कोविड-19: दुर्सूचना पर वाजिब चिन्ताएँ सुनी जाएँ और डर दूर किये जाएँ

29 सितम्बर 2020

कोविड-19 महामारी के कारण दुनिया भर में व्याप्त अनिश्चितता, भय और चिन्ता के माहौल में संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ पदाधिकारी दुनिया भर में लोगों की बात सुनने, उनकी चिन्ताओं की वैधता को समझने और ग़लत जानकारी और विज्ञान पर आधारित सटीक सूचना के बीच अन्तर समझने में उनकी मदद करने के लिये तत्पर हैं.

यूएन महासभा की वार्षिक जनरल डिबेट के साथ ही, यूएन न्यूज़ ने संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक संचार विभाग (Department of Global Communications-DGC) की अवर महासचिव मेलिसा फ़्लेमिन्ग और विश्व स्वास्थ्य संगठन में महामारी और व्यापक बीमारियों से सम्बन्धित विभाग की निदेशक डॉक्टर सिल्वी ब्रायण्ड के साथ ख़ास बातचीत की. 

इस संयुक्त इण्टरव्यू में, इन पदाधिकारियों ने इस मुद्दे पर चर्चा की कि संयुक्त राष्ट्र के लिये आम लोगों के साथ खुलकर बातचीत करना और सभी के लिये किफ़ायती और प्रभावी वैक्सीन बनाने के लिये अन्तरराष्ट्रीय प्रयासों की महत्ता उजागर करना कितना महत्वपूर्ण है.

अनेक प्रथम

डॉक्टर ब्रायण्ड ने कहा, “मौजूदा हालात में जो चीज़ कठिन है, वो है, प्रथम, आम लोगों में बीमारी के बारे में बहुत ज़्यादा डर और चिन्ता फैले हुए हैं, साथ ही बहुत अनिश्चितता भी व्याप्त है.”

“ये एक नई बीमारी है. इस महामारी में बहुत सी चीज़ों का सामना पहली बार हुआ है.”

संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक संचार विभाग की अध्यक्ष और अवर महासचिव मेलिसा फ़्लेमिन्ग ने कहा, “दुर्सूचना कोई नई बात नहीं है. जहाँ तक इतिहास में नज़र जाती है, वहाँ भी दुर्सूचना की मौजूदगी नज़र आती है. यहाँ अन्तर ये है कि हम एक महामारी का सामना कर रहे हैं, जो सोशल मीडिया पर भी फैली हुई है.”

संचार आपदा

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने दुर्सूचना और दुष्प्रचार के प्रभाव कम करने के तरीक़ों पर विचार करने के लिये 23 सितम्बर को आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि कोविड-19 केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक आपदा भर नहीं है, बल्कि ये एक संचार आपदा भी है. 

और जैसे-जैसे कोरोनावायरस दुनिया भर में फैला, सोशल मीडिया पर ग़लत जानकारी व ख़तरनाक सन्देशों की भी भरमार हो गई, जिसके कारण लोग भ्रान्ति में पड़े, दिग्भ्रमित हुए और दुर्सूचित हुए.

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डॉक्टर ब्रायण्ड के अनुसार जब लोग चिन्तित व अनिश्चितता से घिरे हुए होते हैं तो वो बहुत सारी चीज़ें अतीत में हुए उनके अनुभवों या पहले से मालूम चीज़ों के साथ जोड़ने के लिये व्याकुल होते हैं.

उन्होंने कहा कि कोविड-19 की वैक्सीन के बारे में अगर बात करें तो, लोग वैक्सीनों के बारे में पहले से ही कुछ धारणाएँ बनाए हुए हैं या उनके दिमाग़ों में वैक्सीनों के बारे में कुछ डर बैठे हुए हैं.

“चूँकि हमारे पास अभी वैक्सीन उपलब्ध नहीं है, इसलिये इस मौजूदा दौर में जो बहुत महत्वपूर्ण है, वो है बहुत खुले संवाद के लिये जगह बनाई जाए. जनसंख्या के साथ दो-तरफ़ा संवाद क़ायम किया जाए ताकि लोगों की चिन्ताओं को सुना और समझा जा सके, व हम जहाँ तक सम्भव हो, उनके सवालों के जवाब पेश कर सकें.”

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मेलिसा फ़्लेमिन्ग ने कहा कि लोगों के डर व चिन्ताएँ वाजिब हैं, “हम उनकी बात सुनना चाहते हैं और हम उनके डर और चिन्ताओं पर ध्यान केन्द्रित करके उन्हें ऐसी जानकारी उपलब्ध कराना चाहते हैं जो उन्हें आसानी से उपलब्ध हो और जिसे वो अच्छी तरह समझ सकें.”

 

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