जल और स्वच्छता के मानवाधिकारों की प्राप्ति के लिये तेज़ प्रयासों की पुकार

27 जुलाई 2020

संयुक्त राष्ट्र ने पीने के लिये जल और साफ़-सफ़ाई की समुचित व्यवस्था को दस वर्ष पहले मानवाधिकारों के रूप में पहचान दी थी लेकिन आज भी अरबों लोगों को ये बुनियादी सेवाएँ उपलब्ध नहीं है. संयुक्त राष्ट्र के एक स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने चेतावनी जारी करते हुए आगाह किया है कि इन ज़रूरी सेवाओं के अभाव से कोविड-19 महामारी जैसी चुनौतियाँ और बड़ी त्रासदी का सबब बन सकती हैं. 

विश्व में हर तीन में से एक व्यक्ति के लिये पीने के सुरक्षित पानी की व्यवस्था नहीं है और विश्व की आधे से ज़्यादा आबादी समुचित सफ़ाई व्यवस्था के अभाव में जीवन-यापन करती है. 

तीन अरब से ज़्यादा लोगों के पास साबुन और जल से हाथ धोने के लिये बुनियादी सेवाएँ नहीं हैं और 67 करोड़ से अधिक लोग अब भी खुले स्थानों में शौच जाते हैं.

यूएन के विशेष रैपोर्टेयर लियो हेलेर ने कहा, “कोरोनावायरस महामारी ने सिखाया है कि जल और साफ़-सफ़ाई की सुविधाओं के लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरतमन्द लोगों को पीछे छोड़ देने से एक मानवीय त्रासदी पैदा हो सकती है.”

“हमें अगले 10 वर्षों में अगर न्यायसंगत और मानवीय समाजों का निर्माण करना है तो फिर जल और स्वच्छता के मानवाधिकारों को सर्वोपरि रखना होगा.”

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 64/292 प्रस्ताव 28 जुलाई 2010 को पारित किया था जिसमें 193 देशों ने सर्वजन तक पीने के लिये सुरक्षित जल और साफ़-सफ़ाई की व्यवस्था सुनिश्चित करने का संकल्प लिया है.

साथ ही टिकाऊ विकास के 2030 एजेण्डा में जल और स्वच्छता के मानवाधिकारों के प्रति अपना संकल्प मज़बूत किया गया है. 

टिकाऊ विकास लक्ष्य वैश्विक विकास का एक ऐसा सार्वभौम ब्लूप्रिंट है जिसमें ग़रीबी का अन्त करने, पृथ्वी की रक्षा करने और लोगों की ज़िन्दगी बेहतर बनाने की दिशा में क़दम तेज़ी से आगे बढ़ाने का वादा किया गया है.  

यूएन विशेषज्ञ ने इसी प्रस्ताव के पारित होने की 10वीं वर्षगाँठ पर यह बयान जारी किया है. मानवाधिकार विशेषज्ञ लियो हेलर ने कहा, “गिलास आधा भरा हुआ भी है और ख़ाली भी है.”

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“वर्ष 2020 से जल व साफ़-सफ़ाई के मानवाधिकारों को लागू करने में अब तक हुई प्रगति की रफ़्तार धीमी हो सकती है लेकिन यूएन महासभा के प्रस्ताव से, एक शुरुआत के रूप में, अनेक पहलें शुरू हुई हैं और अन्य सृजनशील कामों को प्रेरणा मिली है.”

उन्होंने ध्यान दिलाया कि पिछले 10 सालों में काफ़ी कुछ हासिल किया गया है लेकिन बहुत से देश अब भी वर्ष 2030 तक जल, साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता के लिये लक्ष्यों को पाने के रास्ते पर नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि इन स्वास्थ्य जोखिमों के कारण हर वर्ष हैज़ा की वजह से चार लाख 32 हज़ार लोगों की मौत होती हैं और इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

विशेष रैपोर्टेयर ने कहा कि 2030 एजेण्डा के संकल्प किसी को भी पीछे ना छूटने देने की मुहिम को आगे बढ़ाते हैं लेकिन अगर देश इन उद्देश्यों और लक्ष्यों को महज़ आँकड़ों की क़वायद के रूप मे देखते हैं तो फिर ये प्रयास अपर्याप्त साबित होंगे. इससे जल और साफ़-सफ़ाई सम्बन्धी मानवाधिकारों के रास्ते पर प्रगति मुश्किल हो जाएगी. 

स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतन्त्र संस्था है. ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करती है. स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतन्त्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं.

 

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