कोविड-19: ओड़ीशा में आदिवासी छात्रों की शिक्षा के लिये एक नवीन पहल

5 अक्टूबर 2020

कोविड-19 महामारी के कारण दुनियाभर में स्कूल बन्द होने से करोड़ों छात्रों की शिक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ा – ख़ासतौर पर कमज़ोर समुदायों के बच्चों पर इसकी दोहरी मार पड़ी है और तकनीक तक पहुँच न होने के कारण वो दूरस्थ शिक्षा के लाभ से भी वंचित रहे हैं. वंचित समुदायों के बच्चों तक शिक्षा साधन पहुँचाने के इरादे से, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने भारत सरकार के साथ मिलकर, एक अभिनव शिक्षण कार्यक्रम शुरू किया है. शिक्षकों के उत्साह से सफल हुए नवीन शिक्षण कार्यक्रम की एक प्रेरक कहानी, विश्व शिक्षक दिवस पर.

14 वर्षीय तपोई मलिक के लिये, स्कूल जाना बहुत बड़ी बात है. उसके माता-पिता ने ख़ुद भी कभी स्कूली शिक्षा हासिल नहीं की थी. तपोई तीन बच्चों में सबसे छोटी हैं. उससे बड़े दोनों भाई-बहनों ने, हाई स्कूल ख़त्म करने से पहले ही स्कूल छोड़ दिया था.

ओड़िशा में आदिवासी समुदाय के बच्चों के स्कूल छोड़ने की संख्या काफ़ी ज़्यादा है, और 50% लड़कियों की कम उम्र में ही शादी कर दी जाती है.

तपोई बताती है, "मेरे भाई ने स्कूल जाना बन्द कर दिया क्योंकि उसे खेतों में मेरे पिता की मदद करनी थी, व मेरी बहन ने स्कूल इसलिये छोड़ दिया क्योंकि उसकी शादी हो गई और वो काम करने के लिये बाहर शहर चली गई.”

उसने बताया, “लेकिन मुझे पढ़ाई करना पसन्द है और मैं इसे जारी रखना चाहती हूँ." 

ओड़िशा के नयागढ़ ज़िले में आदिवासी और पिछड़े समुदायों के बच्चों के दस्पल्ला उच्च प्राथमिक विद्यालय में कक्षा 9 की छात्रा, तपोई को गणित, विज्ञान और ओड़िया विषय में बहुत रुचि है. 

तालाबन्दी का असर

मार्च के अन्त में जैसे ही स्कूल बन्द हुए और बच्चों को घर भेजा गया, तो शुरू में तो तपोई को बहुत मज़ा आया. “मैंने सोचा था कि हम एक महीने के बाद वापस स्कूल जाएँगे. लेकिन जब तालाबन्दी जारी रही, तो मुझे परेशानी होने लगी. मुझे अपने दोस्तों, अपने पाठों और अपने शिक्षकों की याद आने लगी."

"एक चीज़ जो मुझे सबसे ज्यादा पसन्द है वो है पढ़ाई, लेकिन घर पर मेरे पाठों में मेरी मदद करने के लिये किसी के उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में, मैं नए विषय नहीं सीख पा रही थी.”

फिर भी, तपोई ने स्कूल में पहले पढ़ाए गए पाठ्यक्रम का अभ्यास जारी रखा. “मैंने जो कुछ भी सीखा था, उसका अभ्यास करती रही. मेरे लिए अपनी किताबों और पुस्तिकाओं के साथ कुछ समय बिताना बहुत महत्वपूर्ण था.”

घर-घर जाकर शिक्षा

UNICEF India
शिक्षक गाँव-गाँव जाकर, सामाजिक दूरी का पालन करते हुए, वंचित बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं.

तपोई को तब बेहद ख़ुशी हुई जब उसे एक पड़ोसी ने बताया कि अब एक शिक्षक गाँव आकर आदिवासी स्कूल के सभी बच्चों को पढ़ाएँगे. शिक्षकों द्वारा घर-घर जाकर पढ़ाई कराने की इस योजना को ओड़ीशा सरकार के अनुसूचित जाति और जनजाति विभाग की एक अनूठी पहल के ज़रिये सम्भव बनाया गया है.

महामारी के दौरान शिक्षा को वंचित बच्चों तक पहुँचाने का यह कार्यक्रम - वैकल्पिक दिग्दर्शक व शिक्षा कार्यक्रम (ऑल्टरनेटिव मैण्टोरशिप एण्ड लर्निंग प्रोग्राम -ALMP) - यूनीसेफ़ के सहयोग से तैयार किया गया. 

तपोई बताती हैं, "जब से शिक्षक ने मेरे गाँव आना शुरू किया, तब से मैंने एक भी क्लास नहीं छोड़ी. मैं उनसे सवाल पूछ सकती हूँ और उनकी मदद से कठिन विषय समझ सकती हूँ.

