भारत में बाढ़ के विनाशकारी प्रभाव से बचने के उपाय

29 अप्रैल 2020

कोविड-19 महामारी से पूरे विश्व की पर्यावरण, स्वास्थ्य और आर्थिक प्रणालियों की कमज़ोरी सामने आ गई है. संकट अभी जारी है, जिससे ये स्पष्ट होता जा रहा है कि किस तरह अनगिनत आर्थिक, सामाजिक और संस्थागत कारक वैश्विक तापमान और मानव स्वास्थ्य जैसे पर्यावरण जोखिमों को बढ़ाते हैं. भारत दुनिया में सबसे अधिक आपदा-प्रवण देशों में से एक है, जिसमें हाइड्रोलॉजिकल (पानी से संबंधित) आपदाएँ सबसे ज़्यादा होती हैं, जो अनगिनत मौतों और संपत्ति के नुक़सान का कारण बनती है.

बाढ़ के हानिकारक प्रभावों को कम करने के लिए  अनेक प्रकृति-आधारित तरीक़े कुछ उत्कृष्ट समाधान प्रदान करते हैं.

पारिस्थितिकी तंत्र पर आधारित आपदा जोखिम न्यूनीकरण (इको-डीआरआर) एक ऐसा ही उपाय है जहाँ पारिस्थितिक तंत्र के नियामक कार्यों (जैसे वन, वेटलैंड और मैंग्रोव) का व्यवस्थित रूप से दोहन कर आपदाएँ कम करने, रोकने या बफ़र करने के लिए उपयोग किया जाता है.

इको-डीआरआर इस तथ्य पर आधारित है कि पारिस्थितिक तंत्र के ज़रिए ही आपदा जोखिम कम करने के तरीक़े मिल सकते हैं. साथ ही इसमें उत्पादक और सांस्कृतिक मूल्य की अन्य पारिस्थितिक तंत्र सेवाएँ भी मौजूद हैं, जिनसे आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के लिए स्थानीय लचीलापन बनाने में भी मदद मिल सकती है.

इसी के मद्देनज़र संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), योरोपीय आयोग के वित्त पोषण और पार्टनर्स फॉर रेज़ीलिएंस के सहयोग से, भारत के दक्षिणी राज्य केरल में इको-डीआरआर योजना के कार्यान्वयन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने में लगा हुआ है. 

Sudmeier-Rieux/UNEP, 2019
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना की टीमें केरल में नदी पुनर्स्थापन का कार्य कर रहीं हैं.

इस योजना में राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत, डीआरआर (DRR) के लिए पारिस्थितिकी तंत्र बहाली की क्षमता विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है.

इस योजना से केरल में 26 लाख महिलाओं को रोज़गार हासिल हुआ है. इस परियोजना में, स्थानीय सरकारी तकनीकी कर्मचारियों, निर्वाचित अधिकारियों और डीआरआर के लिए पारिस्थितिक तंत्र बहाली पर एक प्रशिक्षण पुस्तिका, एक हैंडबुक और उपक्रम प्रशिक्षण भी विकसित किए जा रहे हैं. 

इसमें केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) के लिए मुख्य संस्थागत समकक्ष के रूप में कार्य करेगा.

वहीं केरल स्थानीय प्रशासन संस्थान और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की मदद से प्रशिक्षण सामग्री, हैंडबुक और प्रशिक्षण कार्यशालाएँ विकसित की जाएंगी.

अरबों डॉलर का नुक़सान

इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य है - इको-डीआरआर के कार्यान्वयन को प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न मॉडल विकसित करना - जिसे मौजूदा कार्यक्रमों का उपयोग करके बढ़ाया जा सकता है, और जो आपदा जोखिम न्यूनीकरण और सतत विकास एजेंडा के लिए सेंदाई फ्रेमवर्क को लागू करने की प्रक्रिया में तेज़ी ला सकते हैं. 

2019 से 2021 तक चलने वाली इस परियोजना का प्रबंधन यूनेप की संकट प्रबंधन शाखा द्वारा किया जाएगा, जहाँ 24 अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, ग़ैर-सरकारी संगठनों और विशेषज्ञ संस्थानों के वैश्विक गठबंधन, पर्यावरण और आपदा जोखिम न्यूनीकरण का सचिवालय भी स्थित है.

भारत में यूएनईपी के प्रमुख अतुल बगई कहते हैं, "परियोजना का एक उद्देश्य ग़रीबी उन्मूलन, विकास, जोखिम में कमी और जलवायु परिवर्तन शमन/अनुकूलन के लिए इको-डीआरआर दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक और निजी निवेश को उत्प्रेरित करना है."

एशियाई विकास बैंक के नए शोध के अनुसार, भारत में मौसमी आपदाओं में आधे से अधिक हिस्सा बाढ़ का है और 1990 के बाद से इससे  50 अरब डॉलर से अधिक की क्षति हुई है.

अंतरराष्ट्रीय आपदा डेटाबेस, ईएम-डीएटी, 2018 के अनुसार देश में 1980 से 2017 तक 278 बाढ़ें आईं, जिनसे 75 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए और लगभग 58 अरब 70 करोड़ अमेरिकी डॉलर के बराबर नुक़सान हुआ.

भारत में घरों और छोटे व्यवसायों पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों पर हुए एक अध्ययन में कहा गया है, "अत्यधिक बारिश और बाढ़ से लोगों पर बड़े पैमाने पर प्रभाव पड़ता है और तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, बुनियादी ढाँचे के विस्तार और निराश्रित परिस्थितियों में अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोगों की बढ़ती संख्या से हालात और बदतर हो जाते हैं." 

इस अनुसंधान में मुंबई, चेन्नई और पुरी ज़िले में कमज़ोर तबके के घरों और छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों पर अत्यधिक वर्षा के प्रभावों का विश्लेषण किया गया और बाढ़ के प्रभावों की विषमता और ग़रीबों को एक ऋण जाल व अत्यधिक ग़रीबी में धकेलने की उनकी क्षमता पर प्रकाश डाला गया.

भारत में यूनेप के प्रमुख अतुल बगई कहते हैं, "केरल जैसे जलवायु-अनुकूल कार्यों में निवेश करना अर्थव्यवस्थाओं में तेज़ी लाने और रोज़गार के अवसर पैदा करने में सहायक होता है और आवर्ती पर्यावरण व स्वास्थ्य ख़तरों के लिए लचीलापन बढ़ाता है."

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन व अफ्रीका बहाली 100 पहल, ग्लोबल लैंडस्केप्स फोरम और प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय संघ जैसे भागीदारों के नेतृत्व में स्थलीय के साथ-साथ तटीय और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र पर काम करता है.

कार्रवाई के लिए एक वैश्विक आहवान के तहत, इससे राजनैतिक समर्थन, वैज्ञानिक अनुसंधान और वित्तीय संसाधन जुटाकर, बड़े पैमाने पर बहाली के लिए तैयारी की जाएगी. 

यूनेप इस दशक को आकार देने में आमजन की मदद का आहवान करता है.

ये लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ था.

 

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