मानव तस्करी और जबरन विवाह के बीच सम्बन्ध दर्शाती एक रिपोर्ट

8 अक्टूबर 2020

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में 12 वर्ष तक की लड़कियों का जबरन या धोखे से विवाह ऐसे लोगों के साथ कराया जा रहा है जो यौन सम्बन्धों और घरेलू कार्य के लिये उनका शोषण करते हैं. मादक पदार्थों एवँ अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNODC) की एक नई रिपोर्ट में जबरन विवाह और मानव तस्करी के बीच सम्बन्ध की पड़ताल की गई है, जिसके मामलों की वास्तविक संख्या पूरी तरह सामने नहीं आ पाती.

यूएन एजेंसी द्वारा प्रकाशित नई रिपोर्ट में मानव तस्करी और जबरन विवाह कराए जाने के बीच आपसी सम्बन्ध को दर्शाया गया है. साथ ही सरकारों व प्रशासनिक एजेंसियों को इस समस्या से निपटने के लिये उपायों का भी विवरण दिया गया है.

यूएनओडीसी कार्यालय में मानव तस्करी और प्रवासी तस्करी विभाग में अधिकारी और लेखक सिल्के एलबर्ट ने बताया कि यह ऐसी पहली रिपोर्ट है जिसमें इस मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उन अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनी दायित्वों के नज़रिये से देखा गया है जिनके निर्वहन की ज़िम्मेदारी देशों पर है.

इस अध्ययन में एक वर्ष की अवधि में दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित 9 देशों - कैनेडा, जर्मनी, जॉर्डन, किर्गिज़स्तान, मलावी, सर्बिया, दक्षिण अफ़्रीका, थाईलैण्ड और वियतनाम - में शोध कार्य किया गया.

इस प्रक्रिया में विशेषज्ञों ने उन वकीलों, सरकारी अधिकारियों, ग़ैरसरकारी संगठनों और पुलिस अधिकारियों समेत क़रीब 150 लोगों से बातचीत भी की जो मानव तस्करी के पीड़ितों के सम्पर्क में आते हैं.

यूएन एजेंसी की शोध अधिकारी तेजल जसरानी ने बताया कि, "वैसे तो विवाह के उद्देश्य से तस्करी विश्व भर में होती है, लेकिन जिस तरह से यह अपराध विभिन्न देशों में किया जाता है, वो विशिष्ट सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक-आर्थिक कारणों पर निर्भर करता है."

वित्तीय फ़ायदे के लिये जबरन रिश्ता

रिपोर्ट के मुताबिक विवाह के उद्देश्य से तस्करी के अधिकाँश मामलों में पीड़ित युवा लड़कियाँ होती हैं जिनमें से बड़ी संख्या में पीड़ित वंचित परिवारों से सम्बन्ध रखती हैं.

शोधकर्ताओं ने पाया कि इन शादियों की व्यवस्था वित्तीय लाभ की मंशा से परिजनों, वैवाहिक एजेंसियों और दलालों द्वारा भी की जा सकती है. कुछ मामलों में वधुओं को अगवा कर लिया जाता है.

पीड़ितों की सहमति हासिल करने के लिये उन पर दबाव डाला जाता है और धोखाधड़ी, उपहार, शोषण सहित अन्य हथकण्डे भी अपनाए जाते हैं.

इन कारणों से जबरन रिश्तों में फँस जाने वाली महिलाएँ व लड़कियों को हिंसा, दुर्व्यवहार, आवाजाही की पाबन्दियों और अपने अभिभावकों व मित्रों से अलग रहने के लिये मजबूर होना पड़ता है.

रिपोर्ट दर्शाती है कि उम्र, समाज में दर्जे, शिक्षा के अभाव और बेरोज़गारी जैसी वजहों से महिलाओं के शोषण व दुर्व्यवहार का शिकार बनने का जोखिम ज़्यादा होता है.

रिपोर्ट के मुताबिक मानव तस्करी के हर चरण को विवाह से जोड़ा जा सकता है – पीड़ितों को शिकार बनाने की शुरुआत से लेकर उन्हें तयशुदा स्थान भेजे जाने तक.

तस्करी के अन्य रूपों की तरह, बेहद कम संख्या में मामले ही पुलिस तक पहुँच पाते हैं और कम ही लोगों को सज़ा मिल पाती है.

कथित कलंक के भय के कारण आमतौर पर महिलाओं व लड़कियों के लिये मदद हासिल कर पाना एक मुश्किल अनुभव होता है.

सिल्के अलबर्ट के मुताबिक विवाह को आम तौर पर एक निजी, पारिवारिक मामला समझा जाता है और उस पर घरेलू हिंसा या दुर्व्यवहार के मामलों के बाद भी चर्चा नहीं होती.

इसके अलावा पीड़ितों को भी अपने बच्चों के भविष्य, देश में रहने की अनुमति जैसी बातों की चिन्ता रहती है.

कार्रवाई के औज़ार

ताज़ा रिपोर्ट में इस चुनौती से निपटने के लिये नीतिगत उपाय भी पेश किये गए हैं जिनका उद्देश्य विवाह से सम्बन्धित मानव तस्करी के मामलों की रोकथाम करना, पीड़ितों की शिनाख़्त व उनकी रक्षा करना और दोषियों की जवाबदेही तय करना है.

विशेषज्ञ सिल्के एलबर्ट का मानना है कि आम तौर पर मानव तस्करी के पीड़ितों की पर्याप्त रूप से शिनाख़्त नहीं हो पा रही है और ना ही उन्हें ज़रूरी सहायता मिल पा रही है.

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"इसलिये जब विवाह के सन्दर्भ में यह अपराध होता है, जो स्थानीय परम्पराओं, धार्मिक व सामाजिक ढाँचों में इतनी गहराई से समाया है, तो शिनाख़्त व जाँच और भी ज़्यादा जटिल हो जाती है."

यूएन एजेंसी ने उम्मीद जताई है कि सरकारों द्वारा इस रिपोर्ट का उपयोग राष्ट्रीय जवाबी कार्रवाई को विकसित करने में किया जायेगा.

साथ ही इससे पुलिस व आव्रजन अधिकारियों, स्वास्थ्य एजेंसियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को मदद मिलेगी.

रिपोर्ट में वकीलों, अभियोजकों और न्यायधीशों के लिये अन्तरराष्ट्रीय सन्धियों व क़ानूनों का भी ब्यौरा दिया गया है और पीड़ितों के अधिकारों के प्रति देशों के क़ानूनी दायित्व का भी उल्लेख है.

 

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