कोविड-19: स्वदेश लौटने वाले प्रवासी कामगारों पर संकट का साया

24 जून 2020

विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 से उपजे हालात में रोज़गार ख़त्म हो जाने के बाद घर लौटने के लिए मजबूर होने वाले लाखों-करोड़ों प्रवासी कामगारों के समक्ष अपने देशों में बेरोज़गारी और निर्धनता की चुनौती खड़ी है. अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने अधर में फँसे कामगारों की मदद और स्वदेश लौटने वालों श्रमिकों के लिए सही नीतियाँ लागू किए जाने की ज़रूरत पर बल दिया है ताकि उनके जीवन को फिर से पटरी पर लाया जा सके. 

एक अनुमान के मुताबिक विश्व भर में 16 करोड़ से ज़्यादा प्रवासी कामगार हैं जिनमें लगभग आधी संख्या महिलाओं की है. यह सँख्या वैश्विक श्रम बल का 4.7 फ़ीसदी है. 

तालाबन्दी और अन्य पाबन्दियाँ हटाए जाने के दौरान लाखों प्रवासी कामगारों को निम्न और मध्य आय वाले देशों में अपने घर लौटना पड़ सकता है.

इन देशों के श्रम बाज़ारों में हालात कोविड-19 से पहले ही नाज़़ुक थे लेकिन अब व्यापक स्तर पर बेरोज़गारी और व्यवसायों में आए व्यवधानों से परिस्थितियाँ और ज़्यादा कमज़ोर हो गई हैं. 

यूएन एजेंसी में कार्यस्थल पर हालात और समानता विभाग में निदेशक मैनुएला टोमेई ने बताया कि कोविड-19 से एक और संकट खड़ा होने की आशंका है. 

“हम जानते हैं कि लाखों प्रवासी कामगार तालाबन्दी लागू होने वाले जिन देशों में काम करते हैं वहाँ उनका रोज़गार ख़त्म हो गया है और अब  उनके अपने उन देशो में घरों को लौटने की सम्भावना बढ़ गई है जो पहले ही कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं और बढ़ती बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं.”

उन्होंने कहा कि इस संकट को विकराल रूप लेने से रोकने के लिए सहयोग और योजना का होना अहम है. 

बहुत से कामगार महामारी में आजीविका का साधन ना होने के कारण अपने घर को रक़म (Remittance) भी नहीं भेज पाए जिससे उनके परिवारों के लिए वित्तीय तंगी पैदा हो गई है. 

अन्य प्रवासी कामगारों ने मेज़बान देशों में ख़ुद को फँसा हुआ पाया है – उनकी सामाजिक संरक्षा योजनाओं तक पहुँच नहीं है और भोजन व रहने के लिए धन भी सीमित है. 

जिनके पास रोज़गार है उन्हें भी कम वेतन में ऐसे स्थानों पर काम करना पड़ रहा है जहाँ शारीरिक दूरी बरता जाना असम्भव है. इससे उनके संक्रमण का शिकार होने का जोखिम भी बढ़ा है.

बहुत से प्रवासी कामगार, विशेषत: महिलाएँ, मेज़बान समाजों में देखभाल, कृषि और अन्य अतिआवश्यक सेवाओं में कामकाज कर रहे हैं, जबकि अन्य सैक्टरों में लोगों का रोज़गार ख़त्म हो गया है या फिर उन्हें अनौपचारिक रूप से काम करना पड़ रहा है. 

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ऐसा नहीं है कि सभी कामगार अपना रोज़गार ख़त्म होने या अन्य कारणों से अपने घरों का रुख़ करेंगे लेकिन यूएन एजेंसी ने 20 देशों में रीसर्च के आधार पर अनुमान लगाया है कि लाखों कामगारों के अपने घरों को लौटने की सम्भावना है. 

एशिया और अफ़्रीका के देशों में सरकारें बड़ी संख्या में कामगारों के स्वैच्छिक या विवशतापूर्ण स्वदेश लौटने की सम्भावना जता रही हैं. लेकिन अधिकांश देशों के पास इन कामगारों के लिए जीवन फिर से शुरू करने में मदद प्रदान करने और प्रभावी श्रम प्रवासन के लिए प्रणाली का अभाव है. 

यूएन एजेंसी ने ऐसे दस्तावेज जारि किये हैं जिनमें कोविड-19 से प्रवासी कामगारो पर पड़ने वाले प्रभावों और सामाजिक व आर्थिक असर का विवरण दिया गया है.

साथ ही रीसर्च दर्शाती है कि स्वदेश लौटने वाले कामगारों के हुनर और प्रतिभा से देश कोविड-19 के बाद पुनर्बहाली में किस तरह लाभ उठा सकते हैं. कुछ कामगार अपने साथ ज्ञान और पूँजी भी ला सकते हैं जिनका इस्तेमाल नए व्यवसाय शुरू करने और रोज़गार सृजन में किया जा सकता है. 

लौटने वाले कामगारों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने से उन देशों में तनाव में कमी लाई जा सकती है जहाँ लोगों को आशंका है कि वापिस लौट रहे प्रवासी अपने साथ वायरस ला रहे हैं या फिर कि उनके लौटने से स्थानीय रोज़गारों पर जोखिम पैदा होगा.

यूएन एजेंसी ने प्रवासी कामगारों पर कोविड-19 के असर का जॉर्डन, लेबनान और आसियान (दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों) में अध्ययन किया है.

 

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