बेरूत विस्फोट जैसी तबाही दोबारा ना होने देने के उपाय

बेरूत शहर के बन्दरगाह में हुए विस्फोट से शहर के अनेक इलाक़े क्षतिग्रस्त हुए हैं.
WFP/Malak Jaafar
बेरूत शहर के बन्दरगाह में हुए विस्फोट से शहर के अनेक इलाक़े क्षतिग्रस्त हुए हैं.

बेरूत विस्फोट जैसी तबाही दोबारा ना होने देने के उपाय

आर्थिक विकास

लेबनान के बेरूत बन्दरगाह पर 4 अगस्त 2020 को भीषण विस्फोट से हुई भारी तबाही ने ख़तरनाक वस्तुओं के परिवहन और भण्डारण के जोखिमों पर दुनिया भर का ध्यान आकर्षित किया है.  संयुक्त राष्ट्र इस तरह के जोखिम कम करने और लोगों के जीवन की रक्षा करने के लिये अन्तरराष्ट्रीय प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है.

संयुक्त राष्ट्र के कई कार्यालयों और एजेंसियों ने आपदा के बाद आपातकालीन सहायता प्रदान करने और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय  द्वारा राहत अभियान का समन्वय करने के लिये तेज़ी से प्रयास किये.

भारी तबाही के बाद पुनर्निर्माण की लागत कई अरब डॉलर होने का अनुमान जताया गया है.

मानवीय राहत मामलों में समन्वय के लिये संयुक्त राष्ट्र एजेंसी (UNOCHA) के प्रमुख मार्क लॉओकॉक ने दानदाताओं से लेबनान के लोगों के लिये एकजुट कार्रवाई करने का आहवान किया है. 

जोखिम का सामना

संयुक्त राष्ट्र के स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के एक समूह ने विस्फोट के कुछ दिन बाद एक वक्तव्य जारी करके घटना की स्वतन्त्र जाँच , न्याय और जवाबदेही तय करने की माँग की.

साथ ही उन्होंने शहर में "मानव और पर्यावरणीय तबाही को लेकर गैर-ज़िम्मेदाराना और नज़रअन्दाज़ करने के रवैये की निन्दा की थी. 

विशेषज्ञों ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट किया कि लेबनान की जनता को अपने रिहायशी इलाक़ों में मौजूद स्वास्थ्य और पर्यावरणीय जोखिमों की स्पष्ट और सटीक जानकारी होने का अधिकार है. 

हालाँकि बेरूत बन्दरगाह पर विस्फोट के बाद लेबनान में आत्म-मंथन हुआ है लेकिन यह एकमात्र ऐसा देश नहीं है जिसके नागरिकों को ख़तरनाक सामग्री वाले इलाक़ों से खतरा है.

लेबनान के बेरूत में भीषम विस्फोट के बाद हुई भारी तबाही वाले स्थल पर एक आपातकालीन कार्यकर्ता.
OCHA
लेबनान के बेरूत में भीषम विस्फोट के बाद हुई भारी तबाही वाले स्थल पर एक आपातकालीन कार्यकर्ता.

स्विट्ज़रलैण्ड के जिनीवा शहर में स्थित एक रीसर्च संगठन "Small Arms Survey" के एक सर्वे’ के अनुसार पिछले चार दशकों में हथियारों के डिपो में अनियोजित विस्फोट होने से हज़ारों लोगों की मौत हुई है.

नियम पालन ज़रूरी

समुद्री मामलों की संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी (IMO) से लेकर अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के प्रयासों के फलस्वरूप बन्दरगाहों में सुरक्षा और स्वास्थ्य की रक्षा के उद्देश्य से अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख़तरनाक माल के परिवहन से सम्बन्धित अनेक नियम और संहिता वर्षों से प्रचलन में हैं.   

IMO में कार्गो और तकनीकी सहयोग समन्वय के प्रमुख अल्फ्रेडो पैरोक्विन-ओहलसन ने यूएन न्यूज़ को बताया कि संयुक्त राष्ट्र सभी देशों के साथ इन नियमों और दिशा-निर्देशों पर सहमति सुनिश्चित कर सकता है, लेकिन इन्हें लागू करने की ज़िम्मेदारी देशों की है. 

उन्होंने कहा, “निगरानी की ज़िम्मेदारी जहाज़रानी कम्पनियों की होती है और यह सुनिश्चित करना प्रत्येक देश की ज़िम्मेदारी है कि नियम ठीक से लागू किये जा रहे हैं. यदि प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जाता है तो निश्चित रूप से कमी रह जाएगी. यही बेरूत के मामले में भी हुआ है.” 

उन्होंने कहा, "हम महज़ यह उम्मीद कर सकते हैं कि इस तरह की तबाही के बाद जोखिमों के बारे में जागरूकता बढ़ेगी. हमें यक़ीन है कि अब कई बन्दरगाह अपने यहाँ मौजूद ख़तरनाक सामग्री की समीक्षा कर रहे हैं और अब उन्हें लेकर अपनी प्रक्रियाओं में ज़रूरी बदलाव करेंगे.”

समस्या की शिनाख़्त

जोखिमों को चिन्हित करने के लिए दुनिया भर की सरकारों की ज़िम्मेदारी आपदा जोखिम न्यूनीकरण के सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction) में शामिल है.

