नागासाकी: जीवितों का साहस बने परमाणु हथियारों के उन्मूलन की प्रेरणा

1945 में नागासाकी में हुए परमाणु बम हमले के मुख्य केन्द्र से लगभग 800 मीटर दूर तबाही का मन्ज़र. ये तस्वीर लगभग मध्य अक्टूबर 1945 की है.
UN Photo/Shigeo Hayashi
1945 में नागासाकी में हुए परमाणु बम हमले के मुख्य केन्द्र से लगभग 800 मीटर दूर तबाही का मन्ज़र. ये तस्वीर लगभग मध्य अक्टूबर 1945 की है.

नागासाकी: जीवितों का साहस बने परमाणु हथियारों के उन्मूलन की प्रेरणा

शांति और सुरक्षा

संयुक्त राष्ट्र महासचिव  एंतोनियो गुटेरेश ने जापान के नागासाकी शहर में परमाणु हमले के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर हीमाकुशा लोगों के साहस और सहनशील नज़रिये की सराहना की है. उस परमाणु हमले में जीवित बचे लोगों को हीबाकुशा कहा जाता है. 

महासचिव ने कहा कि हीबाकुशा लोगों ने दशकों पुरानी अपनी भारी तकलीफ़ों को परमाणु हथियारों के ख़तरों के बारे में चेतावनी में तब्दील किया है और इन्सानी हौसले की जीत की एक असाधारण मिसाल पेश की है.

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महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने हीबाकुशा को सम्बोधित एक वक्तव्य में कहा, “आपके उदाहरण से पूरी दुनिया को परमाणु हथियार ख़त्म करने के लिये प्रेरणा मिलनी चाहिये. अफ़सोस की बात है कि नागासाकी शहर के परमाणु बम हमले में तबाह होने की तीन चौथाई शताब्दी बाद भी, परमाणु हथियारों को पागलपन फिर से उठान पर है.”

महासचिव का ये वक्तव्य निरस्त्रीकरण मामलों के लिये यूएन उच्चायुक्त इज़ूमी नाकामीत्सू ने नागासाकी में प्रस्तुत किया.

शान्ति स्मृति समारोह को दिये इस वक्तव्य में महासचिव ने नागासाकी की ये कहते हुए प्रशंसा की कि वहाँ के लोगों ने सहनशीलता, पुनर्निर्माण और सुलह-सफ़ाई व मेलमिलाप का सच्चा उदाहरण पेश किया है.

उन्होंने कहा, “नागासाकी के नागरिक परमाणु बमबारी से परिभाषित नहीं होते हैं, इसके बजाय वो इस मिशन के लिये प्रतिबद्ध हैं कि इस तरह की अमानवीय तबाही किसी अन्य शहर या लोगों को फिर से निशाना ना बनाए.”

महासचिव ने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय परमाणु हथियारों से मुक्त एक विश्व बनाने का लक्ष्य हासिल करने के लिये नागासाकी के लोगों की इस प्रतिबद्धता .के लिये अभारी है.

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश कहा कि बेशक नागासाकी और हीबाकुशा की लम्बे समय से चली आ रही तकलीफ़ों से दुनिया को परमाणु मुक्त बनाने की प्रेरणा मिलनी चाहिये, वहीं उन्होंने चेतावनी भरे अन्दाज़ में ये भी कहा कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल अनजाने में, दुर्घटनावश या किसी ग़लती के कारण होने का बहुत ज़्यादा ख़तरा मौजूद है. 

उन्होंने बताया कि एक तरफ़ तो परमाणु हथियारों को आधुनिकतम बनाने के साथ-साथ उन्हें ज़्यादा घातक, सटीक, तीव्र और ज़्यादा ख़तरनाक बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ परमाणु सम्पन्न देशों के बीच ख़तरनाक सम्बन्ध हैं जिनमें अविश्वास है, पारदर्शिता की कमी है और संवाद का माहौल नहीं है.

इससे भी ज़्यादा, परमाणु निरस्तत्रीकरण की दिशा में हुई ऐतिहासिक प्रगति ख़तरे में पड़ी हुई नज़र आ रही है क्योंकि परमाणु हथियारों के ख़तरे को कम करने और उनके उन्मूलन के लिये पारित किये गए प्रस्ताव और सन्धियाँ बिखरते नज़र आ रहे हैं.

उन्होंने आग्रह करते हुए कहा, “ये चिन्ताजनक रुझान बदला जाना होगा.”

महासचिव ने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से यह समझने का आहवान किया कि परमाणु युद्ध में किसी की भी जीत नहीं हो सकती और परमाणु युद्ध कभी भी कोई विकल्प नहीं हो सकता. 
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि परमाणु व्यवस्था के ढह जाने को तुरन्त रोके जाने की ज़रूरत है.

महासचिव ने समापन टिप्पणी में कहा कि संयुक्त राष्ट्र हीबाकुशा का साहसिक सन्देश आगे फैलाएगा ताकि सारी दुनिया परमाणु रणनीति के निर्मम तर्क का इन्सानी रूप देख सकें.

उन्होंने इस इतिहास को आज के युवाओं यानि भविष्य के शान्तिनिर्माताओं के साथ जोड़ते हुए कहा कि हम सभी का लक्ष्य भविष्य की पीढ़ियों को परमाणु ख़तरे की छाये से बाहर निकालना होना चाहिये.

इससे पहले 6 अगस्त को हिरोशिमा परमाणु बम हमले के भी 75 वर्ष पूरे होने की वर्षगाँठ पर विशेष स्मृति समारोह आयोजित किये गए थे.

महासचिव ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र का जन्म 1945 में हुआ था और उसके वजूद की शुरुआत पर हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु हमलों की तबाही की छाया रही थी.

एंतोनियो गुटेरेश ने कहा, “आरम्भिक दिनों और प्रस्तावों से लेकर ही संगठन ने परमाणु हथियारों के उन्मूलन की ज़रूरत पर हमेशा ज़ोर दिया है”, लेकिन ये लक्ष्य अभी पूरा नहीं हो सका है.