कोविड 19: भारत में यूनीसेफ़ की मदद से बाल-विवाह रुके

27 अगस्त 2020

कोविड-19 महामारी की अप्रत्याशित स्थिति ने बाल अधिकारों को दाँव पर लगा दिया है. मार्च 2020 से महामारी और तालाबन्दी के बाद उपजी विषम स्थिति के दौरान, भारत के बिहार राज्य के महादलित समुदायों में यूनीसेफ़ ने अब तक 25 बाल विवाह रोके हैं. लगभग सभी मामलों में, परिवार और बाल विवाह के सम्भावित शिकार बच्चों को मनोवैज्ञानिक सहायता की गई व उनके परिजनों से बॉन्ड पर हस्ताक्षर कराए गए ताकि वे समय से पहले उन बच्चों की जबरन शादी न कराएँ. संवेदनशीलता के कारण सभी मामलों में दण्डात्मक कार्रवाई रोक दी गई. 

यूनीसेफ़ के हाल ही के एक सर्वेक्षण से यह स्पष्ट है कि कोविड-19 के कारण घरेलू हिंसा की रोकथाम और ज़रूरी सहायता सेवाओं में आए व्यवधान से 100 से ज़्यादा देशों में बच्चे शोषण व दुर्व्यवहार का शिकार होने के जोखिम का सामना कर रहे हैं. आजीविका के नुक़सान ने सबसे कमज़ोर तबके, ख़ासतौर पर लड़कियों और महिलाओं के जीवन में तूफान खड़ा कर दिया है. 

महामारी के कारण अनौपचारिक मदद के नैटवर्क जैसे मित्रों, शिक्षकों, बाल देखभाल कर्मियों, परिवार और समुदाय के अन्य सदस्यों से सम्पर्क कम होने के कारण हालात और ज़्यादा जटिल हो गए हैं. 

इस स्थिति में यूनीसेफ़ सरकारों और साझीदार संगठनों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण सेवाएँ जारी रखने के प्रयासों में जुटा है. महामारी के दौरान बाल-विवाह के मामलों को रोकना भी यूनीसेफ़ के इन्हीं प्रयासों का हिस्सा है.

यूनीसेफ़ ने तालाबन्दी के बाद से केवल बिहार राज्य में ही सरकार और अपनी सहयोगी संस्थाओं के साथ मिलकर 25 नाबालिग़ों को बाल-विवाह के चँगुल में फँसने से रोका है. 

आर्थिक तंगी और महामारी की मार 

यूनीसेफ़ को हाल ही में भारत के बिहार राज्य के गया ज़िले के एक गाँव से ख़बर मिली कि 13 साल की एक लड़की सरिता के माता-पिता ने 25 जून को उसकी शादी तय कर दी है. सरिता माँझी समुदाय से ताल्लुक रखती है, जो बिहार के महादलित समुदायों में से एक है. 

सरिता के माँ-बाप दिहाड़ी मज़दूर हैं और परिवार में दो छोटी बहनें व दो भाई हैं, जिनमें से एक विकलाँग है. सरिता ने पास के सरकारी स्कूल में 5वीं कक्षा तक पढ़ाई की है, लेकिन बाद में स्कूल गाँव से दूर होने के कारण उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. अब वो घर में रहकर छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती है और घर का काम सँभालती है. उसके समुदाय के ज़्यादातर बच्चों (ख़ासकर लड़कियों) के यही हालात हैं.  

आमदनी बन्द होने से झटका 

कोविड की रोकथाम के लिये मार्च में अचानक तालाबन्दी होने से सरिता के माता-पिता को दिहाड़ी मज़दूरी का काम मिलना बन्द हो गया और उनके परिवार की आय का स्रोत बन्द हो गया. 

ऐसे में, उन्होंने पास के गाँव में रहने वाले 20 साल के एक लड़के से सरिता की शादी तय करने की योजना बनाई जो चेन्नई में एक कारखाने में काम करता है, और देश में प्रवासियों के सामूहिक पलायन के दौरान अपने पैतृक गाँव वापस आ गया था. 

