विकलाँगता की बाधाओं से परे...

21 सितम्बर 2020

भारत, भूटान, मालदीव और श्रीलंका के लिये यूनेस्को के निदेशक और भारत में यूनेस्को के प्रतिनिधि, एरिक फ़ॉल्ट मानते हैं कि विकलाँग समुदाय में असीम क्षमताएँ मौजूद हैं और सही क़दम उठाकर उनसे उचित लाभ उठाया जा सकता है. पढ़िये, एरिक फ़ॉल्ट का ब्लॉग...

"दुनिया में असहिष्णुता और भेदभाव से निपटने, मानव गरिमा व मूल्यों और महिलाओं व पुरुषों के समान अधिकारों में दोबारा विश्वास पैदा करने के लिये लगभग 75 साल पहले, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की स्थापना की गई थी. इसके आधारभूत मूल्यों में निहितार्थ था कि टिकाऊ तरीक़े से जीवन जीने के लिये, हमें सहिष्णुता और समानता के मूल्यों का समर्थन करना होगा. अलबत्ता, अगर संयुक्त राष्ट्र के मूल्यों के प्रति निष्ठा बनाए रखनी है, तो हमें हाशिए पर धकेले हुए समुदायों को विकास की मुख्यधारा में वापस लाना होगा.

विकलाँग व्यक्तियों के अधिकारों की हिमायत के लिये प्रसिद्ध नेत्रहीन गायक, स्टिवी वण्डरने एक बार कहा था कि "आज प्यार को भी प्यार की ज़रूरत है."

उन्होंने विकलाँग समुदाय को समर्थन व सहारा दिये जाने की दलील देते हुए ज़ोर देकर कहा था कि उत्पीड़न के चक्र को तोड़ना बहुत महत्वपूर्ण है. कई साल पहले किये गए समानता के उन वादों को पूरा करने का यह एक आहवान था, जो वादे आज भी अधूरे हैं.

हाल के अनुमानों के आधार पर, दुनिया भर में एक अरब से ज़्यादा लोग विकलाँगता और उससे जुड़े पूर्वाग्रहों का शिकार हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया की लगभग 15% आबादी किसी न किसी तरह की विकलाँगता से पीड़ित है. ये कहना अनुचित नहीं होगा कि विकलाँग लोग सबसे बड़ी वैश्विक अल्पसंख्यक आबादी बन गए हैं. ये आबादी, निरन्तर भेदभाव के कारण शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवा और अन्य अवसरों तक समान पहुँच से वंचित रहती हैं. दरअसल हम जिनकी बात कर रहे हैं वो अप्रयुक्त संसाधनों का एक विशाल भण्डार है, जिन्हें कार्यबल से बाहर कर दिया गया है.

UNESCO
भूटान,भारत,मालदीव और श्रीलंका के लिए यूनेस्को के निदेशक और भारत में यूनेस्को के प्रतिनिधि, एरिक फॉल्ट.

विकलाँग व्यक्तियों से जुड़े पूर्वाग्रह, उनके अधिकारों के बारे में समझ में कमी के कारण, उन्हें ऐसे "उत्कृष्ट कार्य" मिलने में मुश्किल होती है, जिसे मशहूर अर्थशास्त्री, अमर्त्य सेन मानव विकास के लिये आवश्यक क्षमताओं के रूप में परिभाषित करते हैं. इसके अलावा, विकलाँग महिलाओं और लड़कियों को यौन व लिंग-आधारित हिंसा का शिकार बनने का अधिक जोखिम होता है. दुनिया भर में अनुमानित कुल 80% विकलाँग व्यक्तियों में से एक अरब विकासशील देशों में रहते हैं. अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने नवीनतम राष्ट्रीय जनगणना (2011) के आँकड़ों का उपयोग करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत में 73.6% विकलाँग व्यक्ति श्रम बल के बाहर हैं. इनमें भी मानसिक रूप से विकलाँग व्यक्ति, विकलाँग महिलाएँ और ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे विकलाँग सबसे अधिक उपेक्षित हैं.

अत्यधिक पीड़ित समूह

जैसा कि अधिकाँश संकटों में होता है, कोविड-19 महामारी का असर हाशिये पर धकेले हुए समुदायों पर सबसे ज़्यादा पड़ा है. मसलन, विकलाँग छात्रों के लिये डिजिटल मंचों के माध्यम से दूरस्थ शिक्षा प्राप्त करना बेहद कठिन हो रहा है. भारत में यूनेस्को की 2019 की शिक्षा रिपोर्ट (UNESCO's 2019 State of the Education Report of India) में  यह स्वीकार किया गया है कि समावेशी शिक्षा लागू करना बेहद जटिल है और इसके लिये विभिन्न संदर्भों में बच्चों और उनके परिवारों की विविध आवश्यकताओं की एक अच्छी समझ की आवश्यकता है. भारत ने एक मज़बूत क़ानूनी ढाँचा बनाने और स्कूलों में विकलाँग बच्चों की नामाँकन दर में सुधार करने वाले कार्यक्रम बढ़ाने के मामले में काफी प्रगति की है. हालाँकि, एजेण्डा 2030 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये प्रत्येक बच्चे के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के उपायों और विशेष रूप से, टिकाऊ विकास लक्ष्य 4 के उद्देश्यों को हासिल करने के लिये अतिरिक्त क़दम उठाने की आवश्यकता है.

UNESCO ने विश्व स्तर पर ग्लोबल एक्शन ऑन डिसेबिलिटी (GLAD) नैटवर्क के साथ भागीदारी करके, विकलाँगों पर स्कूल बन्द होने के प्रभाव को कम करने के लिये रणनीति बनाने की आवश्यकता के बारे में जागरूकता फैलाई है. इसके अलावा उल्लेखनीय ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ 2020 जारी होने से भी अपार सम्भावनाएँ खुलने का ऐतिहासिक अवसर प्राप्त होने की उम्मीद है.

संगीत के सबसे प्रसिद्ध प्रतीकों में से दो, स्टीवी वण्डर और एण्ड्रिया बोसेली व स्टार इण्डियन पैरा-एथलीट, दीपा मलिक ने पहले ही समावेशन के मानदण्ड शामिल करने की शुरूआत कर दी है. सही निवेश के साथ, भारत में विकलाँग युवा भी देश की सबसे बड़ी सम्पदा हो सकते हैं. 

सभी स्तरों व क्षेत्रों में समावेश लाकर और विकलाँग प्रतिभाओं को शामिल करके, सभी संस्थाएँ नवाचार के ज़रिये वैश्विक समस्याओं से निपट सकती हैं.

विकलाँगता को एक बाधा नहीं, बल्कि समाज में नवाचार के अवसर के रूप में देखना चाहिये जिससे आवश्यक कौशल और प्रतिभा का उपयोग हो सके. विकलाँग व्यक्तियों को, विशेष रूप से युवाओं को, एक ऐसे ‘उन्मादी क्षण’ की ज़रूरत है, जो उन्हें संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास लक्ष्य हासिल करने में सक्रिय भागीदार बनाने के वास्ते सशक्त कर सके.

महामारी ने हमें दिखाया है कि हम तभी तक स्वस्थ हैं, जब तक हमारे पड़ोसी स्वस्थ हैं. इसने असमानता की बड़ी दरारें उजागर कर दी हैं, हमें एक-दूसरे के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों के बारे में सोचने को मजबूर किया है. इस दौर का उपयोग परिवर्तन के लिये एक उत्प्रेरक के रूप में करना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि विकलाँग व्यक्तियों को भी वो सभी मानवाधिकार हासिल हों जो सबके बुनियादी अधिकार हैं."

 

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