कोविड-19: ग़ैर-संचारी रोगों से पीड़ित मरीज़ों के लिये ज़्यादा जोखिम 

4 सितम्बर 2020

संयुक्त राष्ट्र के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा है कि वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण उन बीमारियों के निदान और उपचार में व्यवधान आया है जो घातक हैं लेकिन जिनकी रोकथाम की जा सकती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह (डायबिटीज़) जैसे ग़ैर-संचारी रोगों से निपटने को प्राथमिकता देने के लिये सरकारों का आहवान किया है. हर वर्ष इन बीमारियों के कारण चार करोड़ से ज़्यादा लोगों की मौत होती है. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के मुताबिक कोरोनावायरस संकट के स्वास्थ्य सेवाओं पर गहरा असर होने से पचास फ़ीसदी से ज़्यादा कैंसर मरीज़ प्रभावित हुए हैं. 

यूएन एजेंसी ने ध्यान दिलाते हुए कहा है कि कोविड-19 महामारी ने दिखाया है कि इन रोगों से मुक़ाबला करने में कम ही प्रगति हुई है और अब भी विश्व भर में हर 10 में से सात मौतें इन बीमारियों की वजह से होती हैं. 

संगठन के प्रमुख टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा कि कोरोनावायरस उन लोगों के लिये ज़्यादा जोखिम भरा है जो पहले से ग़ैर-संचारी रोगों से पीड़ित हैं. इन बीमारियों से जूझ रहे मरीज़ों के लिये कोविड-19 का संक्रमण ज़्यादा गम्भीर साबित हो सकता है और इनमें युवा भी शामिल हैं. 

चार प्रमुख ग़ैर-संचारी बीमारियाँ हृदय रोग, कैंसर, डायबिटीज़ और लम्बे समय से चली आ रही श्वसन तन्त्र सम्बन्धी बीमारियाँ हैं. हर वर्ष इन रोगों के कारण चार करोड़ से ज़्यादा लोगों की मौत होती है. 

ताज़ा अध्ययनों के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं में आए व्यवधान की वजह से ग़ैर-संचारी रोगों के निदान व उपचार में 69 फ़ीसदी मामलों में व्यवधान आया है. कैंसर मरीज़ों के लिये हालात ज़्यादा ख़राब हैं और 55 फ़ीसदी मरीज़ों के लिये स्वास्थ्य सेवाएँ प्रभावित हुई हैं. 

यूएन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि एक या उससे ज़्यादा ग़ैर-संचारी रोगों से पीड़ित मरीज़ों को कोरोनावायरस के संक्रमण से गम्भीर रूप से बीमार पड़ने और मौत होने का जोखिम अधिक है. 

डायबिटीज़: एक विकराल चुनौती

मैक्सिको सहित अन्य देशों में हुए शोध दर्शाते हैं कि कोविड-19 बीमारी से होने वाली मौतों में एक अहम वजह संक्रमितों का डायबिटीज़ से पीड़ित होना है. 

इटली के अस्पतालों में जिन लोगों की मौत हुई उनमें 67 फ़ीसदी हायपरटेंशन और 31 फ़ीसदी टाइप-2 डायबिटीज़ से पीड़ित थे.  

इससे चिन्तित यूएन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि दुनिया वर्ष 2030 तक ग़ैर-संचारी रोगों से निपटने के अपने संकल्प से अभी दूर है. टिकाऊ विकास के 2030 एजेण्डा के तहत 70 वर्ष की उम्र से पहले होने वाली मौतों में एक-तिहाई की कमी लाना है. 

डायबिटीज़ के ख़िलाफ़ लड़ाई में महज़ 17 देश महिलाओं के लिये निर्धारित लक्ष्य और 15 देश पुरुषों के लिये निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने के रास्ते पर हैं. 

पिछले 20 वर्षों में 20 करोड़ से ज़्यादा पुरुष और महिलाओं की असामयिक मौत हुई है. 

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यूएन एजेंसी ने आशंका जताई है कि अगले दशक में 15 करोड़ लोगों की ग़ैर-संचारी रोगों के कारण मौत हो सकती है और इसलिये संगठन ने तत्काल कार्रवाई को ज़रूरी बताया है.

विकासशील देशों पर इन बीमारियों का सबसे अधिक बोझ है. फ़िजी और मंगोलिया में किसी व्यक्ति की ग़ैर-संचारी बीमारी के कारण होने वाली मौत की सम्भावना नॉर्वे या जापान की तुलना में तीन गुणा अधिक है. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने कहा है कि कोविड-19 संकट से सीख लेते हुए बेहतर ढँग से उबरना होगा और इस प्रक्रिया में अतीत की व्यवस्था में नहीं लौटा जा सकता. 

इस सिलसिले में ग़ैर-संचारी रोगों के लिये दवाओं, वैक्सीनों, निदानों और रोकथाम के लिये टैक्नॉलॉजी की सार्वभौमिक उपलब्धता को अहम बताया गया है. 

इस बीच यूएन एजेंसी की प्रवक्ता डॉक्टर मार्गरेट हैरिस ने कहा कि कोविड-19 की रोकथाम के लिये वैक्सीन की व्यापक स्तर पर उपलब्धता अगले वर्ष के मध्य तक ही सम्भव हो पाने की उम्मीद है. 

उन्होंने जिनीवा में पत्रकारों को बताया कि अनेक वैक्सीनों का तीसरे चरण में परीक्षण चल रहा है और उनके सुरक्षा प्रोटोकॉल के बारे में पुख़्ता जानकारी मिल पाने में अभी समय लगेगा. उसके बाद ही उन्हें उपयोग में लाने के लिये मंज़ूरी दी जा सकती है. 

जब तक वैक्सीन उपलब्ध नहीं होती, तब तक सभी लोगों से साफ़-सफ़ाई और संक्रमण की रोकथाम के बुनियादी उपाय अपनाते रहने पर ज़ोर दिया गया है. 

 

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