UNICEF India

विवाह की तारीख 25 जून 2020 निर्धारित की गई. जब यूनीसेफ़ द्वारा समर्थित - बाल विवाह रोकथाम और किशोर सशक्तिकरण परियोजना के ज़िला समन्वयक, व ऐक्शन एड संस्था के ज़रिये सरिता के विवाह की जानकारी मिली तो तुरन्त कार्रवाई की गई. 

ज़िला और ब्लॉक प्रशासन से सम्पर्क करके बाल विवाह रोका गया और परिवार को बाल-विवाह के ख़तरों के बारे में जानकारी व मनोवैज्ञानिक सलाह (काउंसलिंग) के ज़रिये समझाया गया.

साथ ही, माता-पिता से बॉन्‍ड पर हस्ताक्षर करवाए गए कि वो 18 साल की उम्र के बाद ही बेटियों की शादी करवाएंगँ. 

काउंसलिंग के बाद सरिता की माँ ने कहा, "अगर मुझे बाल विवाह के दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी होती तो मैं अपनी बेटी की शादी कभी तय नहीं करती."

सरिता अब अपने इलाक़े के निकटतम आँगनवाड़ी केन्द्र से जुड़ी हुई है और अपनी बहनों के साथ स्कूल भी जाने लगी है. 

ऐक्शन एड और यूनीसेफ़ की संयुक्त परियोजना से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता, शत्रुघन दास कहते हैं, "इस स्थिति ने हमें बच्चों की जल्दी शादी करने के दुष्प्रभावों के बारे में विस्तार से चर्चा करने का अवसर प्रदान किया. लोग अब जल्दी शादी करने और इससे जुड़ी दण्डात्मक कार्रवाई के परिणामों के बारे में गम्भीरता से सोचने लगे हैं."

बेहतर जीवन की चाह में विद्रोह 

बिहार के ही जहानाबाद ज़िले की लालो कुमारी की कहानी कुछ अलग है – ये एक लड़की के सपनों और आकाँक्षाओं की और उन्हें पूरा करने के उसके संघर्ष की कहानी है. 

एक बेहद कमज़ोर समुदाय की लालो कुमारी पढ़ाई में अव्वल थी और शिक्षा पूरी करके अपना भविष्य संवारना चाहती थी. लेकिन ग़रीब परिवार और रूढ़िवादी समुदाय में जन्म लेने के कारण, महज़ 16 साल की उम्र में लालो कुमारी का बाल-विवाह कर दिया गया. 

शादी के बाद वो गया ज़िले में अपने ससुराल गई और फिर दिन-रात शारीरिक और यौन उत्पीड़न का शिकार होने लगी. 

लेकिन लालो कुमारी को यह मंज़ूर नहीं हुआ और वह ससुराल छोड़कर अपने घर वापस चली गई. लेकिन उसके दुखों का अन्त यहीं नहीं हुआ. उसके परिवार ने उसका साथ देने से इनकार कर दिया और उसपर अपने ससुराल वापस जाने का दबाव बनाने लगे. 

लालो कुमारी बेहतर भविष्य की चाह में थक-हारकर  मुम्बई पहुँच गई, जहाँ एक सामाजिक संस्था ने उसे सहारा दिया. यहाँ रहकर लालो कुमारी ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की. संस्था ने कुछ समय बाद उसके परिवार को समझा-बुझाकर लालो को उनके पास भेज दिया व समय-समय पर उससे सम्पर्क करते रहे.

तालाबन्दी होने पर गतिशीलता और सम्पर्क में कमी आने के कारण ज़्यादातर सामाजिक कार्यकर्ता बच्चों तक नहीं हुँच पा रहे थे. इसी का फ़ायदा उठाकर लालो के परिजन उसे फिर अपने ससुराल जाने के लिये प्रताड़ित करने लगे.