बड़ी होकर तपोई पुलिस बल में शामिल होना चाहती है, लेकिन फ़िलहाल उसका एकमात्र सपना अपनी पढ़ाई जारी रखना हैं क्योंकि वो जानती है कि उसके समुदाय की लड़कियों की यह आकाँक्षा अक्सर अधूरी रह जाती है.

वह अपनी कक्षाओं और पढ़ाई के लिये पर्याप्त समय निकालने के लिये कड़ी मेहनत करती है. “मैं रोज़ाना सुबह 4 बजे उठती हूँ. फिर खाना पकाने, सफ़ाई और घर के काम में अपनी माँ का हाथ बँटाती हूँ. एक बार जब मैं अपना काम पूरा कर लेती हूँ, तब पढ़ाई करने बैठती हूँ.

तपोई के गाँव की कक्षा में लगभग 13 छात्र हैं. पाठ्यक्रम के साथ छात्रों को पौष्टिक भोजन और शारीरिक व्यायाम के ज़रिये स्वस्थ रहने, सुरक्षित ऑनलाइन और स्वच्छता व्यवहार के बारे में भी सिखाया जाता है. ओड़ीशा के सभी 30 ज़िलों में लागू, ALMP ने 4 हज़ार 700 शिक्षकों की सेवाएँ मुहैया करवाकर, अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति समुदायों के 3 लाख बच्चों तक शिक्षा की पहुँच मुमकिन की है.

सर्वेक्षण के परिणाम

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सभी बच्चों को हाथ धोने जैसे एहतियाती उपायों पर भी जानकारी दी जा रही है.

हाल ही में हुए इस कार्यक्रम के आकलन में बच्चों के लिये इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं. कक्षा 10 और 12 के लगभग सभी छात्रों (96%) ने कहा कि इन कक्षाओं व सत्रों से उन्हें स्व-नियामक तरीक़े से पढ़ाई जारी रखने में मदद मिली है.

छात्रों का यह भी कहना है कि सत्रों से शिक्षकों के साथ एक अच्छा तालमेल स्थापित करने में मदद मिली और उनके आत्मविश्वास का स्तर भी बढ़ा.

अभिभावकों ने भी अपने बच्चों के लिये पहल को उपयोगी पाया है और विश्वास व्यक्त किया है कि स्कूल दोबारा खुलने पर उनके बच्चे एक बार फिर नियमित कक्षाओं में आसानी से ढल जाएँगे. 

शिक्षकों का नज़रिया

सर्वेक्षण में पाया गया कि अधिकाँश शिक्षक इस पहल के तौर-तरीक़ों और उद्देश्यों को समझते थे, हालाँकि अनेक शिक्षकों के मुताबिक इण्टरनैट कनेक्टिविटी की कमी और स्मार्ट फोन तक पहुँच नहीं होना, एक बड़ी चुनौती है क्योंकि शिक्षण संसाधन और पाठ योजनाएँ ज़्यादातर व्हाट्सएप के माध्यम से वितरित की जाती हैं.

रायगढ़ के शिक्षक द्विती चन्द्र साहू को उनके ज़िले के पाँच गाँवों में बच्चों को पढ़ाने का काम दिया गया है. “शुरू में सभी बच्चे कक्षा में नहीं आ रहे थे. तब मैं उन्हें लाने के लिये उनके घर गया. हमने एक सख़्त सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया. कक्षा शुरू होने से पहले सभी बच्चों को चेहरा ढकने वाला कवर पहनना होता और अपने हाथ साबुन और पानी से धोने थे.”

द्विती चन्द्र साहू सभी बच्चों के लिये शिक्षण संसाधनों के साथ-साथ एक साबुन, ड्राइंग शीट और रंग भी साथ ले जाते. “ये सभी बच्चे पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं. गाँवों में जन्में लगभग सभी लोग अशिक्षित हैं. लेकिन बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों में भी बहुत उत्साह देखने को मिल रहा है."

भविष्य की राह

यूनीसेफ़, भारत सरकार के साथ मिलकर छात्रों, अभिभावकों और समुदाय के सदस्यों के लिये एक संचार योजना पर काम कर रहा है ताकि स्कूल खुलने पर सभी बच्चे वापस स्कूल जा सकें.

यूनीसेफ़ के ओड़िशा कार्यालय की प्रमुख, मोनिका नीलसन कहती हैं, “यह सुनिश्चित करना बहुत महत्वपूर्ण है कि स्कूल बन्द रहने के बावजूद भी बच्चे सीखते रहें. ALMP पहल सरकार द्वारा ओड़िशा के सबसे अधिक वंचित और कमज़ोर आदिवासी बच्चों तक पहुँचने के लिये एक अभिनव क़दम है."

"एएलएमपी पहल को मज़बूत बनाने के लिये, अब हम अगले चरण पर काम कर रहे हैं. इसके तहत हम माता-पिता और बच्चों को स्कूल फिर शुरू होने पर वापस जाकर पढ़ाई करने में सहयोग देंगे.”

यह लेख पहले यूनीसेफ़ की वेबसाइट पर यहाँ प्रकाशित हो चुका है.

 

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