओं के अभाव और कमज़ोर नर्सिंग व दाइयों की कम संख्या होने जैसे कारण ज़िम्मेदार हैं.

© UNICEF/Loulou d’Aki
फ़लस्तीनी क्षेत्र ग़ाज़ा में मृत प्रसव के बाद स्वास्थ्य लाभ करते हुए एक महिला

हैनरिएटा फ़ोर ने कहा, “एक जीवन खो देने से भी परे, महिलाओं, परिवारों और समाजों के लिये मनोवैज्ञानिक और वित्तीय नुक़सान बहुत गहरा और दीर्घकालीन होता है."

"मृत जन्म के शिकार बहुत से बच्चों को समुचित स्वास्थ्य देखभाल और उच्च गुणवत्ता वाली निगरानी, जच्चा-बच्चा की सटीक देखभाल और कुशल हाथों से प्रसव कराने से बचाया जा सकता है.” 

सामाजिक व आर्थिक कड़ी

रिपोर्ट में कहा गया है कि लेकिन, कोविड-19 महामारी शुरू होने से पहले भी निम्न व मध्यम आय वाले देशों में मृत प्रसव को बचाने के लिये बहुत कम महिलाओं को ही समय पर, और उच्च गुणवत्ता वाली जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य सेवाएँ मिल पाती थीं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टैड्रॉस एडेनहॉम घेबरेयेसस का कहना है, “शिशु का दुनिया में आगमन हर्षोउल्लास का अवसर होना चाहिये, लेकिन हर दिन हज़ारों माता-पिता को असहनीय दर्द का अनुभव करना पड़ता है क्योंकि दुनिया में आकर साँस लेने से पहले ही उनके बच्चों की मौत हो जाती है.”

समुचित संसाधन निवेश की ज़रूरत

रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2000 से लेकर 2019 के बीच स्वास्थ्य सेवाओं में अच्छी प्रगति होने के बावजूद, मृत जन्म के मामलों में केवल 2.3 प्रतिशत कमी दर्ज की गई.

अलबत्ता रिपोर्ट ये भी कहती है कि गुणवत्ता वाली नीतियों, कार्यक्रमों और संसाधन निवेश के ज़रिये प्रगति सम्भव है. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के प्रमुख का कहना है, “मृत जन्म की त्रासदी ने दिखाया है कि आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ बनाए रखना और उनमें बेहतरी लाना कितना अहम और ज़रूरी है, साथ ही नर्सों और दाइयों में संसाधन निवेश करना भी कितना महत्वपूर्ण है.”

डॉक्टर मुहम्मद अली पाटे का कहना है कि चूँकि गर्भवती महिलाओं को पूरी गर्भावस्था व प्रसव के दौरान गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य देखभाल की लगातार ज़रूरत होती है, “हम मृत जन्म रोकने के लिये सक्षम स्वास्थ्य प्रणालियाँ मज़बूत करने के लिये देशों को सहायता व समर्थन दे रहे हैं. इसमें हर एक गर्भवती महिला के लिये गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित किया जाना भी शामिल है.”

 

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स्वास्थ्य संकट में जच्चा-बच्चा के लिए गंभीर जोखिम

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने अनुमान ज़ाहिर किया है कि कोविड-19 महामारी शुरू होने के बाद से अब तक लगभग 11 करोड़ 60 लाख बच्चों का जन्म हुआ है. संगठन ने इस संदर्भ में तमाम देशों की सरकारों से गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए जीवनदायी सेवाओं का संचालन सुनिश्चित करने का आहवान किया है क्योंकि उनके लिए पहले से ही दबाव में काम कर रही स्वास्थ्य सेवाओं और बाधित आपूर्ति श्रंखला के माहौल में ज़्यादा ख़तरा दरपेश है.

भारी-भरकम ख़र्च से जच्चा-बच्चा को है गंभीर ख़तरा

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – यूनीसेफ़ ने कहा है कि बहुत महंगी स्वास्थ्य सेवाओं और देखभाल की वजह से बहुत सी महिलाओं को बच्चे को जन्म देने से पहले और बाद में अक्सर जच्चा-बच्चा दोनों का ही जीवन ख़तरे में डालना पड़ता है. यूनीसेफ़ ने मंगलवार को एक रिपोर्ट जारी है जिसमें बताया गया है कि बहुत सी गर्भवती महिलाओं को आवश्यकता पड़ने पर ना तो कोई डॉक्टर मिलता है और ना ही कोई नर्स या दाई उपलब्ध होती है.