मई 2020 में लालो ने किसी तरह अपनी सलाहकार को फ़ोन करके मदद माँगी.  सलाहकार ने बिहार स्थित यूनीसेफ़ कार्यालय के साथ सम्पर्क किया और यूनीसेफ़ ने स्थानीय पुलिस की मदद से 3-4 घण्टों के अन्दर ही बच्ची को बचाकर निकाल लिया. 

लालो कुमारी अब जहानाबाद की बाल कल्याण समिति के सहयोग से पड़ोसी ज़िले गया के एक बाल-सुरक्षा केन्द्र में ग्यारहवीं की पढ़ाई कर रही है.  

लालो कुमारी कहती है, “मुझे हमेशा लगता था कि मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करनी है. अब जब मेरे पास मौक़ा है, तो मैं कड़ी मेहनत करूँगी और अपने सपने पूरे करूँगी. अब मैं जल्दी शादी करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहती.” 

गया बालिका गृह की अधीक्षक सुमन कहती हैं, “हम लालो कुमारी की आकाँक्षाओं को पूरा करने में पूरा सहयोग करेंगे. अभी उसे किताबें उपलब्ध कराई गई हैं. ज़रूरत पड़ने पर हम कोचिंग में भी मदद करेंगे.”

जहानाबाद की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष बरिन्दर ने कहा, “बाल कल्याण केन्द्र (सीडब्ल्यूसी) लालो कुमारी के बेहतर हितों के लिये काम करने के लिए प्रतिबद्ध है. और अच्छी बात ये है कि हमें इस काम में यूनीसेफ़ का तकनीकी सहयोग मिल रहा है. हमें उम्मीद है कि हम लालो के भविष्य के लिये एक प्रभावी पथ तैयार करने में सक्षम होंगे.”

शिक्षकों की भूमिका

समय-समय पर बाल-विवाह रोकने में शिक्षक बहुत अहम भूमिका निभाते रहे हैं. बिहार के समस्तीपुर ज़िले के गणोपुर गाँव में लगभग 200 दलित परिवार रहते हैं. ग़रीबी और अशिक्षा के कारण इस गाँव में बाल-विवाह बहुत आम बात है. 

UNICEF India/Arvind Kumar
लड़के के परिवार और ग्रामीणों को बाल-विवाह के दुष्परिणामों और इसके ख़िलाफ़ क़ानून के बारे में बताते स्थानीय अधिकारी.

गणोपुर गाँव का ही निवासी है 19 वर्षीय विजय कुमार (पहचान छिपाने के लिये नाम बदल दिया गया है). अजय के पिता एक छोटे खेत के मालिक हैं और उसीपर खेती-बाड़ी ककेर अपना जीवन-यापन करते हैं. परिवार में अजय के अलावा तीन भाई-बहन और हैं - दो छोटे भाई व एक बहन. बहन का पहले ही बाल-विवाह हो चुका है. 

विजय कुमार को परिवार की ज़िम्मेदारी के कारण 9वीं कक्षा तक पढ़ाई के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी. अब वो एक स्थानीय शिक्षक से निजी ट्यूशन पढ़ता है.

पढ़ाई के दौरान विजय के शिक्षक को पता चला कि विजय की शादी 10 मई, 2020 को होने वाली है. ये जानकारी मिलते ही 7 मई को शिक्षक उमेश सिंह ने ब्लॉक और ज़िला समन्वयक को विजय की शादी के बारे में बताया, जिन्होंने यूनीसेफ़ से सम्पर्क किया. 

उस दौरान देश में तालाबन्दी लागू थी और महामारी के कारण आवाजाही प्रतिबंन्धित थी. फिर भी स्थानीय प्रशासन के इशारे पर, पुलिस अधिकारियों के साथ निषेध अधिकारी और यूनीसेफ़ की टीम 8 मई 2020 को गाँव पहुँची और समुदाय के साथ परिवार की काउंसलिंग करके बाल विवाह रूकवाया.