यह वर्ष 2030 के वैश्विक एजेण्डे वाले समझौतों में पहला था और इसे 2015 में अपनाया गया था. समझौता बताता है कि सदस्य देश किस तरह जोखिम कम कर सकते हैं.

इसमें सदस्य देशों से इस वर्ष के अन्त तक आपदा जोखिम में कमी लाने के लिये अपनी रणनीतियों को अन्तिम रूप देने के लिये कहा गया है.

बन्दरगाह पर एक कंटेनर जहाज़ से सामान उतारा जा रहा है.
IMO
बन्दरगाह पर एक कंटेनर जहाज़ से सामान उतारा जा रहा है.

ममी मिज़ुटोरी संयुक्त राष्ट्र में आपदा जोखिम न्यूनीकरण एजेंसी (UNDRR) के प्रमुख के तौर पर  जो सेण्डाई फ्रेमवर्क के क्रियान्वयन की देखरेख करती है. 
 
उन्होंने यूएन न्यूज़ को बताया कि हालाँकि अभी संयुक्त राष्ट्र बेरूत हादसे में प्रभावित नागरिकों की तात्कालिक आवश्यकताओं पर ध्यान देने में लगा है,लेकिन भविष्य में इस तरह की घटनाएँ ना होने देने के रास्तों पर चर्चा होना भी ज़रूरी है.

क्या ऐसा हादसा फिर होगा?

उन्होंने कहा, “सेंडाई  फ्रेमवर्क का सार यही है कि आपदाओं के बाद कार्रवाई करने से बेहतर है कि व्यवहार बदलाव पर ध्यान दिया जाए जिससे आपदा होने से पहले ही हम जोखिमों से बचाव कर सकें."

"ऐसा करने से मौतें और आर्थिक नुक़सान कम किये जा सकते हैं और सम्भावना है कि इससे सतत विकास भी हासिल हो सकेगा."

ममी मिज़ुटोरी ने बताया, "बन्दरगाह महत्वपूर्ण संरचना व आवश्यक सेवा हैं और उनके निर्माण में सभी प्रकार के जोखिमों को ध्यान में रखना चाहिये." वहाँ किस प्रकार का सामान लाया जा रहा है, इस बारे में भी जानकारी होनी चाहिये. 

“हमारे पास बन्दरगाहों के संचालन व पदार्थों के भण्डारण के सम्बन्ध में मज़बूत अन्तरराष्ट्रीय नियम और क़ानून मौजूद हैं, लेकिन अक्सर हम देखते हैं कि विनियम लागू नहीं होते हैं."

"सरकारों को सही लोगों और सही बुनियादी ढाँचे में निवेश करने की आवश्यकता है. यदि ऐसा नहीं होता है, तो हम और ज़्यादा तकनीकी ख़तरों को आपदाओं में बदलते हुए देखेंगे, फिर चाहे वो बन्दरगाह में हो, खदान में हो, बड़ी औद्योगिक सुविधाओं में हो या फिर परमाणु ऊर्जा संयन्त्रों में.”

उन्होंने कहा कि जब हमारे पास जोखिम नियन्त्रण की व्यवस्था के लिये पर्याप्त समर्थन ना हो तो भयावह घटनाओं की सम्भावना बढ़ जाती है. 

रोकथाम से लाभ

संयुक्त राष्ट्र के इन अधिकारियों का सन्देश है कि नए नियमों व नियामकों की आवश्यकता नहीं है. उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण व्यवहार-परिवर्तन और व्यक्तिगत व राष्ट्रीय स्तर पर जोखिम प्रबन्धन और उससे निपटना है. 

पैरोक्विन-ओहलसन कहते हैं कि आपदा होने पर केवल बन्दरगाहों पर काम करने वाले कर्मचारी ही दोषी नहीं होते. 

“स्टाफ को अपने संस्थानों के सहयोग की भी आवश्यकता होती है, जिनके पास मज़बूत नियम और क़ानून उपलब्ध हैं. कुछ उदाहरणों में हमने देखा है कि कर्मचारियों को अच्छी तरह से प्रशिक्षित नहीं किया गया था," 

वहीं दूसरों में, हमने देखा कि प्रशासन के भीतर आन्तरिक प्रक्रियाओं की कमी थी. उदाहरण के लिये, एक स्पष्ट नीति होने की आवश्यकता है, जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिये कि जहाज़ पर सामान लादे जाने से लेकर उसके रवाना होने तक इस तरह के सामान के भण्डारण के लिये किसकी ज़िम्मेदारी होगी."

ममी मिज़ुटोरी के मुताबिक आपदा जोखिम में कमी लाने के लिये सरकारों को मज़बूती से काम करना होगा:

“देशों को इसमें निवेश करना होगा और राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन एजेंसियों की स्थापना करनी होगी, जो अन्य मंत्रालयों से जुड़ी हों और सीधे राज्य के प्रमुख या कैबिनेट कार्यालय के अधीन होकर काम करते हुए यह सुनिश्चित करें कि नीति-निर्माण के केन्द्र में रोकथाम के प्रयास हो.” 

लेकिन कठिनाई  यह समझाने की भी है कि किसी ऐसी घटना की रोकथाम के प्रयासों में धन लगाने की ज़रूरत क्यों है जो शायद 30 या 100 वर्षों में  एक बार ही हो.