लेकिन 10 मई 2020 को फिर सूचना मिली कि संकल्प लेने के बावजूद विजय का परिवार बाल-विवाह कराने जा रहा है.

यूनीसेफ़ प्रोजेक्ट टीम ने स्थानीय अधिकारी को सूचित किया और  तुरन्त पुलिस टीम गाँव में भेजी गई. एक बार फिर, परिवार और ग्रामीणों को बाल-विवाह के दुष्परिणामों और इसके ख़िलाफ़ क़ानून के बारे में बताया गया. काफी कोशिशों के बाद, शादी पूरी तरह से टल गई. 

विजय कुमार को भी समझाकर पहले पढ़ाई पूरी करने और कौशल विकास पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण लेने के लिये मनाया गया.

लड़के ने सभी प्रमुख हितधारकों के सामने प्रतिज्ञा ली कि वह तब तक शादी नहीं करेगा जब तक वह अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर लेता और आर्थिक रूप से सशक्त नहीं हो जाता.

शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की ज़रूरत

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष - यूनीसेफ़ तालाबन्दी के बाद से ही शोषण के मामलों में वृद्धि को लेकर चिन्तित रहा है. इस तरह की सामाजिक कुप्रथाएँ आज भी बाल अधिकारों के लिये एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं.   

बाल विवाह की समस्या ‘मुसाहर’ जैसे महादलित समुदायों में सबसे ज़्यादा रही है, जो कि सामाजिक रूप से हाशिए पर धकेला हुआ समुदाय है और भारत की जाति व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर होने के कारण सामाजिक पूर्वाग्रहों का सामना करता है.

यह दुर्बल और उत्पीड़ित अनुसूचित जाति भूमिहीन है और इसके सदस्यगण अनौपचारिक या खेत मज़दूर के रूप में काम करके जीवन व्यतीत करते हैं. ग़रीबी और अशिक्षा ने इन समुदायों के बीच बाल विवाह की घटनाओं को बढ़ाने में योगदान दिया है.

भारत में यूनीसेफ़ की प्रतिनिधि, डॉक्टर यासमीन अली हक़ के मुताबिक, "हम जानते हैं कि किसी भी संकट के दौरान, युवा और सबसे कमज़ोर तबके के लोगों पर सबसे अप्रत्याशित मार पड़ती है. इस हिसाब से यह महामारी भी अलग नहीं है. स्कूल बन्द हैं, माता-पिता के पास रोज़गार नहीं हैं और परिवारों पर दबाव बढ़ रहा है."

"ऐसे में ख़ासतौर पर लड़कियों की स्थिति बहुत सम्वेदनशील है और उनके स्कूल छुड़वाने, घरेलू और यौन हिंसा में वृद्धि का सामना करने व बाल विवाह एवं किशोरावस्था में ही गर्भवती होने के जोखिम बढ़ गए हैं."

यूनीसेफ़ के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 21 प्रतिशत युवतियों का विवाह 18 साल की उम्र से पहले ही कर दिया जाता है. मतलब ये कि 18 वर्ष से कम उम्र की लगभग 1 करोड़ 20 लाख नाबालिग़ लड़कियों की शादी हर साल होती है.

आँकड़े बताते हैं कि भारत में बाल-वधुओं की संख्या सबसे ज़्यादा, यानि 22 करोड़ 30 लाख है. यहाँ हर साल लगभग 15 लाख लड़कियों का बाल-विवाह किया जाता है. यूनीसेफ़ के आँकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में पूरे विश्व में 65 करोड़ महिलाएँ ऐसी हैं जो बाल-विवाह का शिकार हुई थीं. 

ऐसे में इस बाल विवाह की रोकथाम के लिये तरह के छोटे-छोटे क़दम भी बड़े बदलाव का सबब बन सकते हैं.

